ख़ुत्बात
 
190- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जिसमें हम्दे ख़ुदा, सनाए रसूल (स0) और नसीहते तक़वा का ज़िक्र किया गया है)


मैं उसकी हम्द करता हूं उसके इनआम का “ाुक्रिया अदा करने के लिये और उससे मदद चाहता हूं उसके हुक़ूक़ से ओहदाबरा होने के लिये, उसका नष्करा ग़ालिब है और बुज़ुर्गी अज़ीम है।
मैं इस बात की “ाहादत देता हूं के मोहम्मद (स0) अल्लाह के बन्दे और उसके रसूल हैं। उन्होंने उसकी इताअत की दावत दी है और उसके दुष्मनों पर ग़लबा हासिल किया है उसके दीन में जेहाद के ज़रिये। उन्हें इस बात से न ज़ालिमों का उनके झुठलाने पर इज्तेमाअ रोक सका है और न उनकी नूरे हिदायत की ख़ामोष करने की ख़्वाहिष मना कर सकी है।
तुम लोग तक़वाए इलाही से वाबस्ता हो जाओ के उसकी रीसमान के बन्धन मज़बूत और उसकी पनाह की चोटी हरजहत से महफ़ूज़ है। मौत और उसकी सख़्ितयों के सामने आने से पहले उसकी तरफ़ सबक़त करो और उसके आने से पहले ज़मीन हमवार कर लो। उसके नुज़ूल से पहले तैयारी मुकम्मल कर लो के अन्जामकार बहरहाल क़यामत है और यह बात हर उस “ाख़्स की नसीहत के लिये काफ़ी है जो साहबे अक़्ल हो और उसमें जाहिल के लिये बड़ी इबरत का सामान है और तुम्हें यह भी मालूम है के इस अन्जाम तक पहुंचने से पहले लहद और षिद्दते बरज़क़ का भी सामना है जहां बरज़ख़ की हौलनाकी, ख़ौफ़ की दहषत, पस्लियों का इधर से उधर हो जाना, कानों का बहरा हो जाना, क़ब्र की तारीकियां, अज़ाब की धमकियां क़ब्र के षिगाफ़ का बन्द किया जाना और पत्थर की सिलों से पाट दिया जाना भी है।
बन्दगाने ख़ुदा! अल्लाह को याद रखो के दुनिया तुम्हारे लिये एक ही रास्ते पर चल रही है और तुम क़यामत के साथ एक ही रस्सी में बन्धे हुए हो और गोया के उसने अपने अलामात को नुमायां कर दिया है और उसके झण्डे क़रीब आ चुके हैं।


((( बाज़ हज़रात का ख़याल है के अहलेबैत (अ0) के मामले से मुराद दीन व इमामत और अक़ीदे व किरदार है के उसका हर हाल में बरक़रार रखना और उससे किसी भी हाल में दस्तबरदार न होना ह “ाख़्स के बस की बात नहीं है वरना लोग अदना मुसीबत में भी दीन से दस्तबरदार हो जाते हैं और जान बचाने की पनाहगाहें ढूंढने लगते हैं और बाज़ हज़रात का ख़याल है के इससे मुराद अहलेबैत (अ0) की रूहानी अज़मत और उनकी नूरानी मन्ज़िल है जिसका इदराक हर इन्सान के बस का काम नहीं है बल्कि उसके लिये अज़ीम ज़र्फ़ दरकार है लेकिन बहरहाल इस तसव्वुर में भी उनके नक़्षे क़दम पर चलने को भी “ाामिल करना पड़ेगा वरना सिर्फ़ अक़ीदा क़ायम करने के लिये इम्तेहान “ाुदा और आज़माए हुए दिल की ज़रूरत नहीं है।)))


तुम्हेंं अपने रास्ते पर खड़ा कर दिया है और गोया के वह अपने ज़लज़लों समेत नमूदार हो गई है और अपने सीने टेक दिये हैं और दुनिया ने अपने बसने वालों से मुंह मोड़ लिया है और उन्हें अपनी गोद से अलग कर दिया है। गोया के यह एक दिन था जो गुज़र गया या एक महीना था जो बीत गया, और इसकी नई चीज़ पुरानी हो गई और उसका तन्दरूस्त, लाग़र हो गया। उस मौक़फ़ में जिसकी जगह तंग है और जिसके उमूर मुष्तबा (पेचीदा) और अज़ीम हैं वह आग है जिसका ज़ख़्म कारी है और जिसके “ाोले बलन्द हैं (जिसकी ईज़ाएं “ादीद और चीख़ें बलन्द हैं)। इसकी भड़क नुमायां है और भड़कने की आवाज़ें ग़ज़बनाक हैं। इसकी लपटें तेज़ हैं और बुझने के इमकानात बईद (मुष्किल) हैं। इसका भड़कना तेज़ है और इसके ख़तरात दहषतनाक हैं इसका गढ़ा तारीक है और इसके हर तरफ़ (एतराफ़) अन्धेरा ही अन्धेरा है। इसकी देगें खौलती हुई हैं और इसके उमूर दहषतनाक हैं उस वक़्त सिर्फ़ ख़ौफ़े ख़ुदा रखने वालों को गिरोह गिरोह जन्नत की तरफ़ ले जाया जाएगा जहां अज़ाब से महफ़ूज़ होंगे और इताब का सिलसिला ख़त्म हो चुका होगा। जहन्नुम से अलग कर दिये जाएंगे और अपने घर में इतमीनान से रहेंगे जहां अपनी मन्ज़िल और अपने मुस्तक़र से ख़ुष होंगे यही वह लोग हैं जिनके आमाल दुनिया में पाकीज़ा थे और जिनकी आंखें ख़ौफ़े ख़ुदा से गिरयां थीं। इनकी रातें ख़ुषू और अस्तग़फ़ार की बिना पर दिन जैसी थीं और इनके दिन दहषत और गोषानषीनी की बिना पर रात जैसे थे। अल्लाह ने जन्नत को उनकी बाज़गष्त की मन्ज़िल बना दिया है और जज़ाए आख़ेरत को उनका सवाब। यह हक़ीक़तन इसी इनाम के हक़दार और अहल थे जो मुल्के दाएम और नईम अबदी में रहने वाले हैं।


