ख़ुत्बात
 

206-आपका इरषादे गिरामी

(जब आपने जंगे सिफ़्फ़ीन के ज़माने में अपने बाज़ असहाब के बारे में सुना के वह अहले “ााम को बुरा भला कह रहे हैं)





मैं तुम्हारे लिये इस बात को नापसन्द करता हूँ के तुम गालियां देने वाले हो जाओ, बेहतरीन बात यह है के तुम उनके आमाल और हालात का तज़किरा करो ताके बात भी सही रहे और हुज्जत भी तमाम हो जाए और फिर गालियां देने के बजाए यह दुआ करो के ख़ुदाया! हम सबके ख़ूनों को महफ़ूज़ कर दे और हमारे मुआमलात की इस्लाह कर दे और उन्हें गुमराही से हिदायत के रास्तु पर लगा दे ताके नावाक़िफ़ लोग हक़ से बाख़बर हो जाएं और हर्फ़े बातिल कहने वाले अपनी गुमराही और सरकषी से बाज़ आ जाएं।





(((-यह उस अम्र की तरफ़ इषारा है के मकान की वुसअत ज़ाती अग़राज़ के लिये हो तो उसका नाम दुनियादारी है, लेकिन अगर इसका मक़सद मेहमान नवाज़ी, सिलाए रहम, अदाएगीए हुक़ूक़, हिफ़ज़े आबरू, इज़हारे अज़मत व मज़हब हो तो इसका कोई ताल्लुक़ दुनियादारी से नहीं है और यह दीन व मज़हब ही का एक “ाोबा है, फ़र्क़ सिर्फ़ यह है के यह फ़ैसला नीयतों से होगा और नीयतों का जानने वाला सिर्फ़ परवरदिगार है कोई दूसरा नहीं-)))