ख़ुत्बात
 
167-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(इब्तेदाए खि़लाफ़त के दौर में)


प्रवरदिगार ने इस किताबे हिदायत को नाज़िल किया है जिसमें ख़ैर व “ार की वज़ाहत कर दी है लेहाज़ा तुम ख़ैर के रास्ते को इख़्तेयार करो ताके हिदायत पा जाओ और “ार के रूख़ से मुंह मोड़ लो ताके सीधे रास्ते पर आ जाओ।
फ़राएज़ का ख़याल रखो और उन्हें अदा करो ताके वह तुम्हें जन्नत तक पहुंचा दें। अल्लाह ने जिस हराम को हराम क़रार दिया है वह मजहोल नहीं है और जिस हलाल को हलाल बनाया है वह मुष्तबह नहीं है। उसने मुसलमान की हुरमत को तमाम मोहतरम चीज़ों से अफ़ज़ल क़रार दिया है और मुसलमानों के हुक़ूक़ को उनकी मन्ज़िलों में इख़लास और यगाँगत से बान्ध दिया है। अब मुसलमान वही है जिसके हाथ और ज़बान से तमाम मुसलमान महफ़ूज़ रहें मगर यह के किसी हक़ की बिना पर उन पर हाथ डाला जाए और किसी मुसलमान के लिये मुसलमान को तकलीफ़ देना जाएज़ नहीं है मगर यह के उसका वाक़ेई सबब पैदा हो जाए।
उस अम्र की तरफ़ सबक़त करो जो हर एक के लिये है और तुम्हारे लिये भी है और वह है मौत। लोग तुम्हारे आगे जा चुके हैं और तुम्हारा वक़्त तुम्हें हँका कर ले जा रहा है। सामान हल्का रखो ताके अगले लोगों से मुलहक़ हो जाओ इसलिये के इन पहले वालों के ज़रिये तुम्हारा इन्तेज़ार किया जा रहा है।
अल्लाह से डरो उसके बन्दों के बारे में भी और “ाहरों के बारे में भी। इसलिये के तुमसे ज़मीनों और जानवरों के बारे में भी सवाल किया जाएगा। अल्लाह की इताअत करो और नाफ़रमानी न करो। ख़ैर को देखो तो फ़ौरन ले लो और “ार पर नज़र पड़ जाए तो किनाराकष हो जाओ।


(((-इस क़ानून में मुसलमान की कोई तख़सीस नहीं है। मुसलमान वही होता है जिसके हाथ या उसकी ज़बान से किसी फ़र्दे बषर को अज़ीयत न हो और उसके “ार से लोग महफ़ूज़ रहें। लेकिन यह उसी वक़्त तक है जब किसी के बारे में ज़बान खोलना या हाथ उठाना “ार “ाुमार हो वरना अगर इन्सान इस अम्र का मुस्तहक़ हो गया है के उसके किरदार पर तन्क़ीद न करना या उसे क़रार वाक़ेई सज़ा न देना दीने ख़ुदा की तौहीन है तो कोई “ाख़्स भी दीने ख़ुदा से ज़्यादा मोहतरम नहीं है। इन्सान का एहतेराम दीने ख़ुदा के तुफ़ैल में है। अगर दीने ख़ुदा ही का एहतेराम न रह गया तो किसी “ाख़्स के एहतेराम की कोई हैसियत नहीं है।-)))