ख़ुत्बात
 
165-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जिसमें मोर की अजीब व ग़रीब खि़लक़त का तज़किरा किया गया है)

अल्लाह ने अपनी तमाम मख़लूक़ात को अजीब व ग़रीब बनाया है चाहे वह ज़ी हयात हों या बेजान, साकिन हों या मुतहर्रिक और इन सब के ज़रिये अपनी लतीफ़ सनअत और अज़ीम क़ुदरत के “ावाहिद क़ायम कर दिये हैं जिनके सामने अक़्लें बकमाले एतराफ़ व तस्लीम सर ख़म किये हुए हैं और फिर हमारे कानों में उसकी वहदानियत के दलाएल।
इन मुख़तलिफ़ सूरतों के परिन्दों की तख़लीक़ की “ाक्ल में गूंज रहे हैं जिन्हें ज़मीन के गड्ढों, दरों के षिगाफ़ों, पहाड़ों की बलन्दियों पर आबाद किया है जिनके पर मुख़्तलिफ़ क़िस्म के और जिनकी हैसियत जुदागाना अन्दाज़ की है उन्हें तसख़ीर की ज़माम के ज़रिये हरकत दी जा रही है और वह अपने परों को वसीअ फ़िजा के रास्तों और कुषादा हवा की वुसअतों में फड़फड़ा रहे हैं। उन्हें आलमेे अदम से निकाल कर अजीब व ग़रीब ज़ाहेरी सूरतों में पैदा किया है और गोष्त व पोस्त में ढके हुए जोड़ों के सरों से उनके जिस्मों की साख़्त क़ायम की है। बाज़ को उनके जिस्म की संगीनी ने हवा में बलन्द होकर तेज़ परवाज़ से रोक दिया है और वह सिर्फ़ ज़रा ऊंचे होकर परवाज़ कर रहे हैं और फिर अपनी लतीफ़ क़ुदरत और दक़ीक़ सनअत के ज़रिये उन्हें मुख़तलिफ़ रंगों के साथ मुनज़्ज़म व मुरत्तब किया है के बाज़ एक ही रंग में डूबे हुए हैं के दूसरे रंग का “ााएबा भी नहीं है और बाज़ एक रंग में रंगे हैं लेकिन इनके गले का तौक़ दूसरे रंग का है।
(ताउस) इन सब में अजीब तरीन खि़लक़त मोर की है जिसे मोहकम तरीन तवाज़ुन के सांचे में ढाल दिया है और उसके रंगों में हसीन तरीन तंज़ीम क़ायम की है उसे वह रंगीन पर दिये हैं जिनकी जड़ों को एक दूसरे से जोड़ दिया है और वह दम दी है जो दूर तक खींचती चली जाती है। जब वह अपनी मादा का रूख़ करता है तो उसे फैला लेता है और अपने सर के ऊपर इस तरह साया फ़िगन कर लेता है जैसे मक़ामे दारैन की किष्ती का बादबान जिसे मल्लाह इधर उधर मोड़ रहा हो। वह अपने रंगों पर इतराता है और इसकी जुम्बिषों के साथ झूमने लगता है अपनी मादा से इस तरह जफ़ती खाता है जिस तरह मुर्ग़ और उसे इस तरह हामेला बनाता है जिस तरह ख़ुष व हैजान में भरे हुए जानवर। मैं इस मसले में तुम्हें मुषाहेदे के हवाले कर रहा हूँ। न उस “ाख़्स की तरह जो किसी कमज़ोर सनद के हवाले कर दे और अगर गुमान करने वालों का यह गुमान सही हो ताके वह उन आंसुओं के ज़रिये हमल ठहराता है जो उसकी आंखों से बाहर निकल कर पलकों पर ठहर जाते हैं और मादा उसे पी लेती है उसके बाद अण्डे देती है और उसमें नर व मादा का कोई इत्तेसाल नहीं होता है सिवाई उन फूट पड़ने वाले आंसूओं के तो यह बात कौए के बाहेमी खाने पीने के ज़रिये हमल ठहराने से ज़्यादा ताअज्जुब ख़ेज़ न होती।


