ख़ुत्बात
 
174-आपका इरषादे गिरामी
(तल्हा बिन अब्दुल्लाह के बारे में जब आपको ख़बर दी गई के तल्हा व ज़ुबैर जंग के लिये बसरा की तरफ़ रवाना हो गए हैं)


मुझे किसी ज़माने में भी न जंग से मरऊब किया जा सका है और न हर्ब व ज़र्ब से डराया जा सका है। मैं अपने परवरदिगार के नुसरत पर मुतमईन हूँ और ख़ुदा की क़सम उस “ाख़्स ने ख़ूने उस्मान के मुतालबे के साथ तलवार खींचने में सिर्फ़ इसलिये जल्दबाज़ी से काम लिया है के कहीं उसी से इस ख़ून का मुतालेबा न कर दिया जाए के इसी अम्र का गुमान ग़ालिब है और क़ौम में उससे ज़्यादा उस्मान के ख़ून का प्यासा कोई न था। अब यह इस फ़ौजकषी के ज़रिये लोगों को मुग़ालते में रखना चाहता है और मसले को मुष्तबा और मषकूक बना देना है। हालांके ख़ुदा गवाह है के उस्मान के मामले में उसका मुआमला तीन हाल से ख़ाली नहीं था, अगर उस्मान ज़ालिम था जैसा के इसका ख़याल था तो इसका फ़र्ज़ था के क़ातिलों की मदद करता और उस्मान के मददगारों को ठुकरा देता और अगर वह मज़लूम था तो उसका फ़र्ज़ था के इसके क़त्ल से रोकने वालों और उसकी तरफ़ से माज़ेरत करने वालों में “ाामिल हो जाता और अगर यह दोनों बातें मषकूक थीं तो इसके लिये मुनासिब था के इस मामले से अलग होकर एक गोषे में बैठ जाता और उन्हें क़ौम के हवाले कर देता लेकिन उसने इन तीन में से कोई भी तरीक़ा इख़्तेयार नहीं किया और ऐसा तरीक़ा इख़्तेयार किया जिसकी सेहत का कोई जवाज़ नहीं था और इसकी माज़ेरत का कोई रास्ता नहीं था।