ख़ुत्बात
 
186- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा

(तौहीद के बारे में और उसमें वह तमाम इल्मी मतालिब पाए जाते हैं जो किसी दूसरे ख़ुत्बे में नहीं हैं)


वह उसकी तौहीद का क़ायल नहीं है जिसने उसके लिये कैफ़ियात का तसव्वुर पैदा कर लिया और वह उसकी हक़ीक़त से नाआष्ना है जिसने उसकी तमसील क़रार दे दी। उसने उसका क़स्द ही नहीं किया जिसने उसकी “ाबीह बना दी और वह उसकी तरफ़ मुतवज्जो ही नहीं हुआ जिसने इसकी तरफ़ इषारा कर दिया या उसे तसव्वुर का पाबन्द बना देना चाहा। जो अपनी ज़ात से पहचाना जाए है वह मख़लूक़ है और जो दूसरे के सहारे क़ायम हो वह उस इल्लत का मोहताज है। परवरदिगार फ़ाएल है लेकिन आज़ा के हरकात से नहीं और अन्दाज़े मुक़र्रर करने वाला है लेकिन फिक्र की जूलानियों से नहीं। वह ग़नी है लेकिन किसी से कुछ लेकर नहीं, ज़माना उसके साथ नहीं रह सकता और आलात उसे सहारा नहीं दे सकते। उसका वजूद ज़माने से पहले है और इसका वजूद अदम से भी साबिक़ और उसकी अज़लियत इब्तेदा से भी मुक़द्दम है। इसके हवास को ईजाद करने से अन्दाज़ा हुआ के वह हवास से बेनियाज़ है और उसके अष्याअ के दरम्यान ज़दयत क़रार देने से मालूम हुआ के उसकी कोई ज़िद नहीं है और उसके अष्याअ में मुक़ारनत क़रार देने से साबित हुआ के उसका कोई क़रीन और साथी नहीं है। उसने नूर को ज़ुल्मत की, वज़ाहत को इबहाम की, ख़ुष्की को तरी की और गरमी को सरदी की ज़िद क़रार दिया है। वह एक दूसरे की दुष्मन अष्याअ को जमा करने वाला, एक-दूसरे से जुदागाना अष्याअ का साथ कर देने वाला, बाहमी दूरी रखने वालों को क़रीब बना देने वाला और बाहेमी क़ुरबत के हामिल उमूर का जुदा कर देने वाला है। वह न किसी हद के अन्दर आता है और न किसी हिसाब व “ाुमार में आ सकता है के जिस्मानी क़ूवतें अपनी जैसी अष्याअ ही को महदूद कर सकती हैं और आलात अपने इमसाल ही की तरफ़ इषारा कर सकते हैं। इन अष्याअ को लफ़्ज़ मुन्ज़ो (कब) ने क़दीम होने से रोक दिया है और हर्फ़ क़द (हो गया) ने अज़लियत से अलग कर दिया है और लौला ने उन्हें तकमील से जुदा कर दिया है। उन्हें अष्याअ के ज़रिये बनाने वाला अक़्लों के सामने जलवागर हुआ है और उन्हीं के ज़रिये आंखों की दीद से बरी हो गया है। इसपर हरकत व सुकून का क़ानून जारी नहीं होता है के उसने ख़ुद हरकत व सुकून के निज़ाम को जारी किया है और जिस चीज़ की इब्तिदा उसने की है वह उसकी तरफ़ किस तरह आएद हो सकती है या जिसको उसने ईजाद किया है वह उसकी ज़ात में किस तरह “ाामिल हो सकती है। ऐसा हो जाता तो उसकी ज़ात भी तग़य्युर पज़ीद हो जाती।


(((-मालिके कायनात ने तख़लीक़े कायनात में ऐसे ख़ुसूसियात को वदीअत कर दिया है जिनके ज़रिये उसकी अज़मत का बख़ूबी अन्दाज़ा किया जा सकता है। सिर्फ़ इस नुक्ते की तरफ़ तवज्जो देने की ज़रूरत है के जो “ौ भी किसी की ईजाद कर्दा होती है उसका इतलाक़ मौजद की ज़ात पर नहीं हो सकता है लेहाज़ा अगर उसने हवास को पैदा किया है तो इसके मानी यह हैं के उसकी ज़ात हवास से बालातर है और अगर उसने बाज़ अष्याअ में हमरंगी और बाज़ में इख़्तेलाफ़ पैदा किया है तो यह इस बात की अलामत है के उसकी ज़ाते अक़दस न किसी की हमरंग है और न किसी से ज़िदयत की हामिल है। यह सारी बातें मख़लूक़ात के मुक़द्दर में लिखी गई हैं और ख़ालिक़ की ज़ात इन तमाम बातों से कहीं ज़्यादा बलन्द व बाला है।-)))


