ख़ुत्बात
 
194- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जिसमें मुनाफ़ेक़ीन के औसाफ़ बयान किये गए हैं)


हम उस परवरदिगार का “ाुक्र अदा करते हैं के उसने इताअत की तौफ़ीक़ अता फ़रमाई और मासीयत से दूर रखा और फिर उससे एहसानात के मुकम्मल करने और उसकी रीसमाने हिदायत से वाबस्ता रहने की दुआ भी करते हैं। और इस बात की “ाहादत देते हैं के मोहम्मद (स0) उसके बन्दे और रसूल हैं। उन्होंने उसकी रिज़ा की ख़ातिर हर मुसीबत में अपने को डाल दिया और हर ग़ुस्से के घूंट को पी लिया। क़रीब वालों ने उनके सामने रंग बदल दिया और दूर वालों ने उन पर लष्कर कषी कर दी। अरबों ने अपनी ज़माम का रूख़ उनकी तरफ़ मोड़ दिया और अपनी सवारियों को उनसे जंग करने के लिये महमीज़ कर दिया यहां तक के अपनी औरतों को दूर दराज़ इलाक़ों और दूर इफ़तादा सरहदों से लाकर उनके सहन में उतार दिया।
बन्दगाने ख़ुदा! मैं तुम्हें तक़वा इलाही की वसीयत करता हूं और तुम्हें मुनाफ़ेक़ीन से होषियार कर रहा हूँ के यह गुमराह भी हैं और गुमराह कुन भी, मुनहरिफ़ भी हैं और मुनहरिफ़साज़ भी, यह मुसलसल रंग बदलते रहते हैं और तरह-तरह के फ़ितने उठाते रहते हैं, हर मक्रो फ़रेब के ज़रिये तुम्हारा ही क़स्द करते हैं और हर घात में तुम्हारी ही ताक में बैठते हैं। इनके दिल बीमार हैं और इनके चेहरे पाक व साफ़, अन्दर ही अन्दर चाल चलते हैं और नुक़सानात की ख़ातिर रेंगते हुए क़दम बढ़ाते हैं। इनका तरीक़ा दवा जैसा और इनका कलाम षिफ़ा जैसा है लेकिन इनका किरदार नाक़ाबिले इलाज मर्ज़ है, यह राहतों में हसद करने वाले, मुसीबतों में मुब्तिला कर देने वाले और उम्मीदों को नाउम्मीद बना देने वाले हैं। जिस राह पर देखो इनका मारा हुआ पड़ा है और जिस दिल को देखो वहाँ तक पहुंचने का एक सिफ़ारिषी ढूंढ रखा है।


(((-अगर सारी दुनिया के जराएम की फ़ेहरिस्त तैयार की जाए तो इसमें सरे फेहरिस्त निफ़ाक़ ही का नाम होगा जिसमें हर तरह की बुराई और हर तरह का ऐब पाया जाता है। निफ़ाक़ अन्दर से कुफ्ऱ व षिर्क की ख़बासत रखता है और बाहर से झूठ और ग़लत बयानी की कसाफ़त रखता है और इन दोनों से बदतरीन दुनिया का कोई जुर्म और कोई ऐब नहीं है।
दौरे हाज़िर का दक़ीक़तरीन जाएज़ा लिया जाए तो अन्दाज़ा होगा के इस दौर में आलमी सतह पर निफ़ाक़ के अलावा कुछ नहीं रह गया है। हर “ाख़्स जो कुछ कर रहा है उसका बातिन उसके खि़लाफ़ है और हर हुकूमत जिस बात का दावा कर रही है उसकी कोई वाक़ईयत नहीं है। तहज़ीब के नाम पर फ़साद, मवासलात के नाम पर तबाहकारी, अमने आलम के नाम पर असलहों की दौड़, तालीम के नाम पर बद एख़लाक़ी और मज़हब के नाम पर लामज़हबीयत ही इस दौर का का तरहे इम्तेयाज़ है और इसी को ज़बाने “ारीअत में निफ़ाक़ कहा जाता है-)))


हर रन्ज व ग़म के लिये आंसू तैयार रखे हुए हैं, एक दूसरे की तारीफ़ में हिस्सा लेते हैं और इसके बदले के मुन्तज़िर रहते हैं। सवाल करते हैं तो चिपक जाते हैं और बुराई करते हैं तो रूसवा करके ही छोड़ते हैं और फ़ैसला करते हैं तो हद से बढ़ जाते हैं।
हर हक़ के लिये एक बातिल तैयार कर रखा है और हर सीधे के लिये एक कजी का इन्तेज़ाम कर रखा है। हर ज़िन्दा के लिये एक क़ातिल मौजूद है और हर दरवाज़े के लिये एक कुन्जी बना रखी है और हर रात के लिये एक चिराग़ मुहैया कर रखा है। तमअ के लिये नामूस को ज़रिया बनाते हैं ताके अपने बाज़ार को रवाज दे सकें और अपने माल को राएज कर सकें। जब बात करते हैं तो मुष्तबा क़िस्म की और जब तारीफ़ करते हैं तो बातिल को हक़ का रंग देकर। उन्होंने अपने लिये रास्ते को आसान बना लिया है और दूसरों के लिये तंगी पैदा कर दी है। यह “ौतान के गिरोह हैं और जहन्नुम के “ाोले , यही हिज़्बुष्षैतान के मिसदाक़ हैं और हिज़्बुष्षैतान का मुक़द्दर सिवाए ख़सारे के कुछ नहीं है।


(((-हक़ीक़ते अम्र यह है के मुनाफ़िक़ीन का कोई अम्र क़ाबिले एतबार नहीं होता और इनकी ज़िन्दगी सरापा ग़लत बयानी होती है। तारीफ़ करने पर आ जाते हैं तो ज़मीन व आसमान के क़लाबे मिला देते हैं और बुराई करने पर तुल जाते हैं तो आदमी को आलमी सतह पर ज़लील करके छोड़ते हैं। इसलिये के इनका न कोई ज़मीर होता है और न कोई मेयार, इन्हें सिर्फ़ मौक़े परस्ती से काम लेना है और इसी के एतबार से ज़बान खोलना है।
ख़ुत्बे के उनवान से यह अन्दाज़ा हुआ था के यह समाज के चन्द अफ़राद का एक गिरोह है जिसके किरदार वाज़ेह किया जा रहा है ताके लोग इस किरदार से होषियार रहें और अपनी ज़िन्दगी को निफ़ाक़ से बचाकर ईमान व तक़वा के रास्ते पर लगा दें, लेकिन तफ़सीलात को देखने के बाद महसूस होता है के यह पूरे समाज का नक़्षा है और सारा आलमे इन्सानियत इसी रंग में रंगा हुआ है। ज़िन्दगी का कोई “ाोबा ऐसा नहीं है जिसमें निफ़ाक़ की हुकमरानी न हो और इन्सान के किरदार का कोई रूख़ ऐसा नहीं है जिसमें वाक़ईयत और हक़ीक़त पाई जाती हो और जिसे निफ़ाक़ से पाक व पाकीज़ा क़रार दिया जा सके।
ऐसे हालात में तो हर “ाख़्स को अपने नफ़्स का जाएज़ा लेना चाहिये और मुनाफ़ेक़ीन के बारे में बयान किये हुए सिफ़ात से इबरत हासिल करनी चाहिये।-)))