ख़ुत्बात
 
164- आपका इरषादे गिरामी
(जब लोगों ने आपके पास आकर उस्मान के मज़ालिम का ज़िक्र किया और उनकी फ़हमाइष और तम्बीह का तक़ाज़ा किया तो आपने उस्मान के पास जाकर फ़रमाया)


लोग मेरे पीछे मुन्तज़िरि हैं और उन्होंने मुझे अपने और तुम्हारे दरम्यान वास्ता क़रार दिया है और ख़ुदा की क़सम मैं नहीं जानता हूँ के मैं तुमसे क्या कहूं? मैं कोई ऐसी बात नहीं जानता हूं जिसका तुम्हें इल्म न हो और किसी ऐसी बात की निषानदेही नहीं कर सकता हूं जो तुम्हें मालूम न हो। तुम्हें तमाम वह बातें मालूम हैं जो मुझे मालूम हैं और मैंने किसी अम्र की तरफ़ सबक़त नहीं की है के उसकी इत्तेलाअ तुम्हें करूं और न कोई बात चुपके से सुन ली है के तुम्हें बाख़बर करूं। तुमने वह सब ख़ुद देखा है जो मैंने देखा है और वह सब कुछ ख़ुद भी सुना है जो मैंने सुना है और रसूले अकरम (स0) के पास वैसे ही रहे हो जैसे मैं रहा हूँ। इब्ने अबी क़हाफ़ा और इब्निल ख़त्ताब हक़ पर अमल करने के लिये तुमसे ज़्यादा ऊला नहीं थे के तुम उनकी निस्बत रसूलल्लाह से ज़्यादा क़रीबी रिष्ता रखते हो।
तुम्हें वह दामादी का “ारफ़ भी हासिल है जो उन्हें हासिल नहीं था लेहाज़ा ख़ुदारा अपने नफ़्स को बचाओ के तुम्हें अन्धेपन से बसारत या जेहालत से इल्म ........ दिया जा रहा है। रास्ते बिल्कुल वाज़ेअ हैं और निषानाते दीन क़ायम हैं। याद रखो ख़ुदा के नज़दीक बेहतरीन बन्दा वह इमामे आदिल है जो ख़ुद हिदायत याफ़्ता हो और दूसरों को हिदायत दे। जानी पहचानी सुन्नत को क़ायम करे और मजहोल बिदअत को मुर्दा बना दे। देखो ज़िया बख़्ष सुन्नतों के निषानात भी रौषन हैं और बिदअतों के निषानात भी वाज़ेह हैं और बदतरीन इन्सान ख़ुदा की निगाह में वह ज़ालिम पेषवा है जो ख़ुद भी गुमराह हो और लोगों को भी गुमराह करे।
पैग़म्बर से मिली हुई सुन्नतों को मुर्दा बना बना दे आर क़ाबिले तर्क बिदअतों को ज़िन्दा कर दे। मैंने रसूले अकरम (स0) को यह फ़रमाते हुए सुना है के रोज़े क़यामत ज़ालिम रहनुमा को इस आलम में लाया जाएगा के न कोई उसका मददगार होगा और न उज़्र ख़्वाही करने वाला और उसे जहन्नम में डाल दिया जाएगा और वह इस तरह चक्कर खाएगा जिस तरह चक्की। इसके बाद उसे क़ारे जहन्नम में जकड़ दिया जाएगा। मैं तुम्हें अल्लाह की क़सम देता हूं के ख़ुदारा तुम इस उम्मत के मक़तूल पेषवा न बनो इसलिये के दौरे क़दीम से कहा जा रहा है के इस उम्मत में एक पेषवा क़त्ल किया जाएगा जिसके बाद क़यामत तक क़त्ल व के़ताल का दरवाज़ा खुल जाएगा और सारे उमूर मुष्तबा हो जाएंगे और फ़ित्ने फैल जाएंगे और लोग हक़ व बातिल में इम्तियाज़ न कर सकेंगे और इसी में चक्कर खाते रहेंगे और तहो बाला होते रहेंगे। ख़ुदारा मरवान की सवारी न बन जाओ के वह जिधर चाहे खींच कर ले जाए के तुम्हारा सिन ज़्यादा हो चुका है और तुम्हारी उम्र ख़ात्मे के क़रीब आ चुकी है।
उस्मान ने इस सारी गुफ़्तगू को सुनकर कहा के आप उन लोगों से कह दे ंके ज़रा मोहलत दें ताके मैं उनकी हक़ तलफ़ियों का इलाज कर सकूं? आपने फ़रमाया के जहां तक मदीने के मामेलात का ताल्लुक़ है उनमें किसी मोहलत की कोई ज़रूरत नहीं है और जहां तक बाहर के मामलात का ताल्लुक़ है उनमें सिर्फ़ इतनी मोहलत दी जा सकती है के तुम्हारा हुक्म वहां पहुंच जाए।


(((-दर हक़ीक़त रहनुमा और ज़ालिम वह दो मुतज़ाद अलफ़ाज़ हैं जिन्हें किसी आलमे “ाराफ़त व करामत में जमा नहीं होना चाहिये, इन्सान को रहनुमाई का “ाौक़ है तो पहले अपने किरदार में अदालत व “ाराफ़त पैदा करे उसके बाद आगे चलने का इरादा करे। इसके बग़ैर रहनुमाई का “ाौक़ इन्सान को जहन्नम तक पहुंचा सकता है रहनुमा नहीं बना सकता है। जैसा के सरकारे दो आलम (स0) ने फ़रमाया है और इस अज़ाब की षिद्दत का राज़ यही है के रहनुमा की वजह से बेषुमार लोग मज़ीद गुमराह होते हैं और उसके ज़ुल्म से बेहिसाब लोगों को ज़ुल्म का जवाज़ फ़राहम हो जाता है और सारा मुआषेरा तबाह व बरबाद होकर रह जाता है।
उस्मान का दौर पहला दौर था जब साबिक़ की ज़ाहिरदारी भी ख़त्म हो गई थी और खुल्लम खुल्ला ज़ुल्म का बाज़ार गर्म हो गया था। इसलिये इतना “ादीद रद्दे अमल देखने में आया और न इसके बाद से तो आज तक सारा आलमे इन्सान उन्हीं ख़ानदान परवरियों का षिकार है और अवाम की सारी दौलत एक-एक ख़ानदान के अय्याष “ाहज़ादों पर सर्फ़ हो रही है और मदीने के मुसलमानों में भी ग़ैरत की हरकत नहीं पैदा हो रही है तो बाक़ी आलमे इस्लाम और दूसरे इलाक़ों का क्या तज़किरा है।-)))