ख़ुत्बात
 
216-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जिसे मुक़ामे सिफ़्फ़ीन में इरशाद फ़रमाया)


अम्माबाद! परवरदिगार ने वली अम्र होने की बिना पर मेरा एक हक़ क़रार दिया है और तुम्हारा भी मेरे ऊप एक तरह का हक़ है और हक़ मदह सराई के एतबार से तो बहुत वुसअत रखता है लेकिन इन्साफ़ के एतबार से बहुत तंग है। यह किसी का उस वक़्त तक साथ नहीं देता है जब तक उसके ज़िम्मे कोई हक़ साबित न कर दे और किसी के खि़लाफ़ फ़ैसला नहीं करता है जब तक उसे कोई हक़ न दिलवा दे। अगर कोई हस्ती ऐसी मुमकिन है जिसका दूसरों पर हक़ हो और उस पर किसी का हक़ न हो तो वह सिर्फ़ परवरदिगार की हस्ती है के वह हर ‘ौ पर क़ादिर है और उसके तमाम फ़ैसले अद्ल व इन्साफ़ पर मबनी हैं लेकिन उसने भी जब बन्दों पर अपना हक़ इताअत क़रार दिया है तो अपने फ़ज़्ल व करम और अपने उस एहसान की वुसअत की बिना पर जिसका वह अहल है उनका यह हक़ क़रार दे दिया है के उन्हें ज़्यादा से ज़्यादा सवाब दे दिया जाए।
परवरदिगार के मुक़र्रर किये हुए हुक़ूक़ में से वह तमाम हुक़ूक़ है जो उसने एक दूसरे पर क़रार दिये हैं और उनमें मसावात भी कऱार दी है के एक हक़ से दूसरा हक़ पैदा होता है और एक हक़ नहीं पैदा होता है जब तक दूसरा हक़ न पैदा हो और इन तमाम हुक़ूक़ में सबसे अज़ीमतरीन हक़ रिआया पर वाली का हक़ और वाली पर रियाया का हक़ है जिसे परवरदिगार ने एक को दूसरे के लिये क़रार दिया है और इसी से उनकी बाहमी उलफ़तों को मुनज़्ज़म किया है और उनके दीन को इज़्ज़त दी है। रिआया की इस्लाह मुमकिन नहीं है जब तक वाली सॉलेह न हो और वाली सॉलेह नहीं रह सकते हैं जब तक रिआया सॉलेह न हो। अब अगर रिआया ने वाली को उसका हक़ दे दिया और वाली ने रिआया को उनका हक़ दे दिया तो हक़ दोनों के दरम्यान अज़ीज़ रहेगा। दीन के रास्ते क़ायम हो जाएंगे। इन्साफ़ के निशानात बरक़रार रहेंगे और पैग़म्बरे इस्लाम (स0) की सुन्नतें अपने ढर्रे पर चल पड़ेंगी और ज़माना ऐसा सॉलेह हो जाएगा के बक़ाए हुकूमत की उम्मीद भी की जाएगी और दुश्मनों की तमन्नाएं भी नाकाम हो जाएंगी।


लेकिन अगर रिआया हाकिम पर ग़ालिब आ गई या हाकिम ने रिआया पर ज़्यादती की तो कलेमात में इख़्तेलाफ़ हो जाएगा, ज़ुल्म के निशानात ज़ाहिर हो जाएंगे, दीन में मक्कारी बढ़ जाएगी। सुन्नतों के रास्ते नज़र अन्दाज़ हो जाएंगे, ख़्वाहिशात पर अमल होगा, एहकाम मुअत्तल हो जाएंगे और नफ़सानी बीमारियां बढ़ जाएंगी, न बड़े से बड़े हक़ के मोअत्तल हो जाने से कोई वहशत होगी और न बड़े से बड़े बातिल पर अमल दरआमद से कोई परेशानी होगी।
ऐसे मौक़े पर नेक लोग ज़लील कर दिये जाएंगे और ‘ारीर लोगों की इज़्ज़त होगी और बन्दों पर ख़ुदा की उक़ूबतें अज़ीमतर हो जाएंगी।


