ख़ुत्बात
 

176- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जिसमें मौअज़ा के साथ क़ुरान के फ़ज़ाएल और बिदअतों के कानअत का तज़किरा किया गया है)


(क़ुराने हकीम) देखो परवरदिगार के बयान से फ़ायदा उठाओ और उसके मवाएज़ से नसीहत हासिल करो और उसकी नसीहत को क़ुबूल करो। उसने वाज़ेह बयानात के ज़रिये तुम्हारे हर उज़्र को ख़त्म कर दिया है और तुम पर हुज्जत तमाम कर दी है। तुम्हारे लिये अपने महबूब और नापसन्दीदा तमाम आमाल की वज़ाहत कर दी है ताके तुम एक क़िस्म का इत्तेबाअ करो और दूसरी से इज्तेनाब करो (बचो) के रसूले अकरम (स0) बराबर यह फ़रमाया करते थे के जन्नत नागवारियों में घेर दी गई है और जहन्नुम को ख़्वाहिषात के घेरे में डाल दिया गया है।
याद रखो के ख़ुदा की कोई इताअत ऐसी नहीं है जिसमें नागवारी की “ाक्ल न हो और इसकी कोई मासीयत ऐसी नहीं है जिसमें ख़्वाहिष का कोई पहलू न हो। अल्लाह उस बन्दे पर रहमत नाज़िल करे जो ख़्वाहिषात से अलग हो जाए और नफ़्स के हवा व होस को (जड़े बुनियाद से) उखाड़ कर फेंक दे के यह नफ़्स ख़्वाहिषात में बहुत दूर तक खिंच जाने वाला है और यह हमेषा गुनाहों की ख़्वाहिष ही की तरफ़ खींचता है।
बन्दगाने ख़ुदा! याद रखो के मर्दे मोमिन हमेषा सुबह व “ााम अपने नफ़्स से बदगुमान ही रहता है और उससे नाराज़ ही रहता है और (उससे) नाराज़गी में इज़ाफ़ा ही करता रहता है लेहाज़ा तुम भी अपने पहले वालों के मानिन्द हो जाओ जो तुम्हारे आगे-आगे जा रहे हैं के उन्होंने दूनियां से अपने ख़ेमे डेरा को हटा लिया है (रूख़सते सफ़र बान्धा जिस तरह मुसाफ़िर अपना डेरा उठा लेता है) और एक मुसाफ़िर की तरह दुनिया की मन्ज़िलों को तय करते हुए आगे बढ़ गए हैं।
याद रखो के यह क़ुरान वह नासेह (नसीहत करने वाला) है जो धोका नहीं देता है और वह हादी है जो गुमराह नहीं करता है। वह बयान करने वाला है (और) ग़लत बयानी से काम लेने वाला नहीं है। कोई “ाख़्स उसके पास (2) नहीं बैठता है मगर यह के जब उठता है तो हिदायत में इज़ाफ़ा कर लेता है या इससे गुमराही में कमी कर लेता है (गुमराही हो घटाकर उससे अलग करता है)।


(((-इन नागवारियों और दुष्वारियों से मुराद सिर्फ इबादत नहीं है के वह सिर्फ़ काहिल और बेदीन अफ़राद के लिये दुष्वार हैं वरना सन्जीदा और दीनदार अफ़राद इनमें लज्ज़त और राहत ही का एहसास करते हैं। दर हक़ीक़त इन दुष्वारियों से मुराद वह जेहाद है जिसमें हर राहे हयात में सारी तवानाइयों को ख़र्च करना पड़ता है और हर तरह की ज़हमत का सामना करना पड़ता है जैसा के सूरए मुबारका तौबा में एलान किया गया है के अल्लाह ने साहेबाने ईमान के जान व माल को ख़रीद लिया है और उन्हें जन्नत दे दी है। यह लोग राहे ख़ुदा में जेहाद करते हैं और दुष्मन को तहे तेग़ करने के साथ ख़ुद भी “ाहीद हो जाते हैं। (2) कितनी हसीन तरीन ताबीर है तिलावते क़ुरान की के इन्सान क़ुरान के साथ इस तरह रहे जिस तरह कोई “ाख़्स अपने हमनषीन के साथ बैठता है और जिसके नतीजे में जमाल, हमनषीन से मुतास्सिर होता है। मुसलमान का ताल्लुक़ सिर्फ़ क़ुराने मजीद से नहीं होता है बल्कि उसके मानी से होता है ताके इसके मफ़ाहिम से आष्ना हो सके और उसके तालीमात से फ़ायदा उठा सके। -)))

