ख़ुत्बात
 
201-आपका इरशादे गिरामी
(जिसमें वाज़ेह रास्तों पर चलने की नसीहत फ़रमाई गई है)


अय्योहन्नास! देखो हिदायत के रास्ते पर चलने वालों की क़िल्लत की बिना पर चलने से मत घबराओ के लोगों ने एक ऐसे दस्तरख़्वान पर इज्तेमाअ कर लिया है जिसमें सेर होने की मुद्दत बहुत कम है और भूक की मुद्दत बहुत तवील है।
लोगों! याद रखो के रज़ामन्दी और नाराज़गी ही सारे इन्सानों को एक नुक्ते पर जमा कर देती है, नाक़ाए स्वालेह के पैर एक ही इन्सान ने काटे थे लेकिन अल्लाह ने अज़ाब सब पर नाज़िल कर दिया के बाक़ी लोग इसके अमल से राज़ी थे और फ़रमाया के इन लोगों ने नाक़े के पैर काट डाले और आखि़र में मज़ामत का शिकार हो गए। इनका अज़ाब यह था के ज़मीन झिटके से घड़घड़ाने लगी जिस तरह के ज़म ज़मीन में लोहे की तपती हुई फाली चलाई जाती है।
लोगों! देखो जो रौशन रास्ते पर चलता है वह सरचश्मे तक पहुंच जाता है और जो इसके खि़लाफ़ करता है वह गुमराही में पड़ जाता है।


(((- खुली हुई बात है के जिसे परवरदिगार ने नफ़्से रसूल (स0) क़रार दिया हो और ख़ुद सरकारे दो आलम (स0) ने बाबे मदीनतुल इल्म क़रार दिया हो उससे ज़्यादा होशियार, होशमन्द और साहेबे इल्म व हुनर कौन हो सकता है। लेकिन इसके बावजूद बाज़ नादान अफ़राद का ख़याल है के माविया ज्यादा होशियार और ज़ीरक था और इसीलिये उसकी सियासत ज़्यादा कामयाब थी, हालांके इसका राज़ होशियारी और होशमन्दी नहीं है, बल्कि इसका राज़ मक्कारी और ग़द्दारी है के माविया मक़सद के हुसूल के लिये हर वसीले को जाएज़ क़रार देता था और इसका मक़सद भी सिर्फ़ हुसूले इक़्तेदार और तख़्ते हुकूमत था और मौलाए कायनात की निगाह में न मक़सद वसीले के जवाज़ का ज़रिया था और न आपका मक़सद इक़तेदारे दुनिया का हुसूल था। आपका मक़सद दीने ख़ुदा का क़याम था और इस राह में इन्सान को हर क़दम फूंक-फूंक कर उठाना पड़ता है और हर सांस में मर्ज़ीए परवरदिगार का ख़याल रखना पड़ता है।))).