(((-इल्मुल हैवान के माहिर रॉबर्टसन का बयान है के दुनिया में एक अरब क़िस्म के परिन्दे पाए जाते हैं और सब अपने-अपने मक़ाम पर अजीब व ग़रीब खि़लक़त के मालिक हैं सबसे बड़ा परिन्दा “ाुतुर्मुग़ है और सबसे छोटा तनान जिसका तूल पांच सेन्टीमीटर होता है लेकिन एक घन्टे में 80-90 किलोमीटर परवाज़ कर लेता है और एक सेकेन्ड में 50 से लेकर 200 मरतबा अपने परों को हरकत देता है।
बज़ परिन्दों का एक क़दम छः मीटर के बराबर होता है और ज़मीन पर 80 किलोमीटर फ़ी घन्टे की रफ़्तार से चल सकते हैं और बाज़ छः हज़ार मीटर की बलन्दी पर परवाज़ कर सकते हैं, बाज़ पानी के अन्दर 18 मीटर की गहराई तक चले जाते हैं और बज़ सिर्फ़ समन्दरों के इस पार से उस पार तक चक्कर लगाते रहते हैं।
ल्ेकिन इन सबसे ज़्यादा हैरत अंगेज़ अमीरूल मोमेनीन (अ0) की निगाह में मोर की खि़लक़त है जिसको मुख़्तलिफ़ रंगों में रंग दिया गया है और मुख़्तलिफ़ ख़ुसूसियात से नवाज़ दिया गया है यह और बात है के बेहतरीन परों के साथ नाज़ुक तरीन पैर भी दिये गए हैं ताके इसमें भी ग़ुरूर न पैदा हो और इन्सान को भी होष आ जाए के जिसके वजूद का एक रूख़ रंगीन होता है और इसका दूसरा रूख़ कमज़ोर भी होता है लेहाज़ा ग़ुरूर व इस्तेकबार का कोई इमकान नहीं है, बल्कि तक़ाज़ाए “ाराफ़त यह है के हसीन रूख़ का “ाुक्रिया अदा करे के यह भी मालिक का करम है इसका अपना कोई हक़ नहीं है जिसे मालिक ने अदा कर दिया हो।
यह एक हसीन तरीन फ़ितरत है के नर अपनी मादा के पास जाए तो हुस्न व जमाल के साथ जाए ताके उसे भी इन्स हासिल हो और वह भी अपने नर के जमाल पर फ़ख़्र कर सके ऐसा न हो के अमल फ़क़त एक जिन्सी अमल रह जाए और सुकूने नफ़्स का कोई रास्ता न निकल सके -)))


तुम इसकी रंगीनी पर ग़ौर करो तो ऐसा महसूस करोगे जैसे परों की दरम्यानी तीलियां चान्दी की सलाइयां हों और इन पर जो अजीब व ग़रीब हाले और सूरज की “ाुआओं जैसे जो परो-बाल आग आए हैं वह ख़ालिस सोने और ज़मर्द के टुकड़े हैं और अगर उन्हें ज़मीन के नबातात से तष्बीह देना चाहोगे तो यह कहोगे के यह हर मौसमे बहार के फूलों (1) का एक “ाुगूफ़ा है और अगर लिबास से तष्बीह देना चाहोगे तो कहोगे के यह नक़्षे दारे हुल्लों या ख़ुषनुमा यमनी चादरों जैसे हैं और अगर ज़ेवरात ही से तष्बीह देना चाहोगे तो इस तरह कहोगे के यह रंग-बिरंग के नगीने हैं जो चान्दी के दाएरों में जड़ दिये गए हैं। यह जानवर अपनी रफ़्तार एक मग़रूर और मुतकब्बिर “ाख़्स की तरह ख़राम नाज़ से चलता है और अपने बालो पर अपनी दुम को देखता रहता है। अपने फ़ितरी लिबास की ख़ूबसूरती और अपनी चादरे हयात की रंगीनी को देखकर क़हक़हे लगाता है और इसके बाद जब पैरों पर नज़र पड़ जाती है तो इस तरह बलन्द आवाज़ से रोता है जैसे फ़ितरत की सितमज़रीफ़ी की फ़रयाद कर रहा हो और अपने वाक़ेई दर्दे दिल की “ाहादत दे रहा हो इसलिये के इसके पैर दोग़ले मुर्ग़ों के पैरों की तरह दुबले पतले और बारीक होते हैं। और इसकी पिण्डली के किनारे पर एक हल्का सा कांटा होता है और इसकी गरदन पर बालों के बदले सब्ज़ रंग के मुनक़्क़ष परों का एक गुच्छा होता है। इसकी गरदन का फैलाव सुराही की गरदन की तरह होता है और इसके गर्दने की जगह से लेकर पेट तक का हिस्सा यमनी वस्मा जैसा सब्ज़ रंग या उस रेषम जैसा होता है जिसे सैक़ल किये हुए आईने पर पहना दिया गया हो। ऐसा मालूम होता है के वह स्याह रंग की ओढ़नी में लिपटा हुआ है लेकिन वह अपनी आब व ताब की कसरत और चमक-दमक की षिद्दत से इस तरह महसूस होती है जैसे इसमें तरो ताज़ा सब्ज़ी अलग से “ाामिल कर दी गई हो।
इसके कानों के षिगाफ़ मुत्तसिल बाबूना के फूलों जैसी नोके क़लम के मानिन्द एक बारीक लकीर होती है और वह अपनी सफ़ेदी के साथ उस जगह की स्याही के दरम्यान चमकती रहती है। “ाायद ही कोई रंग ऐसा हो जिसका कोई हिस्सा इस जानवर को न मिला हो मगर इस लकीर की सैक़ल और इसके रेषमीं पैकर की चमक दमक सब पर ग़ालिब रहती है। इसकी मिसाल उन बिखरी हुई कलियों के मानिन्द होती है जिन्हें न बहार की बारिषों ने पाला हो और न गर्मी के सूरज की “ाुआओं ने, व कभी-कभी अपने बाल व पर से जुदा भी हो जाता है और इस रंगीन लिबास को उतार कर बरहना हो जाता है। इसके बाल व पर झड़ जाते हैं और दोबारा (2) फिर उग आते हैं।