याद रखो! क़ुरान के बाद कोई किसी का मोहताज नहीं हो सकता है और क़ुरान से (कुछ सीखने से) पहले कोई बे नियाज़ नहीं हो सकता है। अपनी बीमारियों की इससे षिफ़ा हासिल करो और अपनी मुसीबतों में इससे मदद मांगो के इसमें बदतरीन बीमारी कुफ्ऱ व निफ़ाक़ और गुमराही व बेराहरवी का इलाज भी मौजूद है, इसके ज़रिये अल्लाह से सवाल करो और इसकी मोहब्बत के वसीले से उसकी तरफ़ रूख़ करो (अल्लाह से मांगो) और इसके अलावा मख़लूक़ात से सवाल न करो (इसे लोगों से मांगने का ज़रिया न बनाओ)। इसलिये के मालिक की तरफ़ मुतवज्जो होने का इसका जैसा कोई वसीला नहीं है और याद रखो के वह ऐसा “ाफ़ीअ (षिफ़ाअत करने वाला) है जिसकी षिफ़ाअत मक़बूल है और ऐसा बोलने वाला है जिसकी बात मुसद्देक़ा है। जिसके लिये क़ुरान रोज़े क़यामत सिफ़ारिष कर दे उसके हक़ में षिफ़ाअत क़ुबूल है और जिसके ऐब को वह बयान कर दे उसका ऐब तस्दीक़ “ाुदा है। रोज़े क़यामत एक मुनादी (निदा देने वाला) आवाज़ देगा के हर (हर क़ुरान की खेती बोने वाला और उसके अलावा हर बोने वाला) अपनी खेती और अपने अमल के अन्जाम में मुब्तिला है लेकिन जो अपने दिल में क़ुरान का बीज बोने वाले थे वह कामयाब हैं लेहाज़ा तुम लोग उन्हीं लोगों और क़ुरान की पैरवी करने वालों में “ाामिल हो जाओ। उसे मालिक की बारगाह तक पहुंचने में अपना रहनुमा बनाओ और उससे अपने नफ़्स के बारे में नसीहत हासिल करो और अपने ख़यालात को मुतहम (ग़लत) क़रार दो और अपने ख़्वाहिषात को फ़रेबख़ोरदा तसव्वुर करो।


अमल करो अमल- अन्जाम पर निगाह रखो अन्जाम- इस्तेक़ामत से काम लो और इस्तेक़ामत और एहतियात करो एहतियात- तुम्हारे लिये एक इन्तेहा मुअय्यन है उसकी तरफ़ क़दम आगे बढ़ाओ और अल्लाह की बारगाह में उसके हुक़ूक़ की अदायगी और उसके एहकाम की पाबन्दी के साथ हाज़री दो। मैं तुम्हारे आमाल का गवाह बनूंगा और रोज़े क़यामत तुम्हारी तरफ़ से वकालत (हुज्जत पेष) करूंगा।
(नसाएह) याद रखो के जो कुछ होना था वह हो चुका और जो फ़ैसला ख़ुदावन्दी था वह सामने आ चुका। मैं ख़ुदाई वादे और उसकी बुरहान के सहारे कलाम कर रहा हूं बेषक जिन लोगों ने ख़ुदा को ख़ुदा माना और इसी बात पर क़ायम रह गए, उन पर मलाएका इस बषारत के साथ नाज़िल होते हैं के ख़बरदार डरो नहीं और परेषान मत हो, तुम्हारे लिये उस जन्नत की बषारत है जिसका तुमसे वादा किया गया है’’ और तुम लोग तो ख़ुदा को ख़ुदा कह चुके हो तो अब उसकी किताब पर क़ायम रहो और उसके अम्र के रास्ते पर साबित क़दम रहो। उसकी इबादत के नेक रास्ते पर जमे रहो और उससे ख़ुरूज न करो और न कोई बिदअत ईजाद करो और न सुन्नत से इख़्तेलाफ़ करो। इसलिये के इताअते इलाही से निकल जाने वाले का रिष्ता परवरदिगार से रोज़े क़यामत टूट जाता है। इससे (के फ़रेब से) होषियार रहो के तुम्हारे एख़लाक़ में उलट फ़ेर अदल-बदल न होने पाए। अपनी ज़बान को एक रखो और उसे महफ़ूज़ रखो इसलिये के यह ज़बान अपने मालिक से बहुत मुंहज़ोरी करती है। ख़ुदा की क़सम मैंने किसी बन्दए मोमिन को नहीं देखा जिसने अपने तक़वा से फ़ायदा उठाया हो मगर यह के अपनी ज़बान को रोक कर रखा है। मोमिन की ज़बान हमेषा उसके दिल के पीछे होती है और मुनाफ़िक़ का दिल हमेषा उसकी ज़बान के पीछे होता है। इसलिये के मोमिन जब बात करना चाहता है तो पहले दिल में ग़ौर-व-फ़िक्र करता है। इसके बाद हर्फ़े ख़ैर होता है तो उसका इज़हार करता है वरना उसे दिल ही में छिपा रहने देता है। लेकिन मुनाफ़िक़ जो इस के मुंह में आता है बक देता है। उसे इस बात की फ़िक्र नहीं होती है के मेरे मवाफ़िक़ है या मुख़ालिफ़।


