ख़ुत्बात
 
177- आपका इरषादे गिरामी
(सिफ़्फ़ीन के बाद हकमीन के बारे में)


तुम्हारी जमाअत ही ने दो आदमियों के इन्तेख़ाब पर इत्तेफ़ाक़ कर लिया था। मैंने तो उन दोनों से “ार्त कर ली थी के क़ुरान की हुदूद पर तौक़फ़ करेंगे और उससे तजावुज़ नहीं करेंगे। उनकी ज़बान इसके साथ रहेगी और वह इसी का इत्तेबाअ करेंगे। लेकिन वह दोनों भड़क गए और हक़ को देख भाल कर नज़र अन्दाज़ कर दिया। ज़ुल्म उनकी आरज़ू था और कजरवी फ़हमी इनकी राय (रोष थी), जबके इस बदतरीन राय और इस ज़ालिमाना फ़ैसले से पहले ही मैंने यह “ार्त कर दी थी के अदालत के साथ फ़ैसला करेंगे और हक़ के मुताबिक़ अमल करेंगे लेहाज़ा मेरे पास अपने हक़ में हुज्जत व दलील मौजूद है के इन लोगों ने राहे हक़ से इख़्तेलाफ़ किया है और तै “ाुदा क़रारदाद के खि़लाफ़ उलटा हुक्म किया है।