ख़ुत्बात
 
233-आपका इरशादे गिरामी


मालूम होना चाहिये के ज़बान इन्सान (के बदन का) एक टुकड़ा है जब इन्सान (का ज़ेहन) रूक जाए तो फिर कलाम उनका साथ नहीं दिया करता और जब उसके (मालूमात में) वुसअत हो तो फ़िर कलाम ज़बान को रूकने की मोहलत नहीं दिया करता और हम (अहलेबैत) अक़लीम सुख़न के फ़रमान रवा हैं। वह हमारे रगो पै में समाया हुआ है और उसकी ‘ााख़ें हम पर झुकी हुई हैं।
ख़ुदा तुम पर रहम करे इस बात को जान लो के तुम ऐसे दौर में हो जिसमें हक़ गो (हक़ बोलने वाले) कम, ज़बानें सिद्क़ बयानी से कुन्द और हक़ वाले ज़लील व ख़्वार हैं। यह लोग गुनाह व नाफ़रमानी पर जमे हुए हैं और ज़ाहिरदारी व निफ़ाक़ की बिना पर एक-दूसरे से सुलह व सफ़ाई रखते हैं। इनके जवान बदख़ू, इनके बूढ़े गुनहगार, इनके आलिम मुनाफ़िक़ और उनके वाएज़ चापलूस हैं, न छोटे बड़ों की ताज़ीम करते हैं और न मालदार फ़क़ीर व बेनवा की दस्तगीरी करते हैं।