ख़ुत्बात
 
211- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(हैरत अंगेज़ तख़लीक़े कायनात के बारे में)


यह परवरदिगार के इक़्तेदार की ताक़त और उसकी सनाई (सनअत) की हैरतअंगेज़ लताफ़त है के उसने गहरे और तलातुम समन्दर में एक ख़ुश्क और बेहरकत ज़मीन को पैदा कर दिया और फ़िर बख़ारात के तबक़ात बनाकर (पानी की तहों पर तहें चढ़ाकर जो आपस में मिली हुई थीें) उन्हें शिगाफ़्ता करके सात आसमाानों की ‘ाक्ल दे दी जो उसके अम्र से ठहरे हुए हैं और अपनी हदों पर क़ायम हैं, फ़िर ज़मीन काो यूँ गाड़ दिया के उसे सब्ज़ रंग का गहरा समन्दर उठाए हुए है जो क़ानूने इलाही के आगे मुसख़्ख़र है, उसके अम्र का ताबे है और उसकी हैबत के सामने सरनिगूँ है और उसके ख़ौफ़ से इसका बहाव थमा हुआ है।
फ़िर पत्थरों, टीलों और पहाड़ों को ख़ल्क़ करके उन्हेें उनकी जगहों पर गाड़ दिया और उनकी मन्ज़िलों पर मुस्तक़र कर दिया के अब उनकी बलन्दियां फ़िज़ाओं से गुज़र रही हैं और उनकी जड़ें पानी के अन्दर रासेख़ हैं, उनके पहाड़ों को हमवार ज़मीनों से ऊंचा किया और उनके सुतूनों को एतराफ़ के फै़लाव और मराकज़ के ठहराव में नस्ब कर दिया। अब उनकी चोटियां बलन्द हैं और उनकी बलन्दियां तवीलतरीन हैं, इन्हीं पहाड़ों को ज़मीन का सुतून क़रार दिया है और इन्हीं को कील बनाकर गाड़ दिया है जिनकी वजह से ज़मीन हरकत के बाद साकिन हो गई और न अहले ज़मीन को लेकर किसी तरफ़ झुक सकी और न उनके बोझ से धंस सकी और न अपनी जगह से हट सकी।
पाक व बेनियाज़ है वह मालिक जिसने पानी के तमोज के बावजूद उसे रोक रखा है और एतराफ़ की तरी के बावजूद उसे ख़ुश्क बना रखा है और फिर उसे अपनी मख़लूक़ात के लिये गहवारा और फ़र्श की हैसियत दे दी है, उस गहरे समन्दर के ऊपर जो ठहरा हुआ है और बहता नहीं है और एक मक़ाम पर क़ायम है किसी तरफ़ जाता नहीं है हालांके उसे तेज़ व तन्द हवाएं हरकत दे रही हैं और बरसने वाले बादल उसे मथकर उससे पानी खींचते रहते हैं- ‘‘इन तमाम बातों में इबरत का सामान है उन लोगों के लिये जिनके अन्दर ख़ौफ़े ख़ुदा पाया जाता है।


(((-कितना हसीन निज़ामे कायनात है के तलातुम पानी पर ज़मीन क़ायम है और ज़मीन के ऊपर हवा का दबाव क़ायम है और इन्सान इस तीन मन्ज़िला इमारत में दरम्यानी तबक़े पर इस तरह सुकूनत पज़ीद है के उसके ज़ेरे क़दम ज़मीन और पानी है और इसके बालाए सर फ़िज़ा और हवा है। हवा उसकी ज़िन्दगी के लिये सांसें फ़राहम कर रही है और ज़मीन उसके सुकून व क़रार का इन्तेज़ाम करके उसे बाक़ी रखे हुए हैं। पानी इसकी ज़िन्दगी का क़ेवाम है और समन्दर उसकी ताज़गी का ज़रिया। कोई ज़र्राए कायनात उसकी खि़दमत से ग़ाफ़िल नहीं है और कोई अनासिर अपनंे से अशरफ़ मख़लूक़ की इताअत से मुनहरिफ़ नहीं है। ताके वह भी अपनी अशरफ़ीयत की आबरू का तहफ़्फ़ुज़ करे और सारी कायनात से बालातर ख़ालिक़ व मालिक की इताअत व इबाादत में हमातन मसरूफ़ रहे।-)))