पैग़म्बरे इस्लाम (स0) ने फ़रमाया है के किसी “ाख़्स का ईमान उस वक़्त तक दुरूस्त नहीं हो सकता है जब तक उसका दिल दुरूस्त न हो और किसी “ाख़्स का दिल दुरूस्त नहीं हो सकता है जब तक उसकी ज़बान दुरूस्त न हो। अब जो “ाख़्स भी अपने परवरदिगार से इस आलम में मुलाक़ात कर सकता है के उसका हाथ मुसलमानों के ख़ून और उनके माल से पाक हो और उसकी ज़बान उनकी आबरूरेज़ी से महफ़ूज़ हो तो उसे बहरहाल ऐसा ज़रूर करना चाहिये।
(बिदअतों की मोमानिअत) याद रखो के मर्दे मोमिन उस साल इसी चीज़ को हलाल कहता है के जिसे अगले साल हलाल कह चुका है और इस साल उसी “ौ को हराम क़रार देता है जिसे पिछले साल हराम क़रार दे चुका है। और लोगों की बिदअतें और उनकी ईजादात हरामे इलाही को हलाल नहीं बना सकती हैं हलाल व हराम वही है जिसे परवरदिगार ने हलाल व हराम कह दिया है। तुमने तमाम उमूर को आज़मा लिया है और सबका बाक़ायदा तजुर्बा कर लिया है और तुम्हें पहले वालों के हालात से नसीहत भी की जा चुकी है और उनकी मिसालें भी बयान की जा चुकी हैं और एक वाज़ेअ अम्र की दावत भी दी जा चुकी है के अब इस मामले में बहरापन इख़्तेयार नहीं करेगा मगर वही जो वाक़ेअन बहरा हो और अन्धा नहीं बनेगा मगर वही जो वाक़ेअन अन्धा हो और फिर जिसे बलाएं और तजुर्बात फ़ायदा न दे सकें उसे नसीहतें क्या फ़ायदा देंगी। इसके सामने सिर्फ़ कोताहियां ही रहेंगी जिनके नतीजे में बुराईयों को अच्छा और अच्छाइयों को बुरा समझने लगेगा।


लोग दो ही क़िस्म के होते हैं- या वह जो “ारीअत का इत्तेबाअ करते हैं या वह जो बिदअतों की ईजाद करते हैं और उनके पास न सुन्नत की कोई दलील होती है और न हुज्जते परवरदिगार की कोई रोषनी।
(क़ुरान) परवरदिगार ने किसी “ाख़्स को क़ुरान से बेहतर कोई नसीहत नहीं फ़रमाई है। के यही ख़ुदा की मज़बूत रस्सी और इसका अमानतदार वसीला है। इसमें दिलों की बहार का सामान और इल्म के सरचष्मे हैं और दिल की जिलाए इसके अलावा कुछ नहीं है। अब अगरचे नसीहत हासिल करने वाले जा चुके हैं और सिर्फ भूल जाने वाले या भुला देने वाले बाक़ी रह गये हैं लेकिन फ़िर भी तुम कोई खै़र देखो तो उस पर लोगों की मदद करो और कोई “ार देखो तो उससे दूर हो जाओ के रसूले अकरम (स0) बराबर फ़रमाया करते थे ‘‘फ़रज़न्दे आदम ख़ैर पर अमल कर और “ार को नज़रअन्दाज़ कर दे ताके बेहतरीन नेक किरदार और मयाना रद हो जाए।


