ख़ुत्बात
 
217- आपका इरशादे गिरामी
(क़ुरैश से शिकायत और फ़रयाद करते हुए)


ख़ुदाया! मैं क़ुरैश से और उनके मददगारों से तेरी मदद चाहता हूँ के इन लोगों ने मेरी क़राबतदारी का ख़याल नहीं किया और मेरे ज़र्फे़ अज़मत को इलट दिया है और मुझसे उस हक़ के बारे में झगड़ा करने पर इत्तेहाद कर लिया है जिसका मैं सबसे ज़्यादा हक़दार था और फिर यह कहने लगे के आप इस हक़ को ले लें तो यह भी सही है और आपको इससे रोक दिया जाए तो यह भी सही है। अब चाहें हम्म व ग़म के साथ सबर करें या रन्ज व अलम के साथ मर जाएं।
ऐसे हालात में मैंने देखा के मेरे पास न कोई मददगार है और न कोई दिफ़ाअ करने वाला सिवाए मेरे घरवालों के, तो मैने उन्हें मौत के मुंह में देने से गुरेज़ किया और बाला आखि़र आँखों में ख़स व ख़ाशाक के होते हुए चश्मपोशी की और गले में फन्दे के होते हुए लोआबे दहन निगल लिया और ग़ुस्से को पीने में ख़ेज़ल से ज़ियाह तल्ख़ ज़ाएक़े पर सब्र किया और छुरियों के ज़ख़्मों से ज़्यादा तकलीफ़देह हालात पर ख़ामोशी इख़्तेयार कर ली।
(सय्यद रज़ी - गुज़िश्ता ख़ुत्बे में यह मज़मून गुज़र चुका है लेकिन रिवायतें मुख़्तलिफ़ थीं लेहाज़ा मैंने दोबारा उसे नक़्ल कर दिया)