ख़ुत्बात
 
181- आपका इरषादे गिरामी
(जब आपने एक “ाख़्स को उसकी तहक़ीक़ के लिये भेजा-- जो ख़वारिज से मिलना चाहती थी और हज़रत से ख़ौफ़ज़दा थी और वह “ाख़्स पलट कर आया तो आपने सवाल किया के क्या वह लोग मुतमईन होकर ठहर गए हैं या बुज़दिली का मुज़ाहेरा करके निकल पड़े हैं, उसने कहा के वह कूच कर चुके हैं, तो आपने फ़रमाया-)



ख़ुदा इन्हें क़ौमे समूद की तरह ग़ारत कर दे, याद रखो जब नैज़ों की अनियां इनकी तरफ़ सीधी कर दी जाएंगी और तलवारें इनके सरों पर बरसने लगेंगी तो इन्हें अपने किये पर “ार्मिन्दगी का एहसास होगा। आज “ौतान ने इन्हें मुन्तषिर कर दिया है और क लवही इनसे अलग होकर बराअत व बेज़ारी का एलान करेगा। अब उनके लिये हिदायत से निकल जाना, ज़लालत और गुमराही में गिर पड़ना, राहे हक़ से रोक देना और गुमराही की मुंहज़ोरी करना ही इनके तबाह होने के लिये काफ़ी है।