ख़ुत्बात
 
223-आपका इरशादे गिरामी
(जिसे आयत ‘ारीफ़ ‘‘ या अय्योहल इन्सान मा ग़ौका बे रब्बेकल करीम...’’ (ऐ इन्सान तुझे ख़ुदाए करीम के बारे में किस ‘ौ ने धोके में डाल दिया है?) के ज़ैल में इरशाद फ़रमाया है)



देखो यह इन्सान जिससे यह सवाल किया गया है वह अपनी दलील के एतबार से किस क़द्र कमज़ोर है और अपने फ़रेबखोरदा होने के एतबार से किस क़द्र नाक़िस माज़ेरत का हामिल है। यक़ीनन उसने अपने नफ़्स को जेहालत की सख़्ितयों में मुब्तिला कर दिया है।
ऐ इन्सान! सच बता, तुझे किस ‘ौ ने गुनाहों की जराअत दिलाई है और किस चीज़ ने परवरदिगार के बारे में धोके में रखा है और किस अम्र ने नफ़्स की हलाकत पर भी मुतमईन बना दिया है, क्या तेरे इस मर्ज़ का कोई इलाज और तेरे इस ख़्वाब की कोई बेदारी नहीं है और क्या अपने नफ़्सपर इतना भी रहम नहीं करता है जितना दूसरों पर करता है के जब कभी आफ़ताब की हरारत में किसी को तपता देखता है तो साया कर देता है या किसी को दर्द व रन्ज में मुब्तिला देखता है तो उसके हाल पर रोने लगता है तो आखि़र किस ‘ौ ने तुझे ख़ुद अपने मर्ज़ पर सब्र दिला दिया है। और अपनी मुसीबत पर सामाने सुकून फ़राहम कर दिया है और अपने नफ़्स पर रोने से रोक दिया है जबके वह तुझे सबसे ज़्यादा अज़ीज़ है, और क्यों रातों रात अज़ाबे इलाही के नाज़िल हो जाने का तसव्वुर तुझे बेदार नहीं रखता है जबके तू उसकी नाफ़रमानियों की बिना पर उसके क़हर व ग़लबे की राह में पड़ा हुआ है।
अभी ग़नीमत है के अपने दिल की सुस्ती का अज़्म रासिख़ से इलाज कर ले और अपनी आंखों में ग़फ़लत की नीन्द का बेदर्दी से मदावा कर ले अल्लाह का इताअत गुज़ार बन जा। उसकी याद से उन्स हासिल कर और उस अम्र का तसव्वुर कर के किस तरह वह तेरे दूसरों की तरफ़ मुंह मोड़ लेने के बावजूद वह तेरी तरफ़ मुतवज्जेह रहता है। तुझे माफ़ी की दावत देता है। अपने फ़ज़्ल व करम में ढांप लेता है हालांके तू दूसरों की तरफ़ रूख़ किये हुए है। बलन्द व बााला है वह साहेबे क़ूवत जो इस क़द्र करम करता है और ज़ईफ़ व नातवां है तू इन्सान जो उसकी मासीयत की इस क़द्र जराअत रखता है जबके उसी के ऐबपोशी के हमसाये में मुक़ीम है और उसी के फ़ज़्ल व करम की वुसअतों में करवटें बदल रहा है। वह न अपने फ़ज़्ल व करम को तुझसंे रोकता है और न तेरे परदाएराज़ को फ़ाश करता है।


(((-हक़ीक़ते अम्र यह है के इन्सान आखि़रत की तरफ़ से बिलकुल ग़फ़लत का मुजस्समा बन गया है के दुनिया में किसी को तकलीफ़ में नहीं देख पाता है और उसकी दादरसी के लिये तैयार हो जाता है और आखि़रत में पेश आने वाले ख़ुद अपने मसाएब की तरफ़ से भी यकसर ग़ाफ़िल है और एक लम्हे के लिये भी आफ़ताबे महशर के साये और गर्मी क़यामत की तश्नगी का इन्तेज़ाम नहीं करता है। बल्कि बाज़ औक़ात इसका मज़ाक़ भी उड़ाता है ‘‘इन्ना लिल्लाहे .....’’-)))


