ख़ुत्बात
 
210-आपका इरशादे गिरामी
(जब किसी ‘ाख़्स ने आपसे बिदअती अहादीस और मुतज़ाद रिवायात के बारे में सवाल किया)


लोगों के हाथों में हक़ व बातिल, सिद्क़ व कज़्ब नासिख़ व मन्सूख़, आम व ख़ास, मोहकम व मुतशाबेह और हक़ीक़त व वहम सब कुछ है और मुझ पर बोहतान लगाने का सिलसिला रसूले अकरम (स0) की ज़िन्दगी ही से ‘ाुरू हो गया था जिसके बाद आपने मिम्बर से एलान किया था के ‘‘जिस ‘ाख़्स ने भी मेरी तरफ़ से ग़लत बात बयान की उसे अपनी जगह जहन्नम में बना लेना चाहिये’’
याद रखो के हदीस के बयान वाले चार तरह के अफ़राद होते हैं जिनकी पांचवी कोई क़िस्म नहीं है-
एक वह मुनाफ़िक़ है जो ईमान का इज़हार करता है, इस्लाम की वज़ा क़ता इख़्तेयार करता है लेकिन गुनाह करने और अफ़्तरा में पड़ने से परहेज़ नहीं करता है। अगर लोगों को मालूम हो जाए के यह मुनाफ़िक़ और झूठा है तो यक़ीनन उसके बयान की तस्दीक़ न करेंगे लेकिन मुश्किल यह है के वह समझते हैं के यह सहाबी है, इसने हुज़ूर को देखा है, उनके इरशाद को सुना है और उनसे हाासिल किया है और इस तरह उसके बयान को क़ुबूल कर लेते हैं जबके ख़ुद परवरदिगार भी मुनाफ़िक़ीन के बारे में ख़बर दे चुका है और उनके औसाफ़ का तज़किरा कर चुका है और यह रसूले अकरम (स0) के बाद भी बाक़ी रह गए थे, और गुमराही के पेशवाओं और जहन्नुम के दाइयों की तरफ़ इसी ग़लत बयाानी और इफ़्तरा परवाज़ी से तक़र्रब हासिल करते थे। वह उन्हें ओहदे देते रहे और लोगांे की गर्दनों पर हुक्मरान बनाते रहे और उन्हीं के ज़रिये दुनियाा को खाते रहे और लोग तो बहरहाल बादशाहों और दुनियादारों ही के साथ रहते हैं, अलावा उनके जिन्हें अल्लाह इस ‘ार से महफ़ूज़ कर ले।


(((-वाज़े रहे के इस्लामी उलूम में इल्मुल रेजाल आौर अल्मे दरायत का होना इस बात की दलील है के सारा आलमे इस्लाम इस नुक्ते पर मुत्तफ़िक़ है के रिवायात क़ाबिले क़ुबूल भी हैं और नाक़ाबिले क़ुबूल भी, और रावी हज़रात सक़ा और मोतबर भी हैं और ग़ैर सक़ा और ग़ैर मोतबर भी, इसके बाद अदालत सहाबा और एतबार, तमाम ओलमा का अक़ीदा, एक मज़हके के अलावा कुछ नहीं है।
हज़रत ने यह भी वाज़ेह कर दिया है के मुनाफ़िक़ीन का कारोबार हमेशा हुकाम की नालाएक़ी से चलना है वरना हुकाम दयानतदार हों और ऐसी रिवायात के ख़रीदार न बनें ता मुनाफ़ेक़ीन का कारोबार एक दिन में ख़त्म हो सकता है।-)))


