ख़ुत्बात
 
178- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(षहादत ईमान और तक़वा के बारे में)


न इस पर कोई हालत तारी हो सकती है और न उसे कोई ज़माना बदल सकता है और न उस पर कोई मकान हावी हो सकता है और न उसकी तौसीफ़ हो सकती है। उसके इल्म से न बारिष के क़तरे मख़फ़ी हैं और न आसमान के सितारे। न फ़िज़ाओं में हवा के झक्कड़ मख़फ़ी हैं और न पत्थरों पर च्यूंटी के चलने की आवाज़ और न अन्धेरी रात में उसकी पनाहगाह, वह पत्तों के गिरने की जगह भी जानता है और आंख के दज़दीदा इषारे भी।
मैं गवाही देता हूं के उसके अलावा कोई ख़ुदा नहीं है। न उसका कोई हमसर व अदील है और न उसमें किसी तरह का “ाक है, न उसके दीन का इन्कार हो सकता है और न उसकी तख़लीक़ से इन्कार किया जा सकता है।


(((-जब माविया ने सिफ़्फ़ीन में अपने लष्कर को हारते हुए देखा तो नैज़ों पर क़ुरान बलन्द कर दिया के हम क़ुरान से फ़ैसला चाहते हैं। अमीरूलमोमेनीन (अ0) ने फ़रमाया के यह सिर्फ़ मक्कारी और ग़द्दारी है वरना मैं तो ख़ुद ही क़ुराने नातिक़ हूं, मुझसे बेहतर फ़ैसला करने वाला कौन हो सकता है लेकिन “ााम के नमकख़्वार और ज़मीर फ़रोष सिपाहियों ने हंगामा कर दिया और हज़रत को मजबूर कर दिया के दो अफ़राद को हकम बनाकर उनसे फ़ैसला कराएं, आपने अपनी तरफ़ से इब्ने अब्बास को पेष किया लेकिन ज़ालिमों ने उसे भी न माना, बाला आखि़र आपने फ़रमाया के कोई भी फ़ैसला करे लेकिन क़ुरान के हुदूद से आगे न बढ़े के मैंने क़ुरान ही के नाम पर जंग को मौक़ूफ़ किया है। मगर अफ़सोस के यह कुछ न हो सका और अम्र व आस की अय्यारी ने आपके खि़लाफ़ फ़ैसला करा दिया और इस तरह इस्लाम एक अज़ीम फ़ित्ने से दो-चार हो गया लेकिन आपका उज़्र वाज़ेह रहा के मैंने फ़ैसले में क़ुरान की “ार्त की थी और यह फ़ैसला क़ुरान से नहीं हुआ है लेहाज़ा मुझ पर कोई ज़िम्मेदारी नहीं है-)))


“ाहादत उस “ाख़्स की है जिसकी नीयत सच्ची है और बातिन साफ़ है और इसका यक़ीन ख़ालिस है और मीज़ाने अमल गराँबार।
और फिर मैं “ाहादत देता हूँ के हज़रत मोहम्मद (स0) उसके बन्दे और तमाम मख़लूक़ात में मुन्तख़ब रसूल हैं। उन्हें हक़ाएक़ की तषरीह के लिये चुना गया है और बेहतरीन “ाराफ़तों से मख़सूस किया गया है। अज़ीमतरीन पैग़ामात के लिये उनका इन्तेख़ाब हुआ है और उनके ज़रिये हिदायत की अलामात की वज़ाहत की गई है और गुमराही की तारीकियों को दूर किया गया है।
लोगों! याद रखो यह दुनिया अपने से लौ लगाने वाले और अपनी तरफ़ खिंच जाने वाले को हमेषा धोका दिया करती है। जो इसका ख़्वाहिषमन्द होता है उससे बुख़ल नहीं करती है और जो इस पर ग़ालिब आ जाता है उस पर क़ाबू पा लेती है। ख़ुदा की क़सम कोई भी क़ौम जो नेमतों की तरोताज़ा और “ाादाब ज़िन्दगी में थी और फिर इसकी वह ज़िन्दगी ज़ाएल हो गई है तो उसका कोई सबब सिवाए इन गुनाहों के नहीं है जिनका इरतेकाब इस क़ौम ने किया है। इसलिये के परवरदिगार अपने बन्दों पर ज़ुल्म नहीं करता है। फ़िर भी जिन लोगों पर इताब नाज़िल होता है और नेमतें ज़ाएल हो जाती हैं अगर सिद्क़े नीयत और तवज्जो-ए-क़ल्ब के साथ परवरदिगार की बारगाह में फ़रयाद करें तो वह गई हुई नेमतों को वापस कर देगा और बिगड़े कामों को बना देगा। मैं तुम्हारे बारे में इस बात से ख़ौफ़ज़दा हूँ के कहीं तुम जेहालत और नादानी में न पड़ जाओ। कितने ही मुआमलात ऐसे गुज़र चुके हैं जिनमें तुम्हारा झुकाव उस रूख़ की तरफ़ था जिसमें तुम क़तअन क़ाबिले तारीफ़ नहीं थे। अब अगर तुम्हें पहले की रविष की तरफ़ पलटा दिया जाए तो फिर नेक बख़्त हो सकते हो लेकिन मेरी ज़िम्मेदारी सिर्फ़ मेहनत करना है और अगर मैं कहना चाहूँ तो यही कह सकता हूँ के परवरदिगार गुज़िष्ता मुआमलात से दरगुज़र फ़रमाए।