ख़ुत्बात
 
171- आपका इरषादे गिरामी
(जब असहाबे माविया से सिफ़्फ़ीन में मुक़ाबले के लिये इरादा फ़रमाया)


ऐ परवरदिगार जो बलन्दतरीन छत और ठहरी हुई फ़िज़ा का मालिक है। जिसने इस फ़िज़ा को “ाब व रोज़ के सर छिपाने की मन्ज़िल और “ाम्स व क़मर के सेर का मैदान और सितारों की आमद व रफ़्त की जूलाँगाह क़रार दिया है। इसका साकिन मलाएका के उस गिरोह को क़रार दिया है जो तेरी इबादत से ख़स्ताहाल नहीं होते हैं। तू ही इस ज़मीन का भी मालिक है जिसे लोगों का मुस्तक़र बनाया है और जानवरों, कीड़ों मकोड़ों और बेषुमार मुरई और ग़ैर मुरई मख़लूक़ात के चलने-फिरने की जगह क़रार दिया है।
तू ही इन सरबफ़लक पहाड़ों का मालिक है जिन्हें ज़मीन के ठहराव के लिये मेख़ का दरजा दिया गया है और मख़लूक़ात का सहारा क़रार दिया गया है।


(((-यह इस्तेदलाल अपने हुस्न व जमाल के अलावा इस मानवीयत की तरफ़ भी इषारा है के इस्लाम में मेरी हैसियत एक सरसब्ज़ व “ाादाब गुलिस्तान की है जहां इस्लामी एहकाम व तालीमात की बहारें ख़ेमाज़न रहती हैं और मेरे अलावा तमाम अफ़राद एक रेगिस्तान से ज़्यादा कोई हैसियत नहीं रखते हैं। किस क़द्र हैरत की बात है के इन्सान सब्ज़ाजार और चष्मए आबे हयात को छोड़कर फिर रेगिस्तानों की तरफ़ पलट जाए और तष्नाकामी की ज़िन्दगी गुज़ारता है। जो तमाम अहले “ााम का मुक़द्दर है।-)))
अगर तूने दुष्मन के मुक़ाबले में ग़लबा इनायत फ़रमाया तो हमें ज़ुल्म से महफ़ूज़ रखना और हक़ के सीधे रास्ते पर क़ायम रखना और अगर दुष्मन को हम पर ग़लबा हासिल हो जाए तो हमें “ाहादत का “ारफ़ अता फ़रमाना और फ़ित्ना से महफ़ूज़ रखना।
(दावते जेहाद) कहाँ हैं वह इज़्ज़त व आबरू के पासबान और मुसीबतों के नुज़ूल के बाज़ नग व नाम की हिफ़ाज़त करने वाले साहेबाने इज़्ज़त व ग़ैरत। याद रखो ज़िल्लत व आर तुम्हारे पीछे है और जन्नत तुम्हारे आगे।


(((-बाज़ हज़रात का ख़याल है के यह बात “ाूरा के मौक़े पर साद बिन अबी वक़ास ने कही थी और बाज़ का ख़याल है के सक़ीफ़ा के मौक़े पर अबू उबैदा बिन अलजराह ने कही थी और दोनों ही इमकानात पाए जाते हैं के दोनों की फ़ितरत एक जैसी थी और दोनों अमीरूलमोमेनीन (अ0) की मुख़ालफ़त पर मुत्तहिद थे।
-इससे मुदार तल्हा व ज़ुबैर हैं जिन्होंने ज़ौजए रसूल (स0) का इतना भी एहतेराम नहीं किया जितना अपनी घर की औरतों का किया करते थे-)))