ख़ुदारा आपस में एक-दूसरे के मुख़लिस रहो (एक दूसरे को समझाते-बुझाते रहो) और एक-दूसरे की मदद करते रहो इसलिये के तुममें कोई ‘ाख़्स भी कितना ही ख़ुशनूदिये ख़ुदा की तमअ रखता हो और किसी क़द्र भी ज़हमते अमल बरदाश्त कर ले इताअते ख़ुदा की उस मन्ज़िल तक नहीं पहुंच सकत है जिसका वह अहल है लेकिन फिर भी मालिक का यह हक़्के़ वाजिब उसके बन्दों के ज़िम्मे है के अपने इमकान भर नसीहत करते रहें और हक़ के क़याम में एक दूसरे की मदद करते रहें इसलिये के कोई ‘ाख़्स भी हक़ की ज़िम्मेदारी अदा करने में दूसरे की इमदाद से बेनियाज़ नहीं हो सकता है चाहे हक़ में इसकी मन्ज़िलत किसी क़द्र अज़ीम क्यों न हो और दीन में उसकी फ़ज़ीलत को किसी क़द्र तक़द्दुम क्यों न हासिल हो और न कोई ‘ाख़्स हक़ में मदद करने या मदद लेने की ज़िम्मेदारी से कमतर हो सकता है चाहे लोगों की नज़र में किसी क़द्र छोटा क्यों न हो (चाहे लोग उसे ज़लील समझें) और चाहे उनकी निगाहों में किसी क़द्र क्यों न गिर जाए (चाहे उनकी निगाहों में किसी क़द्र हक़ीर क्यों न हो)।
(इस गुफ़्तगू के बा आपके असहाब में से एक ‘ाख़्स ने एक तवील तक़रीर की जिसमें आपकी मदहा व सना के साथ इताअत का वादा किया गया तो आपने फ़रमाया के-)


याद रखो के जिसके दिल में जलाले इलाही की अज़मत और जिसके नफ़्स में इसके मक़ामे उलूहियत की बलन्दी है उसका हक़ यह है के तमाम कायनात उसकी नज़र में छोटी हो जाए और ऐसे लोगों में इस हक़ीक़त का सबसे बड़ा अहल वह है जिस पर उसकी नेमतें अज़ीम और उसके अच्छे एहसानात किये हों, इसलिये के किसी ‘ाख़्स पर अल्लाह की नेमतें अज़ीम नहीं होतीं मगर यह के उसका हक़ भी अज़ीमतर हो जाता है और एहकाम के हालात में नेक किरदार अफ़राद के नज़दीक बदतरीन हालत ये है के उनके बारे में ग़ुरूर का गुमान हो जाए और उनके मामेलात को तकब्बुर पर मबनी समझा जाए और मुझे यह बात सख़्त नागवार है के तुम में से किसी को यह गुमान पैदा हो जाए के मैं रोसा (बढ़ चढ़ कर सराहे जाने) को दोस्त रखता हूँ या अपनी तारीफ़ सुनना चाहता हूँ और बेहम्दे अल्लाह मैं ऐसा नहीं हूँ और अगर मैं ऐसी बातें पसन्द भी करता होता तो भी उसे नज़रअन्दाज़ कर देता के मैं अपने को उससे कमतर समझता हूँ के इसी अज़मत व किबरियाई का अहल बन जाऊँ जिसका परवरदिगार हक़दार है। यक़ीनन बहुत से लोग ऐसे हैं जो अच्छी कारकर्दगी पर तारीफ़ को दोस्त रखते हैं लेकिन ख़बरदार तुम लोग मेरी इस बात पर तारीफ़ न करना के मैंने तुम्हारे हुक़ूक़ अदा कर दिये हैं के अभी बहुत से ऐसे हुक़ूक़ का ख़ौफ़ बाक़ी है जो अदा नहीं हो सके हैं और बहुत से फ़राएज़ हैं जिन्हें बहरहाल नाफ़िज़ करना है। देखो मुझसे उस लहजे में बात न करना जिस लहजे में जाबिर बादशाहों से बात की जाती है और न मुझसे इस तरह बचने की कोशिश करना जिस तरह तैश में आने वालों से बचा जाता है, न मुझसे ख़ुशामद के साथ ताल्लुक़ात रखना और न मेरे बारे में यह तसव्वुर करना के मुझे हर्फ़े हक़ गराँ गुज़रेगा और न मैं अपनी ताज़ीम का तलबगार हूँ। इसलिये के जो ‘ाख़्स भी हर्फ़े हक़ सुनने को गराँ समझता है या अदल की पेशकश को नापसन्द करता है वह हक़ व अदल पर अमल को यक़ीनन मुश्किलतर ही तसव्वुर करेगा। लेहाज़ा ख़बरदार हर्फ़े हक़ कहने में तकल्लुफ़ न करना और मुन्सिफ़ाना मश्विरा देने से गुरेज़ न करना इसलिये के मैं ज़ाती तौर पर अपने को ग़लती से बालातर नहीं तसव्वुर करता हूँ और न अपने अफ़आल को इस ख़तरे से महफ़ूज़ समझता हूँ मगर यह के मेरा परवरदिगार मेरे नफ़्स को बचा ले के वह इसका मुझसे ज़्यादा साहबे इख़्तेयार है।


देखो हम सब एक ख़ुदा के बन्दे और उसके ममलूक हैं और उसके अलावा कोई दूसरा ख़ुदा नहीं है। वह हमारे नुफ़ूस पर इतना इख़्तेयार रखता है जितना ख़ुद हमें भी हासिल नहीं है और उसी ने हमें साबेक़ा हालात से निकाल कर इस इस्लाह के रास्ते पर लगा दिया है के अब गुमराही हिदायत में तबदील हो गई है और अन्धेपन के बाद बसीरत हासिल हो गई है।