ख़ुत्बात
 
185-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जिसमें हम्दे ख़ुदा, सनाए रसूल (स0) और बाज़ मख़लूक़ात का तज़किरा है)


सारी तारीफ़ उस अल्लाह के लिये है जिसे न हवास पा सकते हैं और न मकान घेर सकते हैं, न आंखे उसे देख सकती हैं और न परदे उसे छिपा सकते हैं उसने अपने क़दीम होने की तरफ़ मख़लूक़ात के हादिस होने से रहनुमाई की है और उनके वजूद बाद अज़ अदम को अपने वजूदे अज़ल का सबूत बना दिया है और इनकी बाहेमी मुषाबेहत से अपने बेमिसाल होने का इज़हार किया है। वह अपने वादे में सच्चा है और अपने बन्दों पर ज़ुल्म करने से अजल व अरफ़ा है। उसने लोगांे में अद्ल का क़याम किया है और फ़ैसलों पर मुकम्मल इन्साफ़ से काम लिया है। अषयाअ के हदूस से अपनी अज़लीयत पर इस्तेदलाल किया है और इन पर आजिज़ी का निषान लगाकर अपनी क़ुदरते कामेला का असबात किया है। अषयाअ के जबदी फ़ना व अदम से अपने दवाम का पता दिया है। वह एक है लेकिन अदद के एतबार से नहीं, दाएमी है लेकिन मुद्दत के एतबार से नहीं और क़ाएम है लेकिन किसी के सहारे नहीं। ज़ेहन उसे क़ुबूल करते हैं लेकिन हवास की बिना पर नहीं और “ााहदात उसकी गवाही देते हैं लेकिन इसकी बारगाह में पहुंचने के बाद नहींं। औहाम इसका अहाता नहीं कर सकते हैं बल्कि वह उनके लिये उन्हींंं के ज़रिये रौषन हुआ है और उन्हीं के ज़रिये इनके क़ब्ज़े में आने से इन्कार कर दिया है और इसका हकम भी उन्हीं को ठहराया है। वह एतबार से बड़ा नहीं है के उसके एतराफ़ ने फैल कर इसके जिस्म को बड़ा बना दिया है और न ऐसा अज़ीम है के उसकी जसामत ज़्यादा हो और उसने उसके जसद को अज़ीम बना दिया हो, वह अपनी “ाान में कबीर और अपनी सल्तनत में अज़ीम है।
और मैं गवाही देता हूं के हज़रत मोहम्मद उसके बन्दे और मुख़लिस रसूल और पसन्दीदा अमीन हैं। अल्लाह उन पर रहमत नाज़िल करे। उसने उन्हें नाक़ाबिले इन्कार दलाएल, वाज़ेअ कामयाबी और नुमायां रास्ते के साथ भेजा है और उन्होंने उसके पैग़ाम को वाषगाफ़ अन्दाज़ में पेष कर दिया है और लोगों को सीधे रास्ते की रहनुमाई कर दी है। हिदायत के निषानात क़ायम कर दिये हैं और रोषनी के मिनारे इस्तेवार कर दिये है। इस्लाम की रस्सियों को मज़बूत बना दिया है और ईमान के बन्धनों को मुस्तहकम कर दिया है।
अगर यह लोग इसकी अज़ीम क़ुदरत और वसीअ नेमत में ग़ौर व फ़िक्रर करते तो रास्ते की तरफ़ वापस आ जाते और जहन्नम के अज़ाब से ख़ौफ़ज़दा हो जाते। लेकिन मुष्किल यह है के इनके दिल मरीज़ हैं और इनकी आंखें कमज़ोर हैं। क्या यह एक छोटी सी मख़लूक़ को भी नहीं देख रहे हैं के उसने किस तरह उसकी तख़लीक़ को मुस्तहकम और इसकी तरकीब को मज़बूत बनाया है। इस छोटे से जिस्म में कान और आंखें सब बना दी हैं और इसमें हड्डियां और खाल भी दुरूस्त कर दी है।