चार में से एक क़िस्म यह हुआ और दूसरा ‘ाख़्स वह है जिसने रसूले अकरम (स0) से कोई बात सुनी है लेकिन उसे सही तरीक़े से महफ़ूज़ नहीं कर सका है (याद नहीं रख सका है) और इसमें सहो का शिकार हाो गया है, जान बूझकर झूठ नहीं बोलता है, जो कुछ उसके हाथ में है उसी की रिवायत करता है आौर उसी पर अमल करता है और यह कहता है के यह मैंने रसूले अकरम (स0) से सुना है हालांके अगर मुसलमानों को मालूम हो जाए के इससे ग़लती हो गई है तो हरगिज़ इसकी बात न मानेंगे बल्कि अगर उसे ख़ुद भी मालूम हो जाए के यह बात इस तरह नहीं है तो तर्क कर देगा और नक़ल नहीं करेगाा।
तीसरी क़िस्म उस ‘ाख़्स की है जिसने रसूले अकरम (स0) को हुक्म देते सुना है लेकिन हज़रत ने जब मना किया तो उसे इत्तेला नहीं हो सकी या हज़रत को मना करते देखा है फिर जब आपने दोबारा हुक्म दिया तो इत्तेलाअ न हो सकी, इस ‘ाख़्स ने मन्सूख़ को महफ़ूज़ कर लिया है और नासिख़ को महफ़ूज़ नहीं कर सका है के अगर उसे मालूम हो जाए के यह हुक्म मन्सूख़ हो गया है तो उसे तर्क कर देगा और अगर मुसलमानों को मालूम हो जाए के इसने मन्सूख़ की रिवायत की है तो वह भी उसे नज़रअन्दाज़ कर देंगे।
चैथी क़िस्म उस ‘ाख़्स की है जिसने ख़ुदा व रसूल (स0) के खि़लाफ़ ग़लत बयानी से काम नहीं लिया है और वह ख़ौफ़े ख़ुदा और ताज़ीमे रसूले ख़ुदा के ऊपर झूठ का दुश्मन भी है और इससे भूल-चूक भी नहीं हुई है बल्कि जैसे रसूले अकरम (स0) ने फ़रमाया है वैसे ही महफ़ूज़ रखा है। न उसमें किसी तरह का इज़ाफ़ा किया है और न कमी की है नासिख़ ही को महफ़ूज़ किया है और उसी पर अमल किया है और मन्सूख़ को भी अपनी नज़र में रखा है और उससे इजतेनाब बरता है, ख़ास व आम और मोहकम व मुतशाबेह को भी पहचानता है और उसी के मुताबिक़ अमल भी करता है।
लेकिन मुश्किल यह हैे के कभी कभी रसूले अकरम (स0) के इरशादात के दो रूख़ होते थे, बाज़ का ताल्लुक़ ख़ास अफ़राद (या ख़ास वक़्त) से होता था और कुछ आम होते थे (कुछ वह कलेमात जो तमाम औक़ात और तमाम अफ़राद के मुताल्लिक़) और इन कलेमात को वह ‘ाख़्स भी सुन लेता था जिसे यह नहीं मालूम था के ख़ुदा और रसूल का मक़सद क्या है तो यह सुनने वाले उसे सुन तो लेते थे और कुछ इसका मफ़हूम भी क़रार दे लेते थे मगर इसके हक़ीक़ी मानी और मक़सद और वजह से नावाक़िफ़ होते थे और तमामम असहाबे रसूले अकरम (स0) की हिम्मत भी नहीं थी के आपसे सवाल कर सकें और बाक़ायदा तहक़ीक़ कर सकें बल्कि इस बात का इन्तेज़ार किया करते थे के कोई सहराई या परदेसी आाकर आपसे सवाल करे तो वह भी सुन लें, यह सिर्फ़ मैं थाा के मेरे सामने से कोई ऐसी बात नहीं गुज़रती थी मगर यह के मैं दरयाफ़्त भी कर लेताा था और महफ़ूज़ भी कर लेता था।
यह हैं लोगों के दरमियान इख़्तेलाफ़ात के असबाब और रिवायात में तज़ाद के अवामिल व मोहर्रकात।


(((-जिस तरह एक इन्सान की ज़िन्दगी के मुख़्तलिफ़ रूख़ होते हैं और बाज़ औक़ात एक रूख़ दूसरे से बिल्कुल अजनबी होता है के बेख़बर इन्सान इसे दोरंगियों मंे ‘ाामिल कर देता है। इसी तरह मुआसेरा और रिवायात के भी मुख़्तलिफ़ रूख़ होते हैं और बाज़ औक़ात एक रूख दूसरे से बिलकुल अजनबी और जुदागाना होता है और हर रूख़ के लिये अलग मफ़हूम होताा है और हर रूख़ के अलग एहकाम होते हैं। अब अगर कोई ‘ाख़्स इस हक़ीक़त से बाख़बर नहीं होता है तो वह एक ही रूख़ या एक ही रिवायत को ले उड़ता है और वसूक़ व एतबार के साथ यह बयाान करता है के मैंने ख़ुद रसूले अकरम (स0) से सुना है मगर उसे यह ख़बर नहीं होती है के ज़िन्दगी का कोई दूसरा रूख़ भी है, या इस बयान का कोई और भी पहलू है जो क़ब्ल याा बाद दूसरे मनासिब मौक़े पर बयान हो चुका है या बयान होने वाला है और इस तरह इश्तेहाबात का एक सिलसिला ‘ाुरू हो जाता है और दरहक़ीक़त रिवयात में गुम हो जाती है। चूंके दीदा व दानिस्ता कोई गुनाह या इश्तेबाह नहीं होता है।-)))