ख़ुत्बात
 
214-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जिसमें रसूले अकरम (स0) की तारीफ़, ओलमा की तौसीफ़ और तक़वा की नसीहत का ज़िक्र किया गया है)


मैं गवाही देता हूँ के वह परवरदिगार ऐसा आदिल है जो अद्ल ही से काम लेता है, और ऐसा हाकिम है जो हक़ व बातिल को जुदा कर देता है और मैं ‘ाहादत देता हूँ के मोहम्मद (स0) उसके बन्दे और रसूल हैं और फिर तमाम बन्दों के सरदार भी हैं। जब भी परवरदिगार ने मख़लूक़ात को दो गिरोहों (हक़ व बातिल) में तक़सीम किया है उन्हें (मोहम्मद स0 को) बेहतरीन हिस्से ही में रखा है। आपकी तख़लीक़ (आपके नसब) में न किसी बदकार का कोई हिस्सा है और न किसी फासिक़ व फ़ाजिर का कोई दख़ल है।
याद रखो के परवरदिगार ने हर ख़ैर के लिये अहल क़रार दिये हैं और हर हक़ के लिये सुतून और हर इताअत के लिये वसीलाए हिफ़ाज़त क़रार दिया है और तुम्हारे लिये हर इताअत के मौक़े पर ख़ुदा की तरफ़ से एक मददगार का इन्तेज़ाम रहता है जो ज़बानों पर बोलता है और दिलों को ढारस इनायत करता है। इसके वजूद में हर इकतेफ़ा करने के लिये किफ़ायत है और तलबगारे सेहत के लिये शिफ़ा व आफ़ियत है (हर बेनियाज़ी चाहने वाले के लिये बेनियाज़ी और शिफ़ा चाहने वाले के लिये शिफ़ा है)।


याद रखो के अल्लाह के वह बन्दे जिन्हें उसने इल्म का मुहाफ़िज़ बनाया है वह उसका तहफ़्फ़ुज़ भी करते हैं और उसके चश्मों को जारी भी करते रहते हैं। आपस में मोहब्बत से एक-दूसरे की मदद करते हैं और चाहत के साथ मुलाक़ात करते हैं। सेराब करने वाले (इल्म व हिकमत के साग़रों) चश्मों से मिलकर (छककर) सेराब होते हैं और फिर सेरो सेराब होकर ही बाहर निकलते हैं। उनके आमाल में रैब (शक व ‘ाुबह) की आमेज़िश नहीं है और उनके मुआशरे में ग़ीबत का गुज़र नहीं है। इसी अन्दाज़ से मालिक ने उनकी तख़लीक़ की है और उनके एख़लाक़ क़रार दिये हैं और इसी बुनियाद पर वह आपस में मोहब्बत भी करते हैं और मिलते भी रहते हैं। उनकी मिसाल उन दानों की है जिनको इस तरह चुना जाता है के अच्छे दानों को ले लिया जाता है और ख़राब को फेंक दिया जाता है। उन्हें इसी सफ़ाई ने मुमताज़ बना दिया है और उन्हें इसी परख ने साफ़ सुथरा क़रार दे दिया है।


अब हर ‘ाख़्स को चाहिये के उन्हीं सिफ़ात को क़ुबूल करके करामत को क़ुबूल करे और क़यामत के आन से पहले होशियार हो जाए। अपने मुख़्तसर दिनों और थोड़े से क़याम के बारे में ग़ौर करे के इस मन्ज़िल को दूसरी मन्ज़िल में बहरहाल बदल जाना है। अब इसका फ़र्ज़ है के नई मन्ज़िल और जानी पहचानी जाए बाज़गश्त (क़ब्र, बरज़ख़, हश्र) के बारे में अमल करे।
ख़ु‘ााबहाल (मुबारकबाद) इन क़ल्बे सलीम वालों के लिये जो रहनुमा की इताअत करें और हलाक होने वालों से परहेज़ करें। कोई रास्ता दिखा दे तो देख लें और वाक़ेई राहनुमा अम्र करे तो उसकी इताअत करें, हिदायत की तरफ़ सबक़त करें क़ब्ल इसके के इसके दरवाज़े बन्द हो जाएं और इसके असबाब मुनक़ता हो जाएं। तौबा का दरवाज़ा खोल लें और गुनाहों के दाग़ों को धो ढालें, यही वह लोग हैं जिन्हें सीधे रास्ते पर खड़ा कर दिया गया है और उन्हें वाज़ेह रास्ते की हिदायत मिल गई। (मुबारक हो उस पाक व पाकीज़ा दिल वाले को जो हिदायत करने वाले की पैरवी और तबाही डालने वाले से किनारा करता है और दीदाए बसीरत में जिला बख़्शने वाले की रोशनी और हिदायत करने वाले के हुक्म की फ़रमाबरदारी से सलामती की राह पा लेता है और हिदायत के दरवाज़ों के बन्द और वसाएल व ज़राए के क़ता होने से पहले हिदायत की तरफ़ बढ़ जाता है।)


(((-दुनिया में साहेबाने इल्म व फ़ज़्ल बेशुमार हैं लेकिन वह अहले इल्म जिन्हें मालिक ने अपने इल्म और अपने दीन का मुहाफ़िज़ बनाया है वह महदूद ही हैं जिनकी सिफ़त यह है के इल्म का तहफ़्फ़ुज़ भी करते हैं और दूसरों को सेराब भी करते रहते हैं, ख़ुद भी सेराब रहते हैं और दूसरों की तशनगी का भी इलाज करते रहते हैं। इनके इल्म में जेहालत और ‘‘लाअदरी’’ का गुज़र नहीं है और वह किसी साएल को महरूम वापस नहीं पेश करत हैं-)))