ज़रा इस च्यूंटी के छोटे से जिस्म और उसकी लतीफ़ “ाक्ल व सूरत की बारीकी की तरफ़ नज़र करो जिसका गोषाए चष्म से देखना भी मुष्किल है और फ़िक्रों की गिरफ़्त में आना भी दुष्वार है, किस तरह ज़मीन पर रेंगती है और किस तरह अपने रिज़्क़ की तरफ़ लपकती है, दाने को अपने सूराख़ की तरफ़ ले जाती है और फिर वहां मरकज़ पर महफ़ूज़ कर देती है। गर्मी में सर्दी का इन्तेज़ाम करती है और तवानाई के दौर में कमज़ोरी के ज़माने का बन्दोबस्त करती है। इसके रिज़्क़ की कफ़ालत की जा चुकी है और इसी के मुताबिक़ उसे बराबर रिज़्क़ मिल रहा है।


(((-एक छोटी सी मख़लूक़ च्यूंटी में यह दूरअन्देषी और इस क़द्र तन्ज़ीम व तरतीब और एक अषरफ़ुल मख़लूक़ात में इस क़द्र ग़फ़लत और तग़ाफ़िल किस क़द्र हैरत अंगेज़ है और उससे ज़्यादा हैरत अंगेज़ क़िस्साए जनाबे सुलेमान है जहां च्यूंटी ने लष्करे सुलेमान को देखकर आवाज़ दी के फ़ौरन अपने अपने सूराख़ों में दाखि़ल हो जाओ के कहीं लष्करे सुलेमान तुम्हें पामाल न कर दे और उसे एहसास भी न हो। गोया के एक च्यूंटी के दिल में क़ौम का इस क़द्र दर्द है और उसे सरदारे क़ौम होने के एतबार से इस क़द्र ज़िम्मेदारी का एहसास है के क़ौम तबाह न होने पाए और आज आलम इस्लाम व इन्सानियत इस क़द्र तग़ाफ़ुल का षिकार हो गया है के किसी के दिल में क़ौम का दर्द नहीं है बल्कि हक्काम क़ौम के कान्धों पर अपने जनाज़े उठा रहे हैं और उनकी क़ब्रों पर अपने ताजमहल तामीर कर रहे हैं।-)))
न एहसान करने वाला ख़ुदा उसे नज़र अन्दाज़ करता है और न साहेबे जज़ा व अता उसे महरूम रखता है चाहे वह ख़ुष्क पत्थर के अन्दर हो या जमे हुए संगे ख़ारा के अन्दर। अगर तुम उसकी ग़िज़ा को पस्त व बलन्द नालियों और उसके जिस्म के अन्दर षिकम की तरफ़ झुके हुए पस्लियों के किनारों और सर में जगह पाने वाले आंख और कान को देखोगे तो तुम्हें वाक़ेअन इसकी तख़लीक़ पर ताअज्जुब होगा और इसकी तौसीफ़ से आजिज़ हो जाओगे। बलन्द व बरतर है वह ख़ुदा जिसने इस जिस्म को उसके पैरों पर क़ायम किया है और उसकी तामीर इन्हीं सुतूनों पर खड़ी की है। न इसकी फ़ितरत (बनाने में) में किसी ख़ालिक़ ने हिस्सा लिया है और न इसके तख़लीक़ में किसी क़ादिर ने कोई मदद की है। और अगर तुम फ़िक्रर के तमाम रास्तों को तय करके इसकी इन्तेहा तक पहुंचना चाहोगे तो एक ही नतीजा हासिल होगा के जो च्यूंटी का ख़ालिक़ है वही दरख़्त का भी परवरदिगार है। इसलिये के हर एक तख़लीक़ में यही बारीकी है और हर जानदार का दूसरे से निहायत दरजाए बारीक ही इख़तेलाफ़ है। इसकी बारगाह में अज़ीम व लतीफ़, सक़ील व ख़फ़ीफ़, क़वी व ज़ईफ़ सब एक ही जैसे हैं।
यही हाल आसमान और फ़िज़ा और हवा और पानी का है, के चाहो “ाम्स व क़मर को देखो या नबातात व “ाजर को, पानी और पत्थर पर निगाह करो या “ाबो रोज़ की आमद व रफ़्त पर, दरयाओं के बहाव को देखो या पहाड़ों की कसरत और च्यूंटियों के तूलवार तफ़ाअ को, लुग़ात के इख़तेलाफ़ को देखो या ज़बानों के इफ़तेराक़ को, सब उसकी क़ुदरते कामेला के बेहतरीन दलाएल हैं। हैफ़ है उन लोगों पर जिन्होंने तक़दीर साज़ से इन्कार किया है और तदबीर करने वाले से मुकर गए। उनका ख़याल है के सब घास फूस की तरह हैं के बग़ैर खेती करने वाले के उग आए हैं और बग़ैर सानेअ के मुख़तलिफ़ “ाक्लें इख़्तेयार कर ली हैं। हालांके इन्होने इस दावा में न किसी दलील का सहारा लिया है और न ही अपने अक़ाएद की कोई तहक़ीक़ की है वरना यह समझ लेते के न बग़ैर बानी के इमारत हो सकती है और न बग़ैर मुजरिम के जुर्म हो सकता है।