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(1)कहा जाता है के सिर्फ़ फ़िलपीन में दस हज़ार क़िस्म के फूल पाए जाते हैं तो बाक़ी कायनात का क्या ज़िक्र है।
(2) बाज़ अफ़राद का ख़याल है के मोर के बदन में तक़रीबन हज़ार से चार हज़ार तक पर होते हैं और वह उन्हीं परों को देख कर अकड़ता रहता है और सहरा में रक़्स करता रहता है। यह और बात है के अपने कमाल का मुज़ाहिरा वहां करता है जहां कोई क़द्रदान नहीं होता है और न इससे इस्तेफ़ादा करने वाला होता है। सिर्फ़ अपनी ज़ात की तस्कीन और अपनी अना की तसल्ली का सामान फ़राहम करता है और यही फ़र्क़ है इन्सान और हैवान में के इन्सानी कमालात अना की तस्कीन और तसल्ली के लिये नहीं हैं इनका मसरफ़ ख़ल्क़े ख़ुदा को फ़ायदा पहुंचाना और समाज को फ़ैज़याब करना है। लेहाज़ा इन्सान अपने कमालात से मुआसेरा को मुसतफ़ैज़ करता है तो इन्सान है वरना एक मोर है जो सहरा में नाचता रहता है और अपने नफ़्स को ख़ुष करता रहता है। यह और बात है के यह ख़ुषी भी दाएमी नहीं होती है और उसे भी चन्द लम्हों में पैरों की हिक़ारत ख़त्म कर देती है और एक नया सबक़ सिखा देती है के उमूमी अफ़ादियत तो काम भी आ सकती है और उसे दवाम भी मिल सकता है लेकिन ज़ाती तस्कीन की न कोई हक़ीक़त है और न उसे दवाम नसीब हो सकता है।-)))


यह बालो-पर इस तरह गिरते हैं जैसे दरख़्त की “ााख़ों से पत्ते गिरते हैं और फिर दोबारा यूँ उग आते हैं के बिल्कुल पहले जैसे हो जाते हैं। न पुराने रंगों से कोई मुख़्तलिफ़ रंग होता है और न किसी रंग की जगह तबदील होती है। बल्कि अगर तुम इसके रेषों में किसी एक रेषे पर भी ग़ौर करोगे तो तुम्हें कभी गुलाब की सुखऱ्ी नज़र आएगी ज़मरू की सब्ज़ी और फिर कभी सोेने की ज़र्दी, भला उस तख़लीक़ की तौसीफ़ तक फ़िक्रों की गहराइयां किस तरह पहुंच सकती हैं और इन दक़ाएक़ को अक़्ल की जोदत किस तरह पा सकती है या तौसीफ़ करने वाले इसके औसाफ़ को किस तरह मुरत्तब कर सकते हैं।
जबके इसके छोटे से एक जुज़ए ने औहाम को वहां तक रसाई से आजिज़ कर दिया है और ज़बानों को उसकी तौसीफ़ से दरमान्दा कर दिया है।
पाक व बेनियाज़ है वह मालिक जिसने अक़्लों को मुतहीर कर दिया है इस एक मख़लूक़ की तौसीफ़ से जिसे निगाहों के सामने वाज़ेह कर दिया है और निगाहों ने उसे महदूद और मुरत्तब व मुरक्कब व मुलव्वन “ाक्ल में देख लिया है और फिर ज़बानों को भी इसकी सिफ़त का ख़ुलासा बयान करने और इसकी तारीफ़ का हक़ अदा करने से आजिज़ कर दिया।
और पाक व पाकीज़ा है वह ज़ात जिसने च्यूंटी और मच्छर से लेकर इनसे बड़ी मछलियों और हाथियों तक के पैरों को मज़बूत व मुस्तहकम बनाया है और अपने लिये लाज़िम क़रार दे लिया है के कोई ज़ीरूह ढांचा हरकत करेगा मगर यह के उसकी असल वादागाह मौत होगी और उसका अन्जाम कार फ़ना होगा।
अब अगर तुम इन बयानात पर दिल की निगाहों से नज़र डालोगे तो तुम्हारा नफ़्स दुनिया की तमाम “ाहवतों, लज़्ज़तों और ज़ीनतों से बेज़ार हो जाएगा और तुम्हारी फ़िक्र उन दरख़्तों के पत्तों की खड़खड़ाहट में गुम हो जाएगी जिनकी जड़ें साहिले दरिया पर मुष्क के टीलों में डूबी हुई होती हैं और उन तरो ताज़ा मोतियों के गुच्छों के लटकने और सब्ज़ पत्तियों के ग़िलाफ़ों में मुख़्तलिफ़ क़िस्म के फलों के निकलने के नज़ारों में गुम हो जाएगी जिन्हें बग़ैर किसी ज़हमत के हासिल किया जा सकता है।


