ख़ुत्बात
 
198- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जिसमें ख़ुदा के आलिमे जुजि़्यात होने पर ताकीद की गई है और फिर तक़वा पर आमादा किया गया है)


वह परवरदिगार सहराओं में जानवरों की फ़रयाद को भी जानता है और तनहाइयों में बन्दों के गुनाहों को भी, वह गहरे समन्दरों में मछलियों के रफ़्त व आमद से भी बाख़बर है और तेज़ व तन्द हवाओं से पैदा होने वाले तलातुम से भी। और मैं गवाही देता हूँ के मोहम्मद (स0) ख़ुदा के मुन्तख़ब बन्दे, उसकी वही के सफ़ीर और उसकी रहमत के रसूल हैं।
अम्माबाद! मैं तुम सबको उसी ख़ुदा से डरने की नसीहत कर रहा हूँ जिसने तुम्हारी खि़लक़त की इब्तेदा की है और उसी की बारगाह में तुम्हें पलट कर जाना है, उसी के ज़रिये तुम्हारे मक़ासिद की कामयाबी है और उसी की तरफ़ तुम्हारी रग़बतों की इन्तेहा है। उसी की सिम्त तुम्हारा सीधा रास्ता है और उसी की तरफ़ तुम्हारी फ़रयादों का निषाना है।
यह तक़वाए इलाही तुम्हारे दिलों की बीमारी की दवा है और तुम्हारे क़ुलूब के अन्धेपन की बसारत, यह तुम्हारे जिस्मों की बीमारी की षिफ़ा का सामान है और तुम्हारे सीनों के फ़साद की इस्लाह, यही तुम्हारे नुफ़ूस की गन्दगी की तहारत है और यही तुम्हारी आंखों के चुन्धियाने की जला, इसी में तुम्हारे दिल के इज़्तेराब का सुकून है और यही ज़िन्दगी की तारीकियों की ज़िया है, इताअते ख़ुदा को अन्दर का “ाोआर बनाओ सिर्फ़ बाहर का नहीं, और उसे बातिन में हासिल करो सिर्फ़ ज़ाहिर में नहीं। अपनी पस्लियों के दरम्यान समो लो और अपने जुमला उमूर का हाकिम क़रार दो, तष्नगी में विरूद के लिये चष्मा तसव्वुर करो और मन्ज़िले मक़सूद तक पहुंचने के लिये वसीला क़रार दो। अपने रोज़े फ़ुरूअ के लिये सिपर बनाओ और अपनी तारीक क़ब्रों के लिये चिराग़, अपनी तूलानी वहषते क़ब्र के लिये मोनिस बनाओ और अपने रन्ज व ग़म के मराहेल के लिये सहारा, इताअते इलाही तमाम घेरने वाले बरबादी के असबाब, आने वाले ख़ौफ़नाक मराहेल और भड़कती हुई आग के “ाोले के लिये हरज़बान है। जिसने तक़वा को इख़्तेयार कर लिया उसके लिये सख़्ितयां क़रीब आकर दूर चली जाती हैं और उमूरे ज़िन्दगी तल्ख़ (बदमज़ा) होने के बाद “ाीरीं हो जाते हैं। मौजें तह ब तह हो जाने के बाद भी हट जाती हैं और दुष्वारियां मषक़्क़तों में मुब्तिला कर देने के बाद भी आसान हो जाती हैं। क़हत के बाद करामतों की बारिष “ाुरू हो जाती है और सहाबे रहमत हट जाने के बाद फिर बरसने लगता है और नेमतों के चष्मे जारी जो जाते हैं, फ़ुवार की कमी के बाद बरकत की बरसात “ाुरू हो जाती है।