यह तो पलक झपकने के बराबर भी इसकी मेहरबानियों से ख़ाली नहीं है, कभी नई नई नेमतें अता करता है, कभी बुराइयों की परदापोशी करता है और कभी बलाओं को रद कर देताा है जबके तू इसकी मासियत कर रहा है तो सोच अगर तू इताअत करता तो क्या होता?
ख़ुदा गवाह है के अगर यह बरताव दो बराबर की क़ूवत व क़ुदरत वालों के दरम्यान होता और तू दूसरे के साथ ऐसा ही बरताव करता तो ख़ुद ही सबसे पहले अपने नफ़्स के बदएख़लाक़ और बदअमल होने का फ़ैसला कर देता लेकिन अफ़सोस?


मैं सच कहता हूं के दुनिया ने तुझे धोका नहीं दिया है तूने दुनिया से धोका खाया है, उसने तो नसीहतों को खोल कर सामने रख दिया है और तुझे हर चीज़ से बराबर आगाह किया है। उसने जिस्म पर जिन नाज़िल होने वाली बलाओं का वादा किया है और क़ूवत में जिस कमज़ोरी की ख़बर दी है उसमें वह बिलकुल सही और वफ़ाए अहद करने वाली है। न झूठ बोलने वाली है और न धोका देने वाली। बल्कि बहुत से उसके बारे में नसीहत करने वाले हैं जो तेरे नज़दीक नाक़ाबिले एतबार हैं और सच-सच बाोलने वाले हैं जो तेरी निगाह में झूठे हैं।
अगर तूने उसे गिर पड़े मकानात और ग़ैर आबाद मन्ज़िलों में पहचान लिया होता तो देखता के वह अपनी याद देहानी और बलीग़तरीन नसीहत में तुझपर किस क़द्र मेहरबान है और तेरी तबाही के बारे में किसी क़द्र बुख़ल से काम लेती है।
यह दुनिया उसके लिये बेहतरीन घर है जो इसको घर बनाने से राज़ी न हो और उसके लिये बेहतरीन वतन है जो इसे वतन बनाने पर आमादा न हो, इस दुनिया के रहने वालों में कल के दिन नेक बख़्त वही होंगे जो आज इससे गुरेज़ करने पर आमादा हों।
देखो जब ज़मीन काो ज़लज़ला आ जाएगाा और क़यामत अपनी अज़ीम मुसीबतों के साथ खड़ी हो जाएगी और हर इबादतगाह के साथ उसके इबादत गुज़ार, हर माबूद के साथ उसके बन्दे और हर क़ाबिले इताअत के साथ उसके मुतीअ व फ़रमाबरदार मुलहक़ कर दिये जाएंगे तो कोई हवा में शिगाफ़ करने वाली निगाह और ज़मीन पर पड़ने वाले क़दम की आहट ऐसी न होगी जिसका अद्ल व इन्साफ़ के साथ पूरा बदला न दे दिया जाए। उस दिन कितनी ही दलीलें होंगी जो बेकार हो जाएंगी और कितने ही माज़ेरत के रिश्ते होंगे जो कट के रह जाएंगे।
लेहाज़ा मुनासिब है के अभी से इन चीज़ों को तलाश कर लो जिनसे उज़्र क़ायम हो सके और तुम्हारी हुज्जतें साबित हो सकें। जिस दुनिया में तुमको नहीं रहना है उसमें से वह ले लो जो तुम्हारे लिये हमेशा बाक़ी रहने वाली हैं निजात की रोशनी की चमक देख लो और आमादगी की सवारियों पर सामान बार कर लो।