ख़ुत्बात
 

191- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जिसमें हम्दे ख़ुदा, सनाए रसूल (स0) और वसीयते ज़ोहद व तक़वा का तज़किरा किया गया है)


सारी तारीफ़ उस अल्लाह के लिये है जिसकी हम्द हमहगीर और जिसका लष्कर ग़ालिब है और जिसकी अज़मत बलन्द व बाला है। मैं उसकी मुसलसल नेमतों और अज़ीमतरीन मेहरबानियों पर उसकी हम्द करता हूं के इसका हुक्म इस क़द्र अज़ीम है के वह हर एक को माफ़ करता है और फिर हर फ़ैसले में इन्साफ़ से भी काम लेता है और जो कुछ गुज़र गया और गुज़र रहा है सबका जानने वाला भी है। वह मख़लूक़ात को सिर्फ़ अपने इल्म से पैदा करने वाला है और अपने हुक्म से ईजाद करने वाला है। न किसी की इक़्तेदा की है और न किसी से तालीम ली है। न किसी सानेअ हकीम की मिसाल की पैरवी की है और न किसी ग़लती का षिकार हुआ है और न मुषीरों की मौजूदगी में काम अन्जाम दिया है।
और मैं गवाही देता हूं के मोहम्मद (स0) उसके बन्दे और रसूल हैं। उन्हें उस वक़्त भेजा है जब लोग गुमराहियों में चक्कर काट रहे थे और जब हैरानियों में ग़लतां व पेचां थे। हलाकत की मेहारें उन्हें खींच रही थीं और कुदूरत व ज़न्ग के ताले इनके दिलों पर पड़े हुए थे।
बन्दगाने ख़ुदा! मैं तुम्हें तक़वाए इलाही की नसीहत करता हूं के यह तुम्हारे उपर अल्लाह का हक़ है और इससे तुम्हारा हक़ परवरदिगार पर पैदा होता है। इसके लिये अल्लाह से मदद मांगो और उसके ज़रिये उसी से मदद तलब करो के यह वक़वा आज दुनिया में सिपर और हिफ़ाज़त का ज़रिया और कल जन्नत तक पहुंचने का रास्ता है। इसका मसलक वाज़ेह और इसका राहेरौ फ़ायदा हासिल करने वाला है। और इसका अमानतदार हिफ़ाज़त करने वाला है। यह तक़वा अपने को उन पर भी पेष करता रहा है जो गुज़र गए और उन पर भी पेष कर रहा है जो बाक़ी रह गए हैं के सबको कल इसकी ज़रूरत पड़ने वाली है। जब परवरदिगार अपनी मख़लूक़ात को दोबारा पलटाएगा और जो कुछ अता किया है उसे वापस ले लेगा और जिन नेमतों से नवाज़ा है उनका सवाल करेगा, किस क़द्र कम हैं वह अफ़राद जिन्होंने इसको क़ुबूल किया है और इसका वाक़ेई हक़ अदा किया है। यह लोग अदद में बहुत कम हैं लेकिन परवरदिगार की इस तौसीफ़ के हक़दार हैं के ‘‘मेरे “ाुक्रगुज़ार बन्दे बहुत कम हैं’’। अब अपने कानों को उसकी तरफ़ मसरूफ़ करो और सई व कोषिष से इसकी पाबन्दी करो और उसे गुज़रती हुई कोताहियों का बदल क़रार दो।


