ख़ुत्बात
 
170-आपका इरषादे गिरामी
(दलील क़ायम हो जाने के बाद हक़ के इतेबाअ के सिलसिले में जब अहले बसरा ने बाज़ अफ़राद को उस ग़र्ज़ से भेजा के अहले जमल के बारे में हज़रत के मौक़ूफ़ को दरयाफ़्त करें ताके किसी तरह का “ाुबह बाक़ी न रह जाए तो आपने जुमला उमूर की मुकम्मल वज़ाहत फ़रमाई ताके वाज़ेह हो जाए के आप हक़ पर हैं। इसके बाद फ़रमाया के जब हक़ वाज़ेह हो गया तो मेरे हाथ पर बैअत कर लो। उसने कहा के मैं एक क़ौम का नुमाइन्दा हूँ और उनकी तरफ़ रूजूअ किये बग़ैर कोई एक़दाम नहीं कर सकता हूँ- फ़रमाया के)


तुम्हारा क्या ख़याल है अगर इस क़ौम ने तुम्हें नुमाइन्दा बनाकर भेजा होता के जाओ तलाष करो जहां बारिष हो और पानी की कोई सबील हो और तुम वापस जाकर पानी और सब्ज़ा की ख़बर देते और वह लोग तुम्हारी मुख़ालफ़त करके ऐसी जगह का इन्तेख़ाब करते जहां पानी का क़हत और ख़ुष्कसाली का दौरे दौरा हो तो उस वक़्त तुम्हारा एक़दाम क्या होता? उसने कहा के मैं उन्हें छोड़कर आबो दाना की तरफ़ चला जाता। फ़रमाया फिर अब हाथ बढ़ाओ और बैअत कर लो के चष्मए हिदायत तो मिल गया है। उसने कहा के अब हुज्जत तमाम हो चुकी है और मेरे पास इन्कार का कोई जवाज़ नहीं रह गया है और यह कह कर हज़रत के दस्ते हक़ पर बैअत कर ली। (तारीख़ में इस “ाख़्स को कलीब जर्मी के नाम से याद किया जाता है)