ख़ुत्बात
 
187-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जिसमें हवादिसे रोज़गार का ज़िक्र किया गया है)


मेरे मां बाप उन चन्द अफ़राद पर क़ुरबान हो जाएं जिनके नाम आसमान में मारूफ़ हैं और ज़मीन में मजहोल। आगाह हो जाओ और उस वक़्त का इन्तेज़ार करो जब तुम्हारे अम्र उलट जाएंगे और ताल्लुक़ात टूट जाएंगे और बच्चों के हाथ में इक़तेदार आ जाएगा यही वह वक़्त होगा जब एक दिरहम के हलाल के ज़रिये हासिल करने से आसानतर तलवार का ज़ख़्म होगा और लेने वाले फ़क़ीर का अज्र देने वाले मालदार से ज़्यादा होगा।
तुम बग़ैर किसी “ाराब के नेमतों के नषे में सरमस्त होगे और बग़ैर किसी मजबूरी के क़सम खाओगे और बग़ैर किसी ज़रूरत के झूट बोलोगे और यही वह वक़्त होगा जब बलाएं तुम्हें इस तरह काट खाएंगी जिस तरह उट की पीठ को पालान। हाए यह रन्ज व अलम किस क़द्र तवील होगा और उससे निजात की उम्मीद किस क़द्र दूरतर होगी।
लोगों! उन सवारियों की बागडोर उतार कर फेंक दो जिनकी पुष्त पर तुम्हारे ही हाथों गुनाहों का बोझ है और अपने हाकिम से इख़्तेलाफ़ न करो के बाद में अपने किये पर पछताना पड़े। वह आग के “ाोले जो तुम्हारे सामने हैं उनकें कूद न पड़ों। उनकी राह से अलग होकर चलो और रास्ते को उनके लिये ख़ाली कर दो के मेरी जान की क़सम इस फ़ितने की आग में मोमिन हलाक हो जाएगा और ग़ैर मुस्लिम महफ़ूज़ रहेगा।
मेरी मिसाल तुम्हारे दरम्यान अन्धेरे में चिराग़ जैसी है के जो इसमें दाखि़ल हो जाएगा वह रोषनी हासिल कर लेगा। लेहाज़ा ख़ुदारा मेरी बात सुनो और समझो। अपने दिलों के कानों को मेरी तरफ़ मसरूफ़ करो ताके बात समझ सको।


(((-जिस तरह मालिक ने रसूले अकरम (स0) को जाहेलीयत के अन्धेरे में सिराजे मुनीर बनाकर भेजा था उसी तरह फ़ितनों के अन्धेरों में मौलाए कायनात की ज़ात एक रौषन चिराग़ की है के अगर इन्सान इस चिराग़ की रौषनी में ज़िन्दगी गुज़ारे तो कोई फ़ित्ना उस पर असर अन्दाज़ नहीं हो सकता है और किसी अन्धेरे में उसके भटकने का इमकान नहीं है। लेकिन “ार्त यही है के इस चिराग़ की रौषनी में क़दम आगे बढ़ाए वरना अगर उसने आंखें बन्द कर लीं और अन्धेपन के साथ क़दम आगे बढ़ाता रहा तो चिराग़ रौषन रहेगा और इन्सान गुमराह हो जाएगा जिसकी तरफ़ इन कलेमात के ज़रिये इषारा किया गया है के ख़ुदारा मेरी बात सुनो और समझो के इसके बग़ैर हिदायत का कोई इमकान नहीं है और गुमराही का ख़तरा हरगिज़ नहीं टल सकता है।)))