बनदगाने ख़ुदा! उन बातों का ख़याल रखो जिनके ज़रिये से कामयाबी हासिल करने वाला कामयाब होता है और जिनको सानेअ कर देने से बातिल वालों का घाटा होता है। अपनी मौत की तरफ़ आमाल के साथ सबक़त करो के तुम गुज़िष्ता आमाल के गिरवी हो और पहले वाले आमाल के मक़रूज़ हो और अब गोया के ख़ौफ़नाक मौत तुमपर नाज़िल हो चुकी है जिससे न वापसी का इमकान है और न गुनाहों की माफ़ी मांगने की गुन्जाइष है। अल्लाह हमें और तुम्हें अपनी और अपने रसूल (स0) की इताअत की तौफ़ीक़ दे और अपने फ़ज़्ल व रहमत से हम दोनों से दरगुज़र फ़रमाए।
ज़मीन से चिमटे रहो और बलाओं पर सब्र करते रहो। अपने हाथ और अपनी तलवारों को ज़बान की ख़्वाहिषात का ताबेअ न बनाना और जिस चीज़ में ख़ुदा ने जल्दी नहीं रखी उसकी जल्दी न करना के अगर कोई “ाख़्स ख़ुदा और रसूल (स0) व अहलेबैत (अ0) के हक़ की मारेफ़त रखते हुए बिस्तर पर मर जाए तो वह भी “ाहीद ही मरता है और उसका अज्र भी ख़ुदा ही के ज़िम्मे होता है और वह अपनी नीयत के मुताबिक़ नेक आमाल का सवाब भी हासिल कर लेता है ख़ुद नीयत भी तलवार खींचने के क़ाएम मुक़ाम हो जाती है और हर “ौ की एक मुद्दत होती है और उसका एक वक़्त मुअय्यन है।


(((-हालात इस क़द्र संगीन थे के इमाम (अ0) के मुख़लिस असहाब मुनाफ़िक़ीन और मुआनेदीन की रविष को बरदाष्त न कर सकते थे और हर एक की फ़ितरी ख़्वाहिष थी के तलवार उठाने की इजाज़त मिल जाए और दुष्मन का ख़ात्मा कर दिया जाए जो हर दौर के जज़्बाती इन्सान की तमन्ना और आरज़ू होती है, लेकिन हज़रत यह नहीं चाहते थे के कोई काम मर्ज़ीए इलाही और मसलहते इस्लाम के खि़लाफ़ हो और मेरे मुख़लिसीन भी जज़्बात व ख़्वाहिषात के ताबेअ हो जाएं, लेहाज़ा पहले आपने सब्र व सुकून की तल्क़ीन की और इस अम्र की तरफ़ मुतवज्जो किया के इस्लाम ख़्वाहिषात का ताबेअ नहीं होता है। इस्लाम की “ाान यह है के ख़्वाहिषात इसका इत्तेबाअ करें और इसके इषारे पर चलें, इसके बाद मुख़्लेसीन के इस नेक जज़्बे की तरफ़ तवज्जो फ़रमाई के यह “ाौक़े “ाहादत व क़ुरबानी रखते हैं, कहीं ऐसा न हो के इनके हौसले पस्त हो जाएं और यह मायूसी का षिकार हो जाएं, लेहाज़ा इस नुक्ते की तरफ़ तवज्जो दिलाई के “ाहादत का दारोमदार तलवार चलाने पर नहीं है। “ाहादत का दारोमदार इख़लासे नीयत के साथ जज़्बए क़ुरबानी पर है लेहाज़ा तुम इस जज़्बे के साथ बिस्तर पर भी मर गए तो तुम्हारा “ाुमार “ाोहदा और स्वालेहीन में हो जाएगा तुम्हें इस सिलसिले में परेषान होने की ज़रूरत नहीं है-)))