ख़ुत्बात
 
169-आपका इरषादे गिरामी
(जब असहाबे जमल बसरा की तरफ़ जा रहे थे)


अल्लाह ने अपने रसूले हादी को बोलती किताब और मुस्तहकम अम्र के साथ भेजा है। उसके होते हुए वही हलाक हो सकता है जिसका मुक़द्दर ही हलाकत हो और नई नई बिदअतें और नए-नए “ाुबहात ही हलाक करने वाले होते हैं मगर यह के अल्लाह ही किसी को बचा ले और परवरदिगार की तरफ़ से मुअय्यन होने वाला हाकिम ही तुम्हारे उमूर की हिफ़ाज़त कर सकता है लेहाज़ा उसे ऐसी मुकम्मल इताअत दे दो जो न क़ाबिले मलामत हो और न बददिली का नतीजा हो। ख़ुदा की क़सम या तो तुम ऐसी इताअत करोगे या फिर तुमसे इस्लामी इक़्तेदार छिन जाएगा और फिर कभी तुम्हारी तरफ़ पलट कर न आएगा यहां तक के किसी ग़ैर के साये में पनाह ले ले।
देखो यह लोग मेरी हुकूमत से नाराज़गी पर मुत्तहिद हो चुके हैं और अब मैं उस वक़्त तक सब्र करूंगा जब तक तुम्हारी जमाअत के बारे में कोई अन्देषा न पैदा हो जाए।


(((- उस्मान के खि़लाफ़ क़यामक रने वाले सिर्फ़ मदीने के अफ़राद होते जब भी मुक़ाबला आसान था, चे जाएका बक़ौल तबरी इस जमाअत में छः सौ मिस्री भी “ाामिल थे और एक हज़ार कूफ़े के सिपाही भी आ गए थे और दीगर और दीगर इलाक़े के मज़लूमीन ने भी मुहिम में षिरकत कर ली थी। ऐसे हालात में एक “ाख़्स जमल व सिफ़फ़ीन के मारेके भी बरदाष्त करे और इनत माम इन्क़ेलाबियों का मुहासेबा भी “ाुरू कराए यह एक नामुमकिन अम्र है और फिर मुहासिबे के अमल में उम्मुल मोमेनीन और माविया को भी “ाामिल करना पड़ेगा के क़त्ले उस्मान की मुहिम में यह अफ़राद भी बराबर के “ारीक थे बल्कि उम्मुल मोमेनीन ने तो बाक़ायदा लोगों को क़त्ल पर आमादा किया था।
ऐसे हालात में मसला इस क़द्र आसान नहीं था जिस क़द्र बाज़ साद-व-लोह अफ़राद तसव्वुर कर रहे थे या बाज़ फ़ित्ना परवाने उसे हवा दे रहे थे-)))


इसलिये के अगर वह अपनी राय की कमज़ोरी के बावजूद इस अम्र में कामयाब हो गए तो मुसलमानों का रिष्तए नज़्म व नस्क़ बिल्कुल टूटकर रह जाएगा। उन लोगों ने इस दुनिया को सिर्फ़ न लोगों से हसद की बिना पर तलब किया है जिन्हें अल्लाह ने ख़लीफ़ा व हाकिम बनाया है। अब यह चाहते हैं के मुआमलात को उलटे पांव जाहेलीयत की तरफ़ पलटा दें। तुम्हारे लिये मेरे ज़िम्मे यही काम है के किताबे ख़ुदा और सुन्नते रसूल (स0) पर अमल करूं उनके हक़ को क़ायम करूं और उनकी सुन्नत को बलन्द व बाला क़रार दूँ।