(((-इस मुक़ाम पर मौलाए कायनात ने इस नुक्ते की तरफ़ मुतवज्जो करना चाहा है के तक़वा का फ़ायदा सिर्फ़ आखि़रत तक महदूद नहीं है के तुम यहाँ गुनाहों से परहेज़ करो, मालिक वहां तुम्हें आतिषे जहन्नम से महफ़ूज़ कर देगा बल्कि यह तक़वा आखि़रत के साथ दुनिया के हर मरहले पर काम आने वाला है और किसी मरहले पर इन्सान को नज़रअन्दाज़ करने वाला नहीं है। मुष्किलात से निजात दिलाना इसी तक़वा का कारनामा है और तूफ़ान का मुक़ाबला इसी तक़वा की ताक़त से होता है, रहमत के चष्मे इसी से जारी होते हैं और फ़़ल व करम के बादल इसी की बरकत से बरसते हैं और “ाायद यह इस नुक्ते की तरफ़ इषारा ह के इन्सानी ज़िन्दगी की सारी परेषानियां उसके आमाल की कमज़ोरियों से पैदा होती हैं, जब इन्सान तक़वा के ज़रिये किरदार को मज़बूत करेगा तो हर परेषानी से मुक़ाबला आसान हो जाएगा।
इसका यह मतलब हरगिज़ नहीं है के मुत्तक़ीन की ज़िन्दगी में परेषानी नहीं होती है और वह चैन और सुकून की ज़िन्दगी गुज़ारते हैं, ऐसा होता तो सब्र का कोई काम न होता और मुत्तक़ीन का सिलसिला साबेरीन से अलग हो जाता, बल्कि इसका मतलब सिर्फ़ यह है के तक़वा सब्र का हौसला पैदा करता है और तक़वा के ज़रिये मसाएब से मुक़ाबला करने का हौसला पैदा हो जाता है और उसकी बरकत से रहमतों का नुज़ूल “ाुरू हो जाता है-)))


अल्लाह से डरो जिसने तुम्हें नसीहत से फ़ायदा पहुंचाया है और अपने पैग़ाम के ज़रिये नसीहत की है और अपनी नेमत से तुम पर एहसान किया है, अपने नफ़्स को उसकी इबादत के लिये हमवार करो और उसके हक़ की इताअत से ओहदा बरआ होने की कोषिष करो, और इसके बाद याद रखो के यह इस्लाम वह दीन है जिसे मालिक ने अपने लिये पसन्द फ़रमाया है और अपनी निगाहों में इसकी देख भाल की है और इसे बेहतरीन ख़लाएक़ के हवाले किया है और अपनी मोहब्बत पर इसके सुतूनों को क़ायम किया है। इसकी इज़्ज़त के ज़रिये अदयान को सरनिगों किया है और इसकी बलन्दी के ज़रिये मिल्लतों की पस्ती का इज़हार किया है। इसके दुष्मनों को इसकी करामत के ज़रिये ज़लील किया है और इससे मुक़ाबला करने वालों को इसकी नुसरत के ज़रिये रूसवा किया है इसके रूकन के ज़रिये ज़लालत के अरकान को मुनहदिम किया है और इसके हौज़ से प्यासों को सेराब किया है और फ़िर पानी उलचने वालों के ज़रिये इन हौज़ों को भर दिया है।
इसके बाद इस दीन को ऐसा बना दिया है के इसके बन्धन टूट नहीं सकते हैं, इसकी कड़ियां खुल नहीं सकती हैं, इसकी बुनियाद मुनहदिम नहीं हो सकती है, इसके सुतून गिर नहीं सकते हैं, इसका दरख़्त उखड़ नहीं सकता है, उसकी मुद्दत तमाम नहीं होे सकती है, उसके आसार मिट नहीं सकते हैं (न उसके क़वानीन महो होते हैं) उसकी “ााख़ेंक ट नहीं सकती हैं उसके रास्ते तंग नहीं हो सकते हैं। उसकी आसानियां दुष्वार नहीं हो सकती हैं, उसकी सफ़ेदी में स्याही नहीं है और उसकी इस्तेक़ामत में कजी नहीं है, इसकी लकड़ी टेढ़ी नहीं है और इसकी वुसअत में दुष्वारी नहीं है। इसका चिराग़ बुझ नहीं सकता है और इसकी हिलावत में तल्ख़ी नहीं आ सकती है। इसके सुतून ऐसे हैं जिनके पाये हक़ की ज़मीन में नस्ब किये गये हैं और फिर इसकी असास को पाएदार बनाया गया है। इसके चष्मों का पानी कम नहीं हो सकता है और इसके चिराग़ों की लौ मद्धम नहीं हो सकती है। इसके मिनारों से राहगीर हिदायत पाते हैं और इसके निषानात को राहों में निषाने मन्ज़िल बनाया जाता है। इसके चष्मों से प्यासे सेराब होते है और परवरदिगार ने इसके अन्दर अपनी रिज़ा की इन्तेहाई रखी, अपने बलन्दतरीन अरान और अपनी इताअत का उरूज क़रार दिया है। यह दीन उसके नज़दीक मुस्तहकम अरकान वाला बलन्दतरीन बुनियादों वाला हक़ीक़ी (बलन्द) दलाएल वाला, रौषन ज़ियाओं वाला, ग़ालिब सलतनत वाला, बलन्द बुनियाद वाला और नामुमकिन तबाही वाला है। इसके “ारफ़ का तहफ़्फ़ुज़ करो, इसके एहकाम का इत्तेबाअ करो, उसके हुक़ूक़ को अदा करो और उसे उसकी वाक़ई मन्ज़िल पर क़रार दो।


