ख़ुत्बात
 
199-आपका इरशादे गिरामी
(जिसकी असहाब को वसीयत फ़रमाया करते थे)


देखो नमाज़ की पाबन्दी और उसकी निगेहदाश्त करो, ज़्यादा से ज़्यादा नमाज़ें पढ़ो और उसे तक़र्रुबे इलाही का ज़रिया क़रार दो के यह साहेबाने ईमान के लिये वक़्त की पाबन्दी के साथ वाजिब की गई है। क्या तुमने अहले जहन्नम का जवाब नहीं सुना है के जब उनसे सवाल किया जाएगा के तुम्हें किस चीज़ ने यहां तक पहुंचा दिया है तो कहेंगे के हम नमाज़ी नहीं थे। यह नमाज़ गुनाहों को इस तरह झाड़ती है जिस तरह दरख़्त के पत्ते झड़ जाते हैं और इसी तरह गुनाहों से आज़ादी दिलाती है जिस तरह जानवर आज़ाद किये जाते हैं। रसूले अकरम (स0) ने इसे उस गर्म चश्मे से तश्बीह दी है जो इन्सान के दरवाज़े पर हो और वह रोज़ाना उसमें पांच मरतबा ग़ुस्ल करे। ज़ाहिर है के इसपर किसी कसाफ़त के बाक़ी रह जाने का इमकान नहीं रह जाता है।
इसके हक़ को वाक़ेअन उन साहेबाने ईमान ने पहचाना है जिन्हें ज़ीनते मुताअे दुनिया या तिजारत और कारोबार कोई ‘ौ भी यादे ख़ुदा आौर नमाज़ व ज़कात से ग़ाफ़िल नहीं कर सकते हंै। रसूले अकरम (स0) इस नमाज़ के लिये अपने को ज़हमत में डालते थे हालांके उन्हें जन्नत की बशारत दी जा चुकी थी इसलिये के परवरदिगार ने फ़रमा दिया था के अपने अहल (घर वालों) को नमाज़ का हुक्म दो और ख़ुद भी इसकी पाबन्दी करो तो आप अपने अहल को हुक्म भी देते थे और ख़ुद ज़हमत भी बरदाश्त करते थे।
इसके बाद ज़कात को नमाज़ के साथ मुसलमानों के लिये वसीलाए मुक़र्रब क़रार दिया गया है, जो इसे तय्यब ख़ातिर से अदा करेगा उसके गुनाहों के लिये यह कफ़्फ़ारा बन जाएगी और उसे जहन्नम से बचा लेगी, ख़बरदार कोई ‘ाख़्स इसे अदा करन के बाद इसके बारे में फ़िक्र न करे और न अफ़सोस करे के जो ‘ाख़्स दिली लगन के बग़ैर इसे अदा करता है और फ़िर इससे बेहतर अज्र व सवाब की उम्मीद करता है (उससे बेहतर चीज़ के लिये चश्मे बराह रहता है) वह सुन्नत से बेख़बर और अज्र व सवाब के एतबार से ख़सारे में है और उसका आमाल बरबाद है और उसकी निदामत दाएमी है।


(((- इसमें कोई ‘ाक नहीं है के सरकारे दो आलम (स0) ने नमाज़ क़ायम करने की राह में बेपनाह ज़हमतों का सामना किया है। रात रात भर मुसल्ले पर क़याम किया है और तरह-तरह की दुश्मनों की अज़ीयतों को बरदाश्त किया है लेकिन मालिके कायनात ने इसका अज्र भी बेहिसाब इनायत किया है के नमाज़ सरकार की याद का बेहतरीन ज़रिया बन गई है और इसके ज़रिये सरकार की ‘ाख़्सीयत और रिसालत को अबदी हैसियत हासिल हो गई है। नमाज़ी अज़ान व अक़ामत ही से सरकार का कलमा पढ़ना ‘ाुरू का देता है आौर फ़िर तशहुद व सलाम तक यह सिलसिला जारी रहता है और इस तरह तमाम उम्मतों का रिश्ता इनके पैग़म्बरों से टूट चुका है लेकिन उम्मते इस्लामियाा का रिश्ता सरकारे दो आलम (स0) से नहीं टूट सकता है और यह नमाज़ बराबर आपकी याद को ज़िन्दा रखेगी और मुसलमानों को हुस्ने किरदार की दावत देती रहेगी।
ज़कात को नमाज़ के साथ बयान करने का ज़ाहेरी फ़लसफ़ा यह है के नमाज़ अब्द व माबूद के दरम्यान का रिश्ता है और ज़कात बन्दों और बन्दों के दरम्यान का ताल्लुक़ है आौर इस तरह इस्लाम का निसाब मुकम्मल हो जाता है के मुसलमान अपने मालिक की इताअत भी करता है और अपने बनी नौअ के कमज़ोर अफ़राद का ख़याल भी रखता है और उनकी शिरकत के बग़ैर ज़िन्दा नहीं रहना चाहता है।)))


इसके बाद अमानतों की अदायगी का ख़याल रखो के अमानतदारी न करने वाला नाकाम होता है। अमानत को बलन्दतरीन आसमानों, फ़र्श ‘ाुदा ज़मीनों और बलन्द व बाला पहाड़ों के सामने पेश किया गया है जिनसे बज़ाहिर तवील व अरीज़ और आला व अरफ़ा कोई ‘ौ नहीं है और अगर कोई ‘ौ अपने तूल व अर्ज़ (लम्बाई, चैड़ाई या क़ूवत और ग़लबे) और ताक़त की बिना पर अपने को बचा सकती है तो यही चीज़ है। लेकिन यह सब ख़यानतत के अज़ाब से ख़ौफ़ज़दा हो गए और इस नुक्ते को समझ लिया है जिसको इनसे ज़ईफ़तर इन्सान ने नहीं पहचाना के वह अपने नफ़्स पर ज़ुल्म करने वाला और नावाक़िफ़ था।
परवरदिगार पर बन्दों के दिन व रात के आमाल में से कोई ‘ौ मख़फ़ी नहीं है। वह लताफ़त की बिना पर ख़बर रखता है और इल्म के एतबार से अहाता रखता है। तुम्हारे आज़ा ही उसके गवाह हैं और तुम्हारे हाथ पांव ही उसके लश्कर हैं। तुम्हारे ज़मीर उसके जासूस हैं और तुम्हारी तन्हाइयां भी उसकी निगाह के सामने हैं।