ख़ुत्बात
 
215 -आपकी दुआ का एक हिस्सा
(जिसकी बराबर तकरार फ़रमाया करते थे)


ख़ुदा का ‘ाुक्र है के उसने सुबह के हंगाम (मुझे) न मुर्दा बनाया है और न बीमार, न किसी रग पर मर्ज़ का हमला हुआ है और न किसी बदअमली का मुवाख़ेज़ा किया गया है। न मेरी नस्ल को मुनक़ता किया गया है और न अपने दीन में इरतेदाद का शिकार हुआ हूं, न अपने दीन से मुरतद हूँ और न अपने रब का मुनकिर। न अपने ईमान से मुतवह्हश और न अपनी अक़्ल का मख़बूत और न मुझ पर गुज़िश्ता उम्मतों जैसा कोई अज़ाब हुआ है। मैंने इस आलम मे सुबह की है के मैं एक बन्दए ममलूक हूँ जिसने अपने नफ़्स पर ज़ुल्म किया है। ख़ुदाया! तेरी हुज्जत मुझ पर तमाम है और मेरी कोई हुज्जत नहीं है (मेरे लिये अब उज़्र की कोई गुन्जाइश नहीं है)। तू जो दे दे उससे ज़्यादा ले नहीं सकता है (ख़ुदाया मुझमें किसी चीज़ के हासिल करने की क़ूवत नहीं सिवा उसके के जो तू मुझे अता कर दे) और जिस चीज़ से तू न बचाए उससे बच नहीं सकता।


ख़ुदाया! मैं उस अम्र से पनाह चाहता हूं के तेरी दौलत में रह कर फ़क़ीर हो जाऊ या तेरी हिदायत के बावजूद गुमराह हो जाऊ, या तेरी सलतनत के बावजूद सताया जाऊं या तेरे हाथ में सारे इख़्तेयारात होने के बावजूद मुझ पर दबाव डाला जाए। ख़ुदाया! मेरी जिन नफ़ीस चीज़ों को मुझसे वापस लेना और अपनी जिन अमानतों को मुझसे पलटाना, उनमें सबसे पहली चीज़ मेरी रूह को क़रार देना।
ख़ुदाया! मैं उस अम्र से तेरी पनाह चाहता हूँ के मैं तेरे इरशादात से बहक जाऊँ या तेरे दीन में किसी फ़ित्ने में मुब्तिला हो जाऊँ या तेरी आई हुई हिदयतों के मुक़ाबले में मुझ पर ख़्वाहिशात का ग़लबा हो जाए।