ख़ुत्बात
 
179- आपका इरषादे गिरामी
(जब ज़ालिब यमानी ने दरयाफ़्त किया के या अमीरूल मोमेनीन (अ0) क्या आपने अपने ख़ुदा को देखा है तो फ़रमाया क्या मैं ऐसे ख़ुदा की इबादत कर सकता हूं जिसे देखा भी न हो, अर्ज़ की मौला! उसे किस तरह देखा जा सकता है? फ़रमाया)


उसे निगाहें आँखों के मुषाहेदे से नहीं देख सकती हैं। उसका इदराक दिलों को हक़ाएक़ ईमान के सहारे हासिल होता है। वह अष्याह से क़रीब है लेकिन जिस्मानी इक़साल की बिना पर नहीं और दूर भी है लेकिन अलाहेदगी की बुनियाद पर नहीं। वह कलाम करता है लेकिन फ़िक्र का मोहताज नहीं और वह इरादा करता है लेकिन सोचने की ज़रूरत नहीं रखता। वह बिला आज़ाए व जवारेह के सानेअ है और बिला पोषीदा हुए लतीफ़ है। ऐसा बड़ा है जो छोटों पर ज़ुल्म नहीं करता है और ऐसा बसीर है जिसके पास हवास नहीं हैं और उसकी रहमत में दिल की नर्मी “ाामिल नहीं है। तमाम चेहरे उसकी अज़मत के सामनी ज़लील व ख़्वार हैं और तमाम क़ुलूब उसके ख़ौफ़ से लरज़ रहे हैं।


(((- बाज़ हज़रात ने यह सवाल उठाया है के अगर अफ़राद का ज़वाल सिर्फ़ गुनाहों की बुनियाद पर होता है तो क्या वजह है के दुनिया में बेषुमार बदतरीन क़िस्म के गुनहगार पाए जाते हैं लेकिन उनकी ज़िन्दगी में राहत व आराम, तक़दम और तरक़्क़ी के अलावा कुछ नहीं है। क्या इसका यह मतलब नहीं है के गुनाहों का राहत व आराम या रन्ज व अलम में कोई दख़ल नहीं है और इन मसाएल के असबाब किसी और “ौ में पाए जाते हैं। लेकिन इसका वाज़ेह सा जवाब यह है के अमीरूल मोमेनीन (अ0) ने अफ़राद का ज़िक्र नहीं किया है, क़ौम का ज़िक्र किया है और क़ौमों की तारीख़ गवाह है के उनका ज़वाल हमेषा इन्फ़ेरादी या इज्तेमाई गुनाहों की बिना पर हुआ है और यही वजह है के जिस क़ौम ने “ाुक्रे ख़ुदा नहीं अदा किया वह सफ़ए हस्ती से नाबूद हो गई और जिस क़ौम ने नेमत की फ़रावानी के बावजूद “ाुक्रे ख़ुदा से इन्हेराफ़ नहीं किया उसका जिक्र आज तक ज़िन्दा है और क़यामत तक ज़िन्दा रहेगा।-)))