ख़ुत्बात
 
189- आपका इरषादे गिरामी
(ईमान और वजूबे हिजरत के बारे में)


ईमान का एक वह हिस्सा है जो दिलों में साबित और मुस्तहकम होता है और एक वह हिस्सा है जो दिल और सीने के दरम्यान आरज़ी तौर पर रहता है, लेहाज़ा अगर किसी से बराअत और बेज़ारी भी करना हो तो इतनी देर इन्तेज़ार करो के उसे मौत आ जाए के उस वक़्त बेज़ारी बरमहल होगी।
हिजरत का क़ानून आज भी वही है जो पहले था, अल्लाह किसी क़ौम का मोहताज नहीं है चाहे जो ख़ुफ़िया तौर पर मोमिन रहे या अलल एलान ईमान का इज़हार करे हिजरत का इतलाक़ हुज्जते ख़ुदा की मारेफ़त के बग़ैर नहीं हो सकता है। लेहाज़ा जो “ाख़्स इसकी मारेफ़त हासिल करके इसका इक़रार कर ले वही मोहाजिर है।


(((-ईमान वह अक़ीदा है जो इन्सान के दिल की गहराइयों में पाया जाता है और जिसका वाक़ेई इज़हार इन्सान के अमल व किरदार से होता है के अमल और किरदार के बग़ैर ईमान सिर्फ़ एक दावा रहता है जिसकी कोई तस्दीक़ नहीं होती है।
लेकिन यह ईमान भी दो तरह का होता है। कभी इन्सान के दिल की गहराइयों में यूं पेवस्त हो जाता है के ज़माने के झक्कड़ भी उसे हिला नहीं सकते हैं और कभी हालात की बिना पर तज़लज़ल के इमकानात पैदा हो जाते हैं। हज़रत (अ0) ने इस दूसरी क़िस्म के पेषे नज़र इरषाद फ़रमाया है के किसी इन्सान की बदकिरदारी की बिना पर बराअत करना है तो इतना इन्तेज़ार कर लो के उसे मौत आ जाए ताके यह यक़ीन हो जाए के ईमान उसके दिल की गहराइयों में साबित नहीं था वरना तौबा व इस्तग़फ़ार करके राहे रास्त पर आ जाता।
हिजरत का वाक़ेई मक़सद जान का बचाना नहीं बल्कि ईमान का बचाना होता है, लेहाज़ा जब तक ईमान के तहफ़्फ़ुज़ का इन्तेज़ाम न हो जाए उस वक़्त तक हिजरत का कोई मफ़हूम नहीं है और जब मारेफ़ते हुज्जत के ज़रिये ईमान के तहफ़्फ़ुज़ का इन्तेज़ाम हो जाए तो समझो के इन्सान मुहाजिर हो गया, चाहे उसका क़याम किसी मन्ज़िल पर क्यों न रहे।)))


इसी तरह मुस्तज़ाफ़ उसे नहीं कहा जाता है जिस तक ख़ुदाई दलील पहुंच जाए और वह उसे सुन भी ले और दिल में जगह भी दे दे। हमारा मामला निहायत दरजए सख़्त और दुष्वारगुज़ार है। इसका मुतहम्मल सिर्फ़ वह बन्दए मोमिन कर सकता है जिसके दिल का इम्तेहान ईमान के लिये लिया जा चुका हो, हमारी बातें सिर्फ़ उन्हीं सीनों में रह सकती हैं जो अमानतदार हों और उन्हीं अक़्लों में समा सकती हैं जो ठोस और मुस्तहकम हों।
लोगों! जो चाहो मुझसे दरयाफ़्त कर लो कब्ल इसके के मुझे न पाओ, मैं आसमान के रास्तों को ज़मीन की राहों से बेहतर जानता हूं, मुझसे दरयाफ़्त कर लो क़ब्ल इसके के वह फ़ित्ना अपने पैर उठा ले जो अपनी मेहार को भी पैरों तले रौंदने वाला है और जिससे क़ौम की अक़्लों के ज़वाल का अन्देषा है।