(((-क्या इबरतनाक है यह ज़िन्दगी के एक तरफ़ राहतें, लज़्ज़तें, आराइषें, ज़ेबाइषें हैं और दूसरी तरफ़ मौत का भयानक चेहरा! इन्सान एक नज़र इस आराइष व ज़ेबाइष की तरफ़ करता है और दूसरी नज़र उसके अन्जाम की तरफ़। बिल्कुल ऐसा महसूस होता है के एक तरफ़ मोर के पर हैं और दूसरी तरफ़ पैर, परों को देखकर ग़ुरूर पैदा होता है और पैरों को देखकर औक़ात का अन्दाज़ा हो जाता है।
इन्सान अपनी ज़िन्दगी के हक़ाएक़ पर नज़र करे तो उसे अन्दाज़ा होगा के इसकी पूरी हयात एक मोर की ज़िन्दगी है जहां एक तरफ़ राहत व आराम, आराइष व ज़ेबाइष का हंगामा है और दूसरी तरफ़ मौत का भयानक चेहरा।
ज़ाहिर है के जो इन्सान इस चेहरे को देख ले उसे कोई चीज़ हसीन और दिलकष महसूस न होगी और वह इस पुरफ़रेब दुनिया से जल्द अज़ जल्द निजात हासिल करने की कोषिष करेगा।-)))


और वहां वारिद होने वालों के गिर्द महलोल के आंगनों में साफ़ व “ाफ़ाफ़ “ाहद और पाक व पाकीज़ा “ाराब के दौर चल रहे होंगे। वहाँ वह क़ौम होगी जिसकी करामतों ने उसे खींचकर हमेषगी की मन्ज़िल तक पहुंचा दिया है और उन्हें सफर की मज़ीद ज़हमत से महफ़ूज़ कर दिया है। ऐ मेरी गुफ़्तगू सुनने वालों! अगर तुम लोग अपने दिलों को मषग़ूल कर लो इस मन्ज़िल तक पहुंचने के लिये जहां यह दिलकष नज़ारे पाए जाते हैं तो तुम्हारी जान इष्तियाक़ के मारे अज़ख़ुद निकल जाएगी और तुम मेरी इस मजलिस से उठकर क़ब्रों में रहने वालों की हमसायगी के लिये आमादा हो जाओगे ताके जल्द यह नेमतें हासिल हो जाएं।
अल्लाह हमें और तुम्हें दोनों को अपनी रहमत के तुफ़ैल इन लोगों में क़रार दे जो अपने दिल की गहराइयों से नेक किरदार बन्दों की मन्ज़िलों के लिये सई कर रहे हैं।


(((- (बाज़ अल्फ़ाज़ की वज़ाहत) क़ला कषती के बादबान को कहा जाता है और दारी मक़ाम दारैन की तरफ़ मन्सूब है जो साहिल बहर पर आबाद है और वहां से ख़ुषबू वग़ैरा वारिद की जाती है।
अन्जा यानी मोड़ दिया जिसका इस्तेमाल इस तरह होता है के अन्जतुन्नाक़ता यानी मैंने ऊंटनी के रूख़ को मोड़ दिया।
नौती मल्लाह को कहा जाता है, ज़फ़ती ज़फ़ूना यानी पलकों के किनारे, ज़फ़तान यानी दोनों किनारे)))