ख़ुत्बात
 
161-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जिसमें रसूले अकरम (स0) के सिफ़ात, अहलेबैत (अ0) की फ़ज़ीलत और तक़वा व इत्तेबाअ रसूल (स0) की दावत का तज़किरा किया गया है)


परवरदिगार ने आपको रोषन नूर, वाज़ेह दलील, नुमायां रास्ता और हिदायत करने वाली किताब के साथ भेजा है। आपका ख़ानदान बेहतरीन ख़ानदान, और आपका “ाजरा बेहतरीन “ाजरा है, जिसकी “ााख़ें मोअतदिल हैं (सीधी हैं) और समरात दस्त-रस के अन्दर (झुके हुए) हैं। आपकी जाए विलादत मक्के मुकर्रमा है और मक़ामे हिजरत अर्ज़े तय्यबा। यहीं से आपका ज़िक्र बलन्द हुआ है और यहीं से आपकी आवाज़ फै़ली है। परवरदिगार ने आपको किफ़ायत करने वाली हुज्जत, षिफ़ा देने वाली नसीहत, गुज़िष्ता तमाम उमूर की तलाफ़ी करने वाली दावत के साथ भेजा है, आपके ज़रिये ग़ैर मारूफ़ “ारीअतों को ज़ाहिर किया है और महमिल बिदअतों का क़िला क़मा कर दिया है और वाज़ेह एहकाम को बयान कर दिया है लेहाज़ा अब जो भी इस्लाम के अलावा किसी रास्ते को इख़्तेयार करेगा उसकी “ाक़ावत साबित हो जाएगी और रसीमाने हयात बिखर जाएगी और मुंह के बल गिरना सख़्त हो जाएगा और अन्जामकार दाएमी हुज़्न व इल्म और “ादीदतरीन अज़ाब होगा।
मैं ख़ुदा पर इसी तरह भरोसा करता हूं जिस तरह उसकी तरफ़ तवज्जो करने वाले करते हैं और उससे उस रास्ते की हिदायत तलब करता हूँ जो उसकी जन्नत तक पहुंचाने वाला और उसकी मन्ज़िले मतलूब की तरफ़ ले जाने वाला है।
बन्दगाने ख़ुदा! मैं तुम्हें तक़वा इलाही और इसकी इताअत की वसीयत करता हूं के इसी में कुल निजात है और यही हमेषा के लिये मरकज़े निजात है। उसने तुम्हें डराया तो मुकम्मल तौर से डराया और (जन्नत की) रग़बत दिलाई तो मुकम्मल रग़बत का इन्तेज़ाम किया, तुम्हारे लिये दुनिया आर उसकी जुदाई, उसके फ़ना व ज़वाल और उससे इन्तेक़ाल सबकी तौसीफ़ कर दी है लेहाज़ा उसमें जो चीज़ अच्छी लगे उससे एराज़ करो (पहलू बचाए रखो) के साथ जाने वाली “ौ बहुत कम है (जान लो) यह (दुनिया का) घर ग़ज़बे इलाही से क़रीबतर और रिज़ाए इलाही से दूरतर है।


बन्दगाने ख़ुदा! हम-व-ग़म और इसके इष्ग़ाल से चष्मपोषी कर लो (इसकी फ़िक्रों और उसके धन्दों से आंखें बन्द कर लो) तुम्हें मालूम है के इससे बहरहाल जुदा होना है और इसके हालात बराबर बदलते रहते हैं इससे इस तरह एहतियात करो जिस तरह एक ख़ौफ़ज़दा और अपने नफ़्स का मुख़लिस और जाँफ़ेषानी के साथ कोषिष करने वाला एहतियात करता है और उससे इबरत हासिल करो उन मनाज़िर के ज़रिये जो तुमने ख़ुद देख लिये हैं के गुज़िष्ता नस्लें हलाक हो गईं, उनके जोड़ बन्द अलग-अलग हो गए, उनकी आंखें और उनके कान ख़त्म हो गए, उनकी “ाराफ़त और इज़्ज़त चली गई, उनकी मसर्रत और नेमत का ख़ात्मा हो गया। औलाद का क़ुर्ब फ़िक़दान में तब्दील हो गया और अज़वाज की सोहबत फ़िराक़ में बदल गई। अब न बाहमी सिफ़ाख़रत रह गई है और न नस्लों का सिलसिला, न मुलाक़ातें रह गई हैं और न बात-चीत। (उनका “ारफ़ व वक़ार मिट गया, उनकी मसर्रतें और नेमतें जाती रहीं और बाल बच्चों के क़रीब के बजाए अलाहेदगी और बीवियों से हमनषीनी के बजाए उनसे जुदाई हो गई। अब न वह फ़ख़्र करते हैं और न उनके औलाद होती है, न एक दूसरे से मिलते मिलाते हैं और न आपस में एक दूसरे के हमसाया बन कर रहते हैं।)
लेहाज़ा बन्दगाने ख़ुदा! डरो उस “ाख़्स की तरह जो अपने नफ़्स पर क़ाबू रखता हो, अपनी ख़्वाहिषात को रोक सकता हो और अपनी अक़्ल की आंखों से देखता हो, मसएल बिलकुल वाज़ेह है, निषानियां क़ायम हैं, रास्ता सीधा है और सिरात बिल्कुल मुस्तक़ीम है।