(((-दीने इस्लाम का सबसे बड़ा इम्तेयाज़ यह है के इसके क़वानीन ख़ालिक़े कायनात ने बनाए हैं और हर क़ानून को फ़ितरते बषर से हमआहंग बनाया है उसने इसकी तषरीह में अपने महबूबतरीन बन्दे को भी दख़ील नहीं किया है और न किसी को इसके क़वानीन में तरमीम करने का हक़ दिया है। ज़ाहिर है के जो क़ानूने ख़ालिक़ व मालिक के कलाम के नतीजे में मन्ज़रे आम पर आएगा उसकी बक़ा की ज़मानत उसके दफ़आत के अन्दर ही होगी और जब तक यह कायनात बाक़ी रहेगी इसके मामलात में तग़य्युर व तबद्दुल की ज़रूरत न होगी।
इस्लाम के दीने पसन्दीदा होने का असर है के इसके सामने तमाम अदयाने आलम हक़ीर इसके मुक़ाबले में तमाम दुष्मनाने मज़हब ज़लील हैं। मालिक ने इसकी बुनियाद मोहब्बत पर रखी है और इसकी असास रहमत और रूबूबीयत को क़रार दिया है। इसका तसलसुल नाक़ाबिले इख़्तेताम है और इसके हलक़े नाक़ाबिले इन्फ़ेसाम। इसी में इन्सानियत की प्यास बुझाने का सामान है और इसी में हिदायत के तलबगारों के लिये बेहतरीन वसीलाए रहनुमाई है। रिज़ाए इलाही का सामन यही है इसके बग़ैर हिदायत का तसव्वुर मोहमिल है और इसके अलावा हर दीन नाक़ाबिले क़ुबूल है।-)))


इसके बाद मालिक ने हज़रत मोहम्मद (स0) को हक़ के साथ मबऊस किया जब दुनिया फ़ना की मन्ज़िल से क़रीबतर हो गई और आखि़रत सर पर मण्डलाने लगी, जब उजाला अन्धेरों में तबदील होने लगा और वह अपने चाहने वालों के लिये एक मुसीबत बनकर खड़ी हो गई, इसका फ़र्ष खुरदुरा हो गया और फ़ना के हाथों में अपनी मेहार देने के लिये तैयार हो गई। इस तरह के इसकी मुद्दत ख़ातमे के क़रीब पहुंच गई। इसकी फ़ना के आसार क़रीब आ गए। इसके अहल ख़त्म होने लगे, इसके हलक़े टूटने लगे, इसके असबाब मुन्तषिर होने लगे, इसके निषानात मिटने लगे, इसके ऐब खुलने लगे और इसके दामन सिमटने लगे।
अल्लाह ने इन्हें पैग़ाम रसानी का वसीला, उम्मत की करामत, अहले ज़माना की बहार, आवान व अन्सार की बलन्दी का ज़रिया और मददगार व अन्सार अफ़राद की इज़्ज़त व “ाराफ़त का वास्ता क़रार दिया है।
इसके बाद इन पर उस किताब को नाज़िल किया जिसकी कन्दील बुझ नहीं सकती है और जिसके चिराग़ की लौ मद्धम नहीं पड़ सकती है वह ऐसा समन्दर है जिसकी थाह मिल नहीं सकती है और ऐसा रास्ता है जिस पर चलने वाला भटक नहीं सकता है। ऐसी “ाुआअ जिसकी ज़ौ तारीक नहीं हो सकती है और ऐसा हक़ व बातिल का इम्तियाज़ जिसका बरहान कमज़ोर नहीं हो सकता है। ऐसी वज़ाहत जिसके अरकान मुनहदिम नहीं हो सकते हैं और ऐसी षिफ़ा जिसमें बीमारी का कोई ख़ौफ़ नहीं है। ऐसी इज़्ज़त जिसके अन्सार पस्पा नहीं हो सकते हैं और ऐसा हक़ किसके आवान बेयार व मददगार नहीं छोड़े जा सकते हैं।
यह ईमान का मअदन व मरकज़, इल्म का चष्मा और समन्दर, अदालत का बाग़ और हौज़, इस्लाम का संगे बुनियाद और असास, हक़ की वादी और इसका हमवार मैदान है। यह वह समन्दर है जिसे पानी निकालने वाले ख़त्म नहीं कर सकते हैं और वह चष्मा है जिसे उलचने वाले ख़ुष्क नहीं कर सकते हैं। वह घाट है जिस पर वारिद होने वाले इसका पानी कम नहीं कर सकते हैं और वह मन्ज़िल है जिसकी राह पर चलने वाले मुसाफ़िर भटक नहीं सकते हैं। वह निषाने मन्ज़िल है जो राहगीरों की नज़रों से ओझल नहीं हो सकता है और वह टीला है जिसका तसव्वुर करने वाले आगे नहीं जा सकते हैं।
परवरदिगार ने इसे ओलमा की सेराबी का ज़रिया, फ़ोक़हा के दिलों की बहार, स्वलहा के रास्तों के लिये “ााहेराह क़रार दिया है।