इसकी हक़ीक़त भी क़ाबिले तजज़िया हो जाती और इसकी मानवीयत भी अज़लियत से अलग हो जाती और इसके यहां भी अगर सामने की जहत होती तो पीछे की सिम्त होती और वह भी कमाल का तलबगार होता अगर उसमें नुक़्स पैदा हो जाता, उसमें मसनूआत की अलामतें पैदा हो जाती और वह मदलोल (सारी चीज़े उसकी हस्ती की दलील) होने के बाद ख़ुद दूसरे की तरफ़ (दलील बन जाने) रहनुमाई करने वाला हो जाता। (हालांकि वह इस अम्रे मुसल्लेमा की रू से के इसकें मख़लूक़ की सिफ़तों का होना ममनूअ है,) वह अपने इम्तेनाअ व तहफ़्फ़ुज़ की ताक़त की बिना पर इस हद से बाहर निकल गया है के कोई ऐसी ‘ौ इस पर असर करे जो दूसरों पर असरअन्दाज़ होती है। इसके यहां न तग़य्युर है और न ज़वाल और न उसके आफ़ताबे वजूद के लिये कोई ग़ुरूब है। वह न किसी का बाप है के उसका कोई फ़रज़न्द हो और न किसी का फ़रज़न्द है के महदूद होकर रह जाए। वह औलाद बनाने से भी बे नियाज़ और औरतों को हाथ लगाने से भी बलन्द व बाला है। औहाम उसे पा नहीं सकते हैं के उसका अन्दाज़ा मुक़र्रर करें और होषमन्दियां उसका तसव्वुर नहीं कर सकती हैं के इसकी तस्वीर बना सकें। हवास इसका इदराक नहीं कर सकते हैं के उसे महसूस कर सकें और हाथ उसे छू नहीं सकते हैं के मस कर लें। वह किसी हाल में मुतग़य्यर नहीं होता है और मुख़्तलिफ़ हालात में बदलता (मुन्तक़िल होता) भी नहीं है। “ाब व रोज़ उसे पुराना नहीं कर सकते हैं और तारीकी व रोषनी उसमें तग़य्युर नहीं पैदा कर सकती हैं। वह न अजज़ाअ से मौसूफ़ होता है और न जवारेह व आज़ा से, न किसी अर्ज़ से मुत्तसिफ़ होता है और न ही क़ुरबत और जुजि़्ज़यत से (उसे अजज़ाअ व जवारेह सिफ़ात में से किसी सिफ़त और ज़ात के अलावा किसी भी चीज़ और हिस्सों से मुत्तसिफ़ नहीं किया जा सकता)। उसके लिये न हद और इन्तेहा का लफ़्ज़ इस्तेमाल होता है और न इख़्तेताम और ज़वाल का। न अष्याअ उस पर हावी हैं के जब चाहें पस्त कर दें या बलन्द कर दें, और न कोई चीज़ उसे उठाए हुए है के जब चाहे सीधा कर दे या मोड़ दे। वह न अष्याअ के अन्दर दाखि़ल है और न उनसे ख़ारिज है। वह कलाम करता है मगर ज़बान और तालू के सहारे नहीं और सुनता है लेकिन कान के सूराख़ और आलात के ज़रिये नहीं। बोलता है लेकिन तलफ़्फ़ुज़ से नहीं और हर चीज़ को याद रखता है लेकिन हाफ़ेज़ा के सहारे नहीं। इरादा करता है लेकिन दिल से नहीं और मोहब्बत व रिज़ा रखता है लेकिन नर्मी क़ल्ब के वसीले से नहीं और बुग़्ज़ व ग़ज़ब भी रखता है लेकिन ग़म व ग़ुस्से की तकलीफ़ से नहीं। जिस चीज़ को ईजाद करना चाहता है उससे कुन कह देता है और वह हो जाती है। न कोई आवाज़ कानों से टकराती है और न कोई निदा सुनाई देती है। उसका कलाम दरहक़ीक़त उसका फ़ेल है जिसको उसने ईजाद किया है और उसके पहले से होने का कोई सवाल नहीं है वरना वह भी क़दीम और दूसरा ख़ुदा हो जाता।
उसके बारे में यह नहीं कहा जा सकता है के वह अदम से वजूद में आया है के इस पर हादस सिफ़ात का इतलाक़ हो जाए और दोनों में न कोई फ़ासला रह जाए और न उसका हवादिस पर कोई फ़ज़ल रह जाए और फ़िर सानेअ व मसनूअ दोनों बराबर हो जाएं और मसनूअ सनअत के मिस्ल हो जाए। उसने मख़लूक़ात को बग़ैर किसी दूसरे के छोड़े हुए नमूने के बनाया है और इस तख़लीक़ में किसी की मदद भी नहीं ली है। ज़मीन को ईजाद किया और उसमें उलझे बग़ैर उसे रोक कर रखा और फ़िर बग़ैर किसी सहारे के गाड़ दिया और बग़ैर किसी सुतून के क़ायम कर दिया और बग़ैर खम्बों के बलन्द भी कर दिया। उसे इस तरह की कजी और टेढ़ेपन से महफ़ूज़ रखा और हर क़िस्म के षिगाफ़ और इन्तेषार से बचाए रखा। उसमें पहाड़ों की मीख़ें गाड़ दीं और चट्टानों को मज़बूती से नस्ब कर दिया। चष्मे जारी कर दिये और पानी की गुज़रगाहों को षिगाफ़्ता कर दिया। उसकी कोई सनअत कमज़ोर नहीं है और उसने जिसको क़ूवत दे दी है वह ज़ईफ़ नहीं है। वह हर “ौ पर अपनी अज़मत व सल्तनत की बिना पर ग़ालिब है।


