ख़ुत्बात
 
180- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा


मैं ख़ुदा का “ाुक्र करता हूं उन उमूर पर जो गुज़र गए और उन अफ़आल पर जो उसने मुक़द्दर कर दिये और अपने तुम्हारे साथ मुब्तिला होने पर भी ऐ वह गिरोह जिसे मैं हुक्म देता हूं तो इताअत नहीं करता है और आवाज़ देता हूं तो लब्बैक नहीं कहता है, तुम्हें मोहलत दे दी जाती है तो ख़ूब बातें बनाते हो और जंग में “ाामिल कर दिया जाता है तो बुज़दिली का मुज़ाहिरा करते हो। लोग किसी इमाम पर इज्तेमाअ करते हैं तो एतराज़ात करते हो और घेर कर मुक़ाबले की तरफ़ लाए जाते हो तो फ़रार इख़्तेयार कर लेते हो।
तुम्हारे दुष्मनों का बुरा हो आखि़र तुम मेरी नुसरत और अपने हक़ के लिये जेहाद में किस चीज़ का इन्तेज़ार कर रहे हो? मौत का या ज़िल्लत का, ख़ुदा की क़सम अगर मेरा दिन आ गया जो बहरहाल आने वाला है तो मेरे तुम्हारे दरम्यान उस हाल में जुदाई होगी के मैं तुम्हारी सोहबत से दिल बरदाष्ता हूंगा और तुम्हारी मौजूदगी से किसी कसरत का एहसास न करूंगा।
ख़ुदा तुम्हारा भला करे! क्या तुम्हारे पास कोई दीन नहीं है जो तुम्हें मुत्तहिद कर सके और न कोई ग़ैरत है जो तुम्हें आमादा कर सके? क्या यह बात हैरतअंगेज़ नहीं है के माविया अपने ज़ालिम और बदकार साथियों को आवाज़ देता है तो किसी इमदाद और अता के बग़ैर भी उसकी इताअत कर लेते हैं और मैं तुमको दावत देता हूं और तुमसे अतिया का वादा भी करता हूं तो तुम मुझसे अलग हो जाते हो और मेरी मुख़ालफ़त करते हो, हालांके अब तुम्हीं इस्लाम का तरकह और इसके बाक़ी मान्दा अफ़राद हो। अफ़सोस के तुम्हारी तरफ़ न मेरी रज़ामन्दी की कोई बात ऐसी आती है जिससे तुम राज़ी हो जाओ और न मेरी नाराज़गी का कोई मसला ऐसा आता है जिससे तुम भी नाराज़ हो जाओ। अब तो मेरे लिये महबूबतरीन “ौ जिससे मैं मिलना चाहता हूं सिर्फ़ मौत ही है, मैंने तुम्हें किताबे ख़ुदा की तालीम दी, तुम्हारे सामने खुले हुए दलाएल पेष किये, जिसे तुम नहीं पहचानते थे उसे पहचनवाया और जिसे तुम थूक दिया करते थे उसे ख़ुषगवार बना दिया। मगर यह सब उस वक़्त कारआमद है जब अन्धे को कुछ दिखाई दे और सोता हुआ बेदार हो जाए। वह क़ौम जेहालत से किस क़द्र क़रीब है जिसका क़ायद माविया हो और उसका अदब सिखाने वाला नाबालिग़ा का बेटा हो।

(((-इन्सान के पास दो ही सरमाये हैं जो उसे “ाराफ़त की दावत देते हैं दीनदार के पास दीन और आज़ादन्ष के पास ग़ैरत, मगर अफ़सोस के अमीरूलमोमेनीन (अ0) के एतराफ़ जमा हो जाने वाले अफ़राद के पास न दीन था और न क़ौमी “ाराफ़त का एहसास, और ज़ाहिर है के ऐसी क़ौम से किसी ख़ैर की तवक़्क़ो नहीं की जा सकती है और न वह किसी वफ़ादारी का इज़हार कर सकती है।
किस क़द्र अफ़सोसनाक यह बात है के आलमे इस्लाम में माविया और अम्र व आस की बात सुनी जाए और नफ़्से रसूल (स0) की बात को ठुकरा दिया जाए बल्कि उससे जंग की जाए। क्या उसके बाद भी किसी ग़ैरतदार इन्सान को ज़िन्दगी की आरज़ू हो सकती है और वह इस ज़िन्दगी से दिल लगा सकता है। अमीरूलमोमेनीन (अ0) के इस फ़िक़रे में ‘‘फ़ुज़तो व रब्बिल काबा’’ बे पनाह दर्द पाया जाता है। जिसमें एक तरफ़ अपनी “ाहादत और क़ुरबानी के ज़रिये कामयाबी का एलान है और दूसरी तरफ़ इस बेग़ैरत क़ौम से जुदाई की मसर्रत का इज़हार भी पाया जाता है के इन्सान ऐसी क़ौम से निजात हासिल कर ले और इस अन्दाज़े से हासिल कर ले के इसपर कोई इल्ज़ाम नहीं हो बल्कि मारकए हयात में कामयाब रहे।-)))