(अक़सामे ज़ुल्म) याद रखो के ज़ुल्म की तीन क़िस्में हैं, वह ज़ुल्म जिसकी बख़्िषष नहीं है और वह ज़ुल्म जिसे छोड़ा नहीं जा सकता है और वह ज़ुल्म जिसकी बख़्िषष हो जाती है और उसका मुतालेबा नहीं होता है।
वह ज़ुल्म जिसकी बख़्िषष नहीं है वह अल्लाह का “ारीक क़रार देना है के परवरदिगार ने ख़ुद एलान कर दिया है के इसका “ारीक क़रार देने वाले की मग़फ़िरत नहीं हो सकती है और वह ज़ुल्म जो माफ़ कर दिया जाता है वह इन्सान का अपने नफ़्स पर ज़ुल्म है मामूली गुनाहों के ज़रिये। और वह ज़ुल्म जिसे छोड़ा नहीं जा सकता है वह बन्दों का एक-दूसरे पर ज़ुल्म है के यहां क़ेसास बहुत सख़्त है और यह सिर्फ़ छुरी का ज़ख़्म और ताज़ियाने की मार नहीं बल्कि ऐसी सज़ा है जिसके सामने यह सब बहुत मामूली हैं लेहाज़ा ख़बरदार दीने ख़ुदा में रंग बदलने की रोष इख़्तेयार मत करो के जिस हक़ को तुम नापसन्द करते हो उस पर मुत्तहिद रहना इस बातिल पर चलकर मुन्तषिर हो जाने से बहरहाल बेहतर है जिसे तुम पसन्द करते हो, परवरदिगार ने इफ़तेराक़ व इन्तेषार में किसी को कोई ख़ैर नहीं दिया है न उन लोगों में जो चले गए और न उनमें जो बाक़ी रह गए हैं।


(((-इस्लाम के हलाल व हराम दो क़िस्म के हैं, बाज़ उमू रवह हैं जिन्हें मुतलक़ तौर पर हलाल या हराम क़रार दिया गया उनमें तग़य्युर का कोई इमकान नहीं है और उन्हें बदलने वाला दीने ख़ुदा में दख़लअन्दाज़ी करने वाला है जो ख़ुद एक तरह का कुफ्ऱ है, अगरचे बज़ाहिर इसका नाम कुफ्ऱ या षिर्क नहीं है और बाज़ उमू रवह हैं जिनकी हिलयत या हुरमत हालात के एतबार से रखी गई है। ज़ाहिर है के इनका हुक्म हालात के बदलने के साथ ख़ुद ही बदल जाएगा। इसमें किसी के बदलने का कोई सवाल नहीं पैदा होता है। एक मुसलमान और ग़ैर मुसलमान या एक मोमिन और ग़ैर मोमिन का फ़र्क़ यही है के मुसलमान और अम्रे इलाहिया का मुकम्मल इत्तेबाअ करता है और काफ़िर या मुनाफ़िक़ इन एहकाम को अपने मसालेह और मनाफ़ेह के मुताबिक़ बदल लेता है और इसका नाम मसलहते इस्लाम या मस्लहते मुस्लेमीन रख देता है।-)))


लोगों! ख़ुष नसीब है वह जिसे अपना ऐब दूसरों के ऐब पर नज़र करने से मषग़ूल कर ले और क़ाबिले मुबारकबाद है वह “ाख़्स जो अपने घर में बैठ रहे। अपना रिज़्क़ खाए और अपने परवरदिगार की इताअत करता रहे और अपने गुनाहों पर गिरया करता रहे। वह अपने नफ़्स में मषग़ूल रहे और लोग उसकी तरफ़ से मुतमईन रहें।