(((-इसमें कोई “ाक नहीं है के परवरदिगार का इरफ़ान उसके सिफ़ात व कमालात ही से होता है और उसकी ज़ाते अक़दस भी मुख़तलिफ़ सिफ़ात से मुत्तसिफ़ है। बात सिर्फ़ यह है के सिफ़ात हादिस नहीं हैं, बल्कि ऐन ज़ात हैं और एक ज़ाते अक़दस है जिससे उसके तमाम सिफ़ात का अन्दाज़ा होता है और उसकी तरह के तादद का कोई इमकान नहीं है।-)))


वह इल्म व इरफ़ान की बिना पर अन्दर तक की ख़बर रखता है। जलाल व इज़्ज़त की बिना पर हर “ौ से बलन्द व बाला है और अगर किसी “ौ को तलब करना चाहे तो (वह उसके दस्तरस से बाज़ नहीं) कोई “ौ उसे आजिज़ नहीं कर सकती है और उससे इन्कार नहीं कर सकती है के इस पर ग़ालिब आ जाए। तेज़ी दिखलाने वाले उससे बच कर आगे नहीं जा सकते हैं और वह किसी साहेबे सरवत की रोज़ी का मोहताज नहीं है। तमाम अष्याअ उसकी बारगाह में ख़ुज़ूअ करने वाली और इसकी अज़मत के आगे ज़लील हैं। कोई चीज़ उसकी सलतनत से फ़रार करके दूसरे की तरफ़ नहीं जा सकती है के उसके नफ़े व नुक़सान से महफ़ूज़ हो जाए। न उसका कोई कफ़ू (हमसर) है के हमसरी करे और न कोई मिस्ल है के बराबर हो जाए। वह हर “ौ को वजूद के बाद फ़ना करने वाला है के एक दिन फिर ग़ायब हो जाए (यहां तक के मौजूद चीज़ें उन चीज़ों की तरह हो जाएं के जो कभी थीं ही नहीं) और उसके लिये दुनिया का फ़ना कर देना इससे ज़्यादा हैरत अंगेज़ नहीं है के जब उसने इसकी अख़्तेराअ व ईजाद की थी। भला यह कैसे हो सकता है जबके सूरते हाल यह है के अगर तमाम हैवानात परिन्दे और चरिन्दे रात को मन्ज़िल पर वापस आने वाले और घरों में रह जाने वाले, तरह-तरह के अनवाअ व इक़साम वाले और तमाम इन्सान ग़बी और होषमन्द सब मिलकर एक मच्छर को ईजाद करना चाहें तो नहीं कर सकते हैं और न उन्हें यह अन्दाज़ा होगा के इसकी ईजाद का तरीक़ा और रास्ता क्या है बल्कि उनकी अक़्लें इसी राह में भटक (हैरान हो) जाएंगी और उनकी ताक़तें जवाब दे जाएंगी और आजिज़ व दरमान्दा होकर मैदाने अमल से वापस आ जाएंगी और उन्हें महसूस हो जाएगा के उनपर किसी का ग़लबा है और उन्हें अपनी आजिज़ी का इक़रार भी होगा और उन्हें फ़ना कर देने के बारे में भी कमज़ोरी का एतराफ़ होगा।
बेषक, वह ख़ुदाए पाक व पाकीज़ा ही है जो दुनिया के फ़ना हो जाने के बाद भी रहने वाला है और उसके साथ रहने वाला कोई नहीं है। वह इब्तेदा में भी ऐसा ही था और इन्तेहा में भी ऐसा ही होने वाला है। उसके लिये न वक़्त है न मकान, न साअत है न हंगाम और ज़मान है। उस वक़्त मुद्दतें और वक़्त सब फ़ना हो जाएंगे और साअत व साल सबका ख़ात्मा हो जाएगा। उस ख़ुदाए वाहिद व क़ह्हार के अलावा कोई ख़ुदा नहीं है। उसी की तरफ़ तमाम उमूर की बाज़गष्त है और किसी “ौ को भी अपनी ईजाद से पहले अपनी तख़लीक़ का यारा ना था और न फ़ना होते वक़्त इनकार करने का दम होगा। अगर इतनी ही ताक़त होती तो हमेषा न रह जाते। उस मालिक को किसी “ौ के बनाने में किसी दुष्वारी का सामना नहीं करना पड़ा और उसे किसी “ौ की तख़लीक़ व ईजाद थका भी नहीं सकी। उसने इस कायनात को न अपनी हुकूमत के इस्तेहकाम के लिये बनाया है और न किसी ज़वाल और नुक़सान के ख़ौफ़ से बचने के लिये। न उसे किसी मद्दे मुक़ाबिल के मुक़ाबले में मदद की ज़रूरत थी और न वह किसी हमलावर दुष्मन से बचना चाहता था। उसका मक़सद अपने मुल्क व सल्तनत में कोई इज़ाफ़ा था और न किसी “ारीक के सामने अपनी कसरत का इज़हार करना (इतराना) था और न तन्हाई की वहषत से उन्स हासिल करना था।
इसके बाद वह इस कायनात को फ़ना कर देगा, न इसलिये के इसकी तदबीर और इसके तसर्रुफ़ात से आजिज़ आ गया है और न इसलिये के अब आराम करना चाहता है या उस पर किसी ख़ास चीज़ का बोझ पड़ रहा है।


