ख़ुत्बात
 
228-आपका इरशादे गिरामी
(जिसमें अपने बाज़ असहाब का तज़किरा फ़रमाया है)


अल्लाह फ़ुलां ‘ाख़्स का भला करे के उसने कजी को सीधा किया और मर्ज़ का इलाज किया, सुन्नत को क़ायम किया और फ़ितनों को छोड़ कर चला गया। दुनिया से इस आलम में गया के उसका लिबास हयाते पाकीज़ा था और उसके ऐब बहुत कम थे।


(((- इब्ने अबिल हदीद ने सातवीं सदी हिजरी में यह इनकेशाफ़ किया के इन फ़िक़रात में फ़लां से मुराद हज़रत उमर हैं और फिर उसकी वज़ाहत में 87 सफ़हे स्याह कर डाले हालांके इसका कोई सबूत नहीं है और न सय्यद रज़ी के दौर के नुस्ख़ों में इसका कोई तज़किरा है और फिर इस्लामी दुनिया के सरबराह की तारीफ़ के लिये लफ़्ज़े फ़ुलां के कोई मानी नहीं हैं। ख़ुतबए ‘ाक़शक़िया में लफ़्ज़े फ़ुलां का इमकान है लेकिन मदह में लफ़्ज़े फ़ुलां में अजीब व ग़रीब मालूम होता है। इस लफ़्ज़ से यह अन्दाज़ा होता है के किसी ऐसे सहाबी का तज़किरा है जिसे आम लोग बरदाश्त नहीं कर सकते हैं और अमीरूल मोमेनीन (अ0) उसकी तारीफ़ ज़रूरी तसव्वुर फ़़रमाते हैं)))


उसने दुनिया के ख़ैर को हासिल कर लिया और उसके ‘ार से आगे बढ़ गया। अल्लाह की इताअत का हक़ अदा कर दिया और इससे मुकम्मल तौर पर ख़ौफ़ज़दा होकर वह दुनिया से इस आलम में रूख़सत हुआ के (ख़ुद चला गया और) लोग मुतफ़र्रिक़ (गुमकर्दा) रास्तों पर थे जहां न गुमराह हिदायत पा सकता था और न हिदायत याफ़्ता यक़ीन तक जा सकता था।