(((-कितना हसीन दौर था जब अम्बियाए कराम का सिलसिला क़ायम था, किताबें और सहीफ़े नाज़िल हो रहे थे, मुबल्लिग़ीने दीन व मज़हब अपने किरदार से इन्सानियत की रहनुमाई कर रहे थे और ज़मीन व आसमान के रिष्ते जुड़े हुए थे फिर यकबारगी क़ेरत का ज़माना आ गया और यह सारे सिलसिले टूट गए, दुनिया पर जाहेलियत का अन्धेरा छा गया और इन्सानियत ने अपनी ज़माम क़यादत जेहल व जाहेलीयत के हवाले कर दी।
ऐसे हालात में अगर सरकारे दो आलम (स0) का विरूद न होता तो यह दुनिया घटाटोप अन्धेरों ही की नज़र हो जाती और इन्सानियत को कोई रास्ता नज़र न आता। लेकिन यह मालिक का करम था के उसने रहमतुल लिलआलमीन को भेज दिया और अन्धेरी दुनिया को फिर दोबारा नूरे रिसालत से मुनव्वर कर दिया और आप के साथ एक नूर और नाज़िल कर दिया जिसका नाम क़ुराने मजीद था और जिसकी रौषनी नाक़ाबिले इख़्तेताम थी। यह बयकवक़्त दस्तूर भी था और एजाज़ भी, समन्दर भी था और चिराग़ भी। हक़ व बातिल का फ़ुरक़ान भी था और दीन व ईमान का बरहान भी, इसमें हर मर्ज़ का इलाज भी था और हर बीमारी का मदावा भी।
इसे मालिक ने सेराबी का ज़रिया भी बनाया था और दिलों की बहार भी। निषाने राह भी क़रार दिया और मन्ज़िले मक़सूद भी, जो “ाख़्स जिस नुक़्तए निगाह से देखे उसकी तस्कीन का सामान क़ुराने हकीम में मौजूद है और एक किताब सारी कायनात जिन व इन्स की हिदायत के लिये काफ़ी है बषर्ते के इसके मतालिब उन लोगों से उख़ज़ किये जाएं जिन्हें रासख़ोन फ़िल इल्म बनाया गया है और जिनके इल्मे क़ुरान की ज़िम्मेदारी मालिके कायनात ने ली है-)))

वह सरासर शिफ़ा है जिसके बाद कोई मर्ज़ नहीं रह सकता और वह नूर है जिसके बाद किसी ज़ुल्मत का इमकान नहीं है। वह रीसमान है जिसके हलक़े मुस्तहकम हैं और वह पनाहगाह है जिसकी बलन्दी महफ़ूज़ है। चाहने वालों के लिये इज़्ज़त, दाखि़ल होने वालों के लिये सलामती, इक़्तेदा करने वालों के लिये हिदायत, निस्बत करने वालों (जो इसे अपनी तरफ़ निस्बत दे उस) के लिये हुज्जत, बोलने वालों के लिये बुरहान (जो इसकी रू से बात करे उसके लिये दलील) और मनाज़िरा करने वालों के लिये ‘ााहिद है। बहस करने वालों की कामयाबी का ज़रिया है इसका बार उठाने वालों के लिये बोझ बटाने वाला, अमल करने वालों के लिये बेहतरीन सवारी, हक़ीक़त शिनासों के लिये बेहतरीन निशानी और असलहे सजने वालों के लिये सिपर है। फ़िक्र करने वालों के लिये इल्म और रिवायत करने वालों के लिये हदीस और क़ज़ावत करने वालों के लिये क़तई हुक्म और फ़ैसला है।