(((-खुली हुई बात है के बन्दा किसी क़ीमत पर परवरदिगार पर हक़ पैदा करने के क़ाबिल नहीं हो सकता है, उसका हर अमल करमे परवरदिगार और फ़ज़्ले इलाही का नतीजा है। लेहाज़ा इसका कोई इमकान नहीं है के वह इताअते इलाही अन्जाम देकर उसके मुक़ाबले में साहबे हक़ हो जाए और उस पर उसी तरह हक़ पैदा करे जिस तरह उसका हक्के़ इबादत व इताअत हर बन्दे पर है।
इस हक़ से मुराद भी परवरदिगार का यह फ़ज़्लो करम है के उसने बन्दों से इनाम और जज़ा का वादा कर लिया है और अपने बारे में यह एलान कर दिया है के मैं अपने वादे के खि़लाफ़ नहीं करता हूं जिसके बाद हर बन्दे को यह हक़ पैदा हो गया है के वह मालिक से अपने आमाल की जज़ा और उसके इनाम का मुतालेबा करे न इसलिये के उसने अपने पास से और अपनी ताक़त से कोई अमल अन्जाम दिया है के यह बात ग़ैरे मुमकिन है। बल्कि इसलिये के मालिक ने उससे सवाब का वादा किया है और वह अपने वादे को वफ़ा करने का ज़िम्मेदार है और उससे ज़र्रा बराबर इन्हेराफ़ नहीं कर सकता है। रिवायत में हक़्क़े मोहम्मद (स0) व आले मोहम्मद (स0) का मफ़हूम यही है के उन्होंने अपनी इबादात के ज़रिये वादाए इलाही की वफ़ा का इतना हक़ पैदा कर दिया है के उनके वसीले से दीगर अफ़राद भी इस्तेफ़ादा कर सकते हैं। बषर्ते के वह भी उन्हीं के नक़्षे क़दम पर चलें और उन्हीं की तरह इताअत व इबादत अन्जाम देने की कोषिष करें।)))


और मुख़ालिफ़ के मुक़ाबले में मवाक़िफ़ बनाओ, उसके ज़रिये अपनी नीन्द को बेदारी में तब्दील करो और अपने दिन गुज़ार दो। उसे अपने दिलों का “ाोआर बनाओ, उसी के ज़रिये अपने गुनाहों को धो डालो, अपने इमराज़ का इलाज करो और अपनी मौत की तरफ़ सबक़त करो, उनसे इबरत हासिल करो जिन्होंने इसे ज़ाया कर दिया है और ख़बरदार वह तुमसे इबरत न हासिल करने पाएं जिन्होंने इसका रास्ता इख़्तेयार किया है। इसकी हिफ़ाज़त करो और इसके ज़रिये से अपनी हिफ़ाज़त करो। दुनिया से पाकीज़गी इख़्तेयार करो और आख़ेरत के आषिक़ बन जाओ। जिसे तक़वा बलन्द कर दे उसे पस्त मत बनाओ और जिसे दुनिया उचा बना दे उसे बलन्द मत समझो। इस दुनिया के चमकने वाले बादल पर नज़र न करो और इसके तरजुमान की बात मत सुनो इसके आवाज़ देने वाले की आवाज़ पर लब्बैक मत कहो और इसकी चमक-दमक से रोषनी मत हासिल करो और इसकी क़ीमती चीज़ों पर जान मत दो इसलिये के इसकी बिजली फ़क़त चमक दमक है और इसकी बातें सरासर ग़लत हैं इसके अमवाल लुटने वाले हैं और इसका बेहतरीन छिनने वाला है (इसका उमदा मताअ ग़ारत होने वाला है)।
आगाह हो जाओ के यह दुनिया झलक दिखाकर मुंह मोड़ लेने वाली चण्डाल, मुंह ज़ोर अड़ियल झूटी, ख़ाएन, हटधर्म, नाषुक्री करने वाली सीधी राह से मुन्हरिफ़ और मुंह फेरने वाली और कज्र व पेच व ताब खाने वाली है। इसका तरीक़ा इन्तेक़ाल है और इसका हर क़दम ज़लज़लाअंगेज़ है। इसकी इज़्ज़त भी ज़िल्लत है और इसकी माक़ईयत भी मज़ाक़ है (इसकी सन्जीदगी ऐन हरज़ह सराई है) इसकी बलन्दी पस्ती है और यह जंगो जदल, हर्ब व ज़र्ब, लूट मार, हलाकत व ताराजी का घर है, इसके रहने वाले पा ब रकाब हैं और चल चलाव के लिये तैयार हैं, इनकी कैफ़ियत वस्ल व फ़िराक़ की कषमकष की है, जहां रास्ते गुम हो गए हैं और गुरेज़ की राहें मुष्किल हो गई हैं और मन्सूबे नाकाम हो चुके हैं, महफ़ूज़ घाटियों ने उन्हें मुष्किलात के हवाले कर दिया है और उनके घरों ने उन्हें दूर फेंक दिया है, दानिष्मन्दियों ने भी उन्हें दरमान्दा कर दिया है। अब जो बच गए हैं उनमें कुछ की कोंचें कटी हुई हैं, कुछ गोष्त के लोथड़े हैं जिनकी खाल उतार ली गई है। कुछ कटे हुए जिस्म और बहते हुए ख़ून जैसे हैं कुछ अपने हाथ काटने वाले हैं और कुछ कफे अफ़सोस मिलने वाले, कुछ फ़िक्र व तरद्दुद में कोहनियां रूख़सारों पर रखे हुए और कुछ अपनी फ़िक्र से बेज़ार और अपने इरादे से रूजू करने वाले हैं। (लेकिन अब कहां) जबके चारासाज़ी का मौक़ा हाथ से निकल चुका है। धेलों ने मुंह फेर लिया है और हलाकत सामने आ गई है मगर छुटकारे का वक़्त निकल चुका है। यह एक न होने वाली बात हैं जो चीज़ गुज़र गई वह गुज़र गई, (अब निकल भागने का वक़्त कहां, यह तो एक अनहोनी बात है) और जो वक़्त चला गया वह चला गया और दुनिया अपने हाल में मनमानी करती हुई गुज़र गई- ‘‘न उन पर आसमान रोया और न ज़मीन और न ही उन्हें मोहलत दी गई।’’