(((-दुनिया में ईजादात और हुकूमात का फ़लसफ़ा यही होता है के कोई ईजादात के ज़रिये हुकूमत का इस्तेहकाम चाहता है और कोई हुकूमत के ज़रिये ख़तरात का मुक़ाबला करना चाहता है। इसलिये बहुत मुमकिन था के बाज़ जाहिल अफ़राद मालिके कायनात की तख़लीक़ और उसकी हुकूमत के बारे में भी इसी तरह का ख़याल क़ायम कर लेते।
आप हज़रत ने यह चाहा के इस ग़लत फ़हमी का इज़ाला कर दिया जाए और इस हक़ीक़त को बेनक़ाब कर दिया जाए के ख़ालिक़ व मख़लूक़ में बे पनाह फ़र्क़ है और किसी भी मख़लूक़ का क़यास ख़ालिक़ में नहीं किया जा सकता है। मख़लूक़ का मिज़ाज एहतियाज है और ख़ालिक़ का कमाल बेनियाज़ी है लेहाज़ा दोनों के बारे में एक तरह के तसव्वुरात नहीं क़ायम किये जा सकते हैं।)))


न इसलिये के बक़ाए कायनात ने उसे थका दिया है तो अब उसे मिटा देना चाहता है, ऐसा कुछ नहीं है। उसने अपने लुत्फ़ से इसकी तद्बीर की है और अपने अम्र से इसे रोक रखा है। अपनी क़ुदरत से इसे मुस्तहकम बनाया है और फिर फ़ना करने के बाद दोबारा ईजाद कर देगा (न इसलिये के इनमें से किसी चीज़ की उसे एहतियाज है और उनकी मदद का ख़्वाहं है और न तन्हाई की उलझन से मुनतक़िल होकर दिलबस्तगी की हालत पैदा करने के लिये और जेहालत व बेबसीरती की हालत से वाक़फ़ीयत व तजुरबात की दुनिया में आने के लिये और फ़क्ऱो एहतियाज से दौलत व फ़रावानी और ज़िल्लत व पस्ती से इज़्ज़त व तवानाई की तरफ़ मुन्तक़िल होने के लिये इनको दोबारा पैदा करता है।) हालांके उस वक़्त भी न उसे किसी “ौ की ज़रूरत है और न किसी से मदद लेना होगी। न वहषत से उन्स की तरफ़ मुन्तक़िल होना होगा और न जेहालत की तारीकी से इल्म और तजुर्बे की तरफ़ आना होगा न फ़क्ऱो एहतियाज से मालदारी और कसरत की तलाष होगी और न ज़िल्लत व कमज़ोरी से इज़्ज़त व क़ुदरत की जुस्तजू होगी।