ख़ुत्बात
 
173-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(रसूले अकरम (स0) के बारे में और इस अम्र की वज़ाहत के सिलसिले में के खि़लाफ़त का वाक़ेई हक़दार कौन है?)


पैग़म्बरे इस्लाम (स0) वहीए इलाही के अमानतदार और ख़ातमुल मुरसलीन थे रहमते इलाही की बषारत देने वाले और अज़ाबे इलाही से डराने वाले थे।
लोगों! याद रखो उस अम्र का सबसे ज़्यादा हक़दार वही है जो सबसे ज़्यादा ताक़तवर और दीने इलाही का वाक़िफ़कार हो। इसके बाद अगर कोई फ़ित्ना परवाज़ फ़ित्ना खड़ा हो जाएगा तो पहले उसे तौबा की दावत दी जाएगी, उसके बाद अगर इन्कार करेगा तो क़त्ल कर दिया जाएगा। मेरी जान की क़सम अगर उम्मत का मसल तमाम अफ़रादे बषर के इज्तेमाअ के बग़ैर तय नहीं हो सकता है तो इस इज्तेमाअ का तो कोई रास्ता ही नहीं है। होता यही है के हाज़िरीन का फ़ैसला ग़ायब अफ़राद पर नाफ़िज़ हो जाता है और न तो हाज़िर को अपनी बैअत से रूजू करने का हक़ होता है और न ग़ायब को दूसरा रास्ता इख़्तेयार करने का जवाज़ होता है।
याद रखो के मैं दोनों तरह के अफ़राद से जेहाद करूंगा। उनसे भी जो ग़ैरे हक़ के दावेदार होंगे और उनसे भी जो हक़दार को उसका हक़ न देंगे। बन्दगाने ख़ुदा! मैं तुम्हें तक़वाए इलाही की वसीयत करता हूँ के यह बन्दों के दरम्यान बेहतरीन वसीयत है और पेषे परवरदिगार अन्जाम के ऐतबार से बेहतरीन अमल है। देखो! तुम्हारे और अहले क़िबला मुसलमानों के दरम्यान जंग का दरवाज़ा खोला जा चुका है। अब इस अलम को वही उठाएगा जो साहेबे बसीरत व सब्र होगा और हक़ के मराकज़ का पहचानने वाला होगा। तुम्हारा फ़र्ज़ है के मेरे एहकाम के मुताबिक़ क़दम आगे बढ़ाओ और मैं जहांँ रोक दूं वहाँ रूक जाओ और ख़बरदार किसी मसले में भी तहक़ीक़ के बग़ैर जल्दबाज़ी से काम न लेना के मुझे जिन बातों का तुम इन्कार करते हो उनमें ग़ैर मामूली इन्के़लाबात का अन्देषा रहता है।
याद रखो- यह दुनिया जिसकी तुम आरज़ू कर रहे हो और जिसमें तुम रग़बत का इज़हार कर रहे हो और जो कभी कभी तुमसे अदावत करती है और कभी तुम्हें ख़ुष कर देती है। यह तुम्हारा वाक़ेई घर और तुम्हारी वाक़ेई मन्ज़िल नहीं है जिसके लिये तुम्हें ख़ल्क़ किया गया है और जिसकी तरफ़ तुम्हें दावत दी गई है और फिर यह बाक़ी रहने वाली भी नहीं है और तुम भी उसमें बाक़ी रहने वाले नहीं हो। यह अगर कभी धोका देती है तो दूसरे वक़्त अपने “ार से होषियार भी कर देती है, लेहाज़ा इसके धोके से बचो और इसकी तम्बीह पर अमल करो। इसकी लालच को नज़र अन्दाज़ करो और इसकी तख़वीफ़ का ख़याल रखो। इसमें रहकर इस घर की तरफ़ सबक़त करो जिसकी तुम्हें दावत दी गई है और अपने दिलों का रूख़ उसकी तरफ़ से मोड़ लो और ख़बरदार तुममें से कोई “ाख़्स इसकी किसी नेमत से महरूमी की बुनियाद पर कनीज़ों की तरह रोने न बैठ जाए। अल्लाह से उसकी नेमतों की तकमील का मुतालेबा करो, उसकी इताअत पर सब्र करने और इसकी किताब के एहकाम की मुख़ालफ़त करने के ज़रिये।
याद रखो अगर तुमने दीन की बुनियाद को महफ़ूज़ कर दिया तो दुनिया की किसी “ौ की बरबादी भी तुम्हें नुक़सान नहीं पहुंचा सकती है और अगर तुमने दीन को बरबाद कर दिया तो दुनिया में किसी “ौ की हिफ़ाज़त भी फ़ायदा नहीं दे सकती है। अल्लाह हम सबके दिल को हक़ के रास्ते पर लगा दे और सबको सब्र की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।


(((-अलम लष्करे क़ौम की सरबलन्दी की निषानी और लष्कर के वेक़ार व इज़्ज़त की अलामत होता है। लेहाज़ा इसको उठाने वाले को भी साहबे बसीरत व बरदाष्त होना ज़रूरी है वरना अगर परचम सरनिगूँ हो गया तो न लष्कर का कोई वेक़ार रह जाएगा और न मज़हब का कोई एतबार रह जाएगा।
सरकारे दो आलम (स0) ने इन्हें ख़ुसूसियात के पेषे नज़र ख़ैबर के मौक़े पर एलान फ़रमाया था के कल मैं उसको अलम दूंगा जो कर्रार, ग़ैरे फ़र्रार, मोहिब्बे ख़ुदा व रसूल (स0), महबूबे ख़ुदा व रसूल (स0) और मर्दे मैदाँ होगा के इसके अलावा कोई “ाख़्स अलमबरदारी का अहल नहीं हो सकता है!-)))