(((- ख़ुदा जानता है के इस दुनिया का कोई हाल क़ाबिले एतबार नहीं है और इसकी किसी कैफ़ियत में सुकून व क़रार नहीं है। इसका पहला ऐब तो यह है के इसके हालात में ठहराव (सुकून) नहीं है। सुबह का सवेरा थोड़ी देर में दोपहर बन जाता है और आफ़ताब का “ाबाब थोड़ी देर में ग़ुरूब हो जाता है। इन्सान बचपने की आज़ादियों से मुस्तफ़ैद भी नहीं होने पाता है के जवानी की धूप आ जाती है और जवानी की रानाइयों से लज्ज़त अन्दोज़ नहीं होने पाता है के ज़ईफ़ी की कमज़ोरियां हमलावर हो जाती हैं, ग़रज़ कोई हालत ऐसी नहीं है जिसपर एतबार किया जा सके और जिसे किसी हद तक पुरसुकून कहा जा सके।
और दूसरा ऐब यह है के अलग-अलग कोई दौर भी क़ाबिले इत्मीनान नहीं है, दौलतमन्द दौलत को रो रहे हैं और ग़रीब ग़ुरबत को, बीमार बीमारियों का रोना रो रहे हैं और सेहतमन्द सेहत के तक़ाज़ों से आजिज़ हैं, बेऔलाद औलाद के तलबगार हैं और औलाद वाले औलाद की ख़ातिर परेषान।
ऐसी सूरतेहाल में तक़ाज़ाए अक़्ल यही है के दुनिया को हदफ़ और मक़सद तसव्वुर न किया जाए और इसे सिर्फ़ आखि़रत के वसीले के तौर पर इस्तेमाल किया जाए, इसकी नेमतों में से इतना ही ले लिया जाए जितना आखि़रत में काम आने वाला है और बाती को इसके अहल के लिये छोड़ दिया जाए।-)))