ख़ुत्बात
 
213-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(परवरदिगार की तमजीद उसकी ताज़ीम के बारे में)


सारी तारीफ़ें उस अल्लााह के लिये हैं जो मख़लूक़ात की मुशाबेहत से बलन्दतर और तौसीफ़ करने वालों की गुफ़्तगू से बालातर है। वह अपने अजीब व ग़रीब लज़्म व नस्ख़ की बदौलत देखने वालों के सामने भी है और अपने जलाल व इज़्ज़त की बिना पर मुफ़क्किरीन की फ़िक्र से पोशीदा भी है। वह आलिम है बग़ैर इसके के किसी से कुछ सीखे या इल्म में इज़ाफ़ा और कहीं से इस्तेफ़ादा करे (उसका इल्म किसी इस्तेफ़ादे का नतीजा भी नहीं है) तमाम उमूर का तक़दीर साज़ है और इस सिलसिले में (मुशीर, तदबीर) और सोच बिचार काा माोहताज भी नहीं है। तारीकियां उसे ढांप नहीं सकती हैं और रोशनियों से वह किसी तरह का कस्बे नूर नहीं है, (न वह रौशनियों से कस्बे ज़िया करता है) न रात उस पर ग़ालिब आ सकती है और न दिन उसके ऊपर से गुज़र सकता है। उसका इदराक आंखों का मोहताज नहीं है और उसका इल्म इताअत का नतीजा नहीं है।
उसने पैग़म्बर (स0) को एक नूर देकर भेजा है और उन्हें सबसे पहले मुन्तख़ब क़रार दिया है, उनके ज़रिये परागन्दियों को जमा किया है (उनके ज़रिये से तमाम परागन्दियों और परेशानियों को दूर किया और ग़लबा पाने वालों को क़ाबू में रखा है) दुश्वारियों को आसान किया है और नाहमवारियों को हमवार बनाया है। यहाँतक के गुमराहियों को दाएं, बाएं हर तरफ़ से दूर कर दिया है।


(((-सही मुस्लिम किताबुल फ़ज़ाएल में सरकारे दो आलम (स0) का यइ इरशाद दर्ज है के अल्लाह ने औलादे इस्माईल में कोनाना का इन्तेखा़ब किया है और फिर कुनाना में क़ुरैश को मुन्तक़ब क़रार दिया है, क़ुरैश में बनी हाशिम मुनतख़ब हैं और बनी हाशिम में मैं। लेहाज़ा दुनिया की ‘ाख़्िसयत का सरकारे दोआलम (स0) और अहलेबैत (अ0) पर क़यास नहीं किया जा सकता है।-)))