और अगर तुम चाहो तो यही बातें टिड्डी के बारे में कही जा सकती हैं के इसके अन्दर दो सुर्ख़ सुर्ख़ आंखें पैदा की हैं और चान्द जैसे दो हलक़ों में आंखों के चिराग़ रौषन कर दिये हैं। छोटे-छोटे कान बना दिये हैं और मुनासिब सा दहाना खोल दिया है लेकिन इसके लिबास को क़वी बना दिया है। इसके दो तेज़ दांत हैं जिनसे पत्तियों को काटती है और दो पैर दनदानावार हैं जिनसे घास वग़ैरा को काटती है। काष्तकार अपनी काष्त के लिये इनसे ख़ौफ़ज़दा रहते हैं लेकिन इन्हें हंका नहीं सकते हैं चाहे किसी क़द्र ताक़त क्यों न जमा कर लें। यहां तक के वह खेतियों पर जस्त व ख़ेज़ करते हुए हमलावर हो जाती हैं और अपनी ख़्वाहिष पूरी कर लेती हैं। जबके उस का कुल वजूद एक बारीक उंगली से ज़्यादा नहीं है।
पस बा-बरकत है वह ज़ाते अक़दस जिसके सामने ज़मीन व आसमान की तमाम मख़लूक़ात परग़बत या नजबदराकराह सर-ब’सुजूद रहती हैं।
उसके लिये चेहरा और रुख़सार को ख़ाक पर रखे हुए हैं और अज्ज़ व इन्केसार के साथ इसकी बारगाह में सरापा इताअत हैं और ख़ौफ़ व दहषत से अपनी ज़माम इख़्तेयार उन्हीं के हवाले किये हुए हैं। परिन्दे उसके अम्र के ताबे हैं के वह उनके परों और सांसों का “ाुमार रखता है और उनके परों को तरी या ख़ुष्की में जमा दिया करता है, इनका फ़ौत मुक़र्रर कर दिया है और इनकी जिन्स का एहसा कर लिया है के यह कव्वा है वह अक़ाब है यह कबूतर है वह “ाुतरमुर्ग़ है, हर परिन्दे को उसके नाम से क़याम वजूद में दावत दी है और हर एक की रोज़ी की केफ़ालत की है। संगीन क़िस्म के बादल पैदा किये तो उनसे मूसलाधार पानी बरसा दिया और इसकी तक़सीमात का हिसाब भी रखा। ज़मीन को ख़ुष्की के बाद तर कर दिया और इसके नबातात को बन्जर हो जाने के बाद दोबारा उगा दिया।
(((- दरहक़ीक़त घास फूस के बारे में भी यह तसव्वुर खि़लाफ़े अक़्ल है के इसकी तख़लीक़ बग़ैर किसी ख़ालिक़ के हो गई है, लेकिन यह तसव्वुर सिर्फ़ इस लिये पैदा कर लेता है के इसकी हिकमत और मसलहत से बाख़बर नहीं है और यह ख़याल करता है के इस बरसात ने पानी के बग़ैर किसी तरतीब व तन्ज़ीम के उगा दिया है और इसके बाद इस तख़लीक़ पर सारी कायनात का क़यास करने लगता है। हालांके उसे कायनात की हिकमत व मसलहत को देखकर यह फ़ैसला करना चाहिये था के तख़लीक़े कायनात के बाज़ इसरार तो वाज़ेह भी हो गए हैं लेकिन तख़लीक़े नबातात का तो कोई राज़ वाज़ेअ नहीं हो सका है और यह इन्सान की इन्तेहाई जेहालत है के वह इस क़द्र हक़ीर और मामूली मख़लूक़ात की हिकमत व मसलेहत से भी बाख़बर नहीं है और हौसला इस क़दर बलन्द है के मालिके कायनात से टक्कर लेना चाहता है। और एक लफ़्ज़ में इसके वजूद का ख़ात्मा कर देना चाहता है-)))