ख़ुत्बात
 
205- आपका इरषादे गिरामी
(जिसमें तल्हा व ज़ुबैर को मुख़ातिब बनाया गया है जब इन दोनों ने बैयत के बावजूद मष्विरा न करने और मदद न मांगने पर आपसे नाराज़गी का इज़हार किया)


तुमने मामूली सी बात पर तो ग़ुस्से का इज़हार कर दिया लेकिन बड़ी बातों को पसे पुष्त डाल दिया, क्या तुम यह बता सकते हो के तुम्हारा कौन सा हक़ ऐसा है जिससे मैंने तुमको महरूम कर दिया है? या कौन सा हिस्सा ऐसा है जिसपर मैंने क़ब्ज़ा कर लिया है? या किसी मुसलमान ने कोई मुक़द्दमा पेष किया हो और मैं उसका फ़ैसला न कर सका हूँ या उससे नावाक़िफ़ रहा हूँ या इसमें किसी ग़लती का षिकार हो गया हूँ।
ख़ुदा गवाह है के मुझे न खि़लाफ़त की ख़्वाहिष थी और न हुकूमत की एहतियाज, तुम्हीं लोगों ने मुझे इस अम्र की दावत दी और इस पर आमादा किया। इसके बाद जब यह मेरे हाथ में आ गई तो मैंने इस सिलसिले में किताबे ख़ुदा और इसके दस्तूर पर निगाह की और जो उसने हुक्म दिया था उसी का इत्तेबाअ किया और इस तरह रसूले अकरम (स0) की सुन्नत की इक़्तेदा की। जिसके बाद न मुझे तुम्हारी राय की कोई ज़रूरत थी और न तुम्हारे अलावा किसी की राय की और न मैं किसी हुक्म से जाहिल था के तुमसे मषविरा करता या तुम्हारे अलावा दीगर बरादराने इस्लाम से, और अगर ऐसी कोई ज़रूरत होती तो मैं न तुम्हें नज़रअन्दाज़ करता और न दीगर मुसलमानों को। रह गया यह मसला के मैंने बैतुलमाल की तक़सीम में बराबरी से काम लिया है तो यह न मेरी ज़ाती राय है और न इस पर मेरी ख़्वाहिष की हुक्मरानी है बल्कि मैंने देखा के इस सिलसिले में रसूले अकरम (स0) की तरफ़ से हमसे पहले फ़ैसला हो चुका है तो ख़ुदा के मुअय्यन किये हुए हक़ और उसके जारी किये हुए हुक्म के बाद किसी की कोई ज़रूरत ही नहीं रह गई है।
ख़ुदा “ााहिद है के इस सिलसिले में न तुम्हें षिकायत का कोई हक़ है और न तुम्हारे अलावा किसी और को, अल्लाह हम सबके दिलों को हक़ की राह पर लगा दे और सबको सब्र व “ाकीबाई की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।
ख़ुदा उस “ाख़्स पर रहमत नाज़िल करे जो हक़ को देख ले तो उस पर अमल करे या ज़ुल्म को देख ले तो उसे ठुकरा दे और साहेबे हक़ के हक़ में इसका साथ दे।


(((- अमीरूल मोमेनीन (अ0) ने इन तमाम पहलुओं का तज़किरा इसलिये किया है ताके तल्हा व ज़ुबैर की नीयतों का मुहासेबा किया जा सके और उनके अज़ाएम की हक़ीक़तों को बेनक़ाब किया जा सके के मुझसे पहले ज़मानों में यह तमाम नक़ाएस मौजूद थे, कभी हुक़ूक़ की पामाली हो रही थी, कभी इस्लामी सरमाये को अपने घराने पर तक़सीम किया जा रहा था। कभी मुक़द्देमात में फ़ैसले से आजिज़ी का एतराफ़ था और कभी सरीही तौर पर ग़लत फ़ैसला किया जा रहा था। लेकिन इसके बावजूद तुम लोगों की रगे हमीयत व ग़ैरत को कोई जुम्बिष नहीं हुई और आज जबके ऐसा कुछ नहीं है तो तुम बग़ावत पर आमादा हो गए हो। इसका मतलब यह है के तुम्हारा ताल्लुक़ दीन और मज़हब से नहीं है। तुम्हें सिर्फ़ अपने मफ़ादात से ताल्लुक़ है जब तक यह मफ़ादात महफ़ूज़ थे, तुमने हर ग़लती पर सुकूत इख़्तेयार किया और आज जब मफ़ादात ख़तरे में पड़ गए हैं तो “ाोरष और हंगामे पर आमादा हो गए हो।-)))