ख़ुत्बात
 
168- आपका इरषादे गिरामी
(जब बैअते खि़लाफ़त के बाद बाज़ लोगों ने मुतालेबा किया के काष आप उस्मान पर ज़्यादती करने वालों को सज़ा देते)


भाईयों! जे तुम जानते हो मै। उससे नावाक़िफ़ नहीं हूँ लेकिन मेरे पास इसकी ताक़त कहाँ है? अभी वह क़ौम अपनी ताक़त व क़ूवत पर क़ायम है। वह हमारा इख़्तेयार रखती है और हमारे पास इसका इख़्तेयार नहीं है और फिर तुम्हारे ग़ुलाम भी उनके साथ उठ खड़े हुए हैं और तुम्हारे देहाती भी इनके गिर्द जमा हो गए हैं और वह तुम्हारे दरम्यान इस हालत में हैं के तुम्हें जिस तरह चाहें अज़ीयत पहुंचा सकते हैं। क्या तुम्हारी नज़र में जो कुछ तुम चाहते हो उसकी कोई गुन्जाइष है। बेषक यह सिर्फ़ जेहालत और नादानी का मुतालबा है और इस क़ौम के पास ताक़त का सरचष्मा मौजूद है। इस मामले में अगर लोगों को हरकत भी दी जाए तो वह चन्द फ़िरक़ों में तक़सीम हो जाएंगे। एक फ़िरक़ा वही सोचेगा जो तुम सोच रहे हो और दूसरा गिरोह उसके खि़लाफ़ राय का हामिल होगा। तीसरा गिरोह दोनों से ग़ैर जानिबदार बन जाएगा लेहाज़ा मुनासिब यही है के सब्र करो यहां तक के लोग ज़रा मुतमईन हो जाएं और दिल ठहर जाएं और इसके बाद देखो के मैं क्या करता हूँ। ख़बरदार कोई ऐसी हरकत न करना जो ताक़त् को कमज़ोर बना दे और क़ूवत को पामाल कर दे और कमज़ोरी व ज़िल्लत का बाएस हो जाए। मैं जहां तक मुमकिन होगा इस जंग को रोके रहूँगा। इसके बाद जब कोई चाराएकार न रह जाएगा तो आखि़री इलाज दाग़ना ही होता है।