ख़ुत्बात
 
160- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा


(अज़मते परवरदिगार) उसका अम्र फ़ैसलाकुन और सरापा हिकमत है और उसकी रिज़ा मुकम्मल अमान और रहमत है, वह अपने इल्म से फ़ैसला करता है और अपने हिल्म की बिना पर माफ़ कर देता है।
(हम्दे ख़ुदा) परवरदिगार तेरे लिये इन तमाम चीज़ों पर हम्द है जिन्हें तू ले लेता है या अता कर देता है और जिन बलाओं से निजात देता है या जिन में मुब्तिला कर देता है, ऐसी हम्द जो तेरे लिये इन्तेहाई पसन्दीदा हो और महबूबतरीन हो और बेहतरीन हो। (तेरे नज़दीक हर सताइष से बढ़ चढ़ कर हो) ऐसी हम्द जो सारी कायनात को ममलूक कर दे (भर दे) और जो तूने चाहा है उसकी हद तक पहुंच जाए (जहां तक चाहे पहुंच जाए), ऐसी हम्द के जिसके आगे तेरी बारगाह तक पहुंचने से न कोई हिजाब है और न उसके लिये कोई बन्दिष? ऐसी हम्द के जिसकी गिनती न कहीं पर टूटे और न इसका सिलसिला ख़त्म हो, हम तेरी अज़मत व बुज़ुर्गी की हक़ीक़त को नहीं जानते मगर इतना के तू ज़िन्दा व कारसाज़ (आलम) है न तुझे ग़ुनूदगी होती है और न नींद आती है, न तारे नज़र तुझ तक पहुंच सकता है और न निगाहें तुझे देख सकती हैं तूने नज़रों को पा लिया है और उम्रों का अहाता कर लिया है और पेषानी के बालों को पैरों (से मिलाकर) गिरफ़्त में ले लिया है, यह तेरी मख़लूक़ क्या है जो हम देखते हैं और इसमें तेरी क़ुदरत (की कारफ़रमाइयों) पर इसकी तौसीफ़ करते हैं हालांके दर हक़ीक़त वह (मख़लूक़ात) जो हमारी आंखों से ओझल है और जिस तक पहुंचने से हमारी नज़रें आजिज़ और अक़्लें दरमान्दा हैं और हमारे और जिन के दरम्यान ग़ैब के परदे हाएल हैं इससे कहीं ज़्यादा बा अज़मत है जो “ाख़्स (वसवसों से) अपने दिल को ख़ाली करके और ग़ौर व फ़िक्र (की क़ूवतों) से काम लेकर यह जानना चाहे के तूने क्योंकर अर्ष को क़ायम किया है और किस तरह मख़लूक़ात को पैदा किया है और क्योंकर आसमानों को फ़िज़ा में लटकाया है और किस तरह पानी के थपेड़ों पर ज़मीन को बिछाया है। तो उसकी आंखें थक कर और अक़्ल मग़लूब होकर और कान हैरान व सरासीमा और फ़िक्र गुमगष्ता राह होकर पलट आएगी।
इसी ख़ुत्बे का एक जुज़ यह है वह अपने ख़याल में इसका दावेदार बनता है के उसका दामने उम्मीद अल्लाह से वाबस्ता है, ख़ुदाए बरतर की क़सम वह झूठा है (अगर ऐसा ही है) तो फिर क्यों उसके आमाल में इस उम्मीद की झलक नुमायां नहीं होती जबके हर उम्मीदवार के कामों में उम्मीद की पहचान हो जाया करती है। सिवाये उस उमीद के जो अल्लाह से लगाई जाए के उसमें खोट पाया जाता है और हर ख़ौफ़ व हेरास जो (दूसरों से हो) एक मुसल्लमए हक़ीक़त रखता है, मगर अल्लाह का ख़ौफ़ ग़ैर यक़ीनी है और अल्लाह से बड़ी चीज़ों का और बन्दों से छोटी चीज़ों का उम्मीदवार होता है फिर भी जो आजिज़ी का रवैया बन्दों से रखता है वह रवय्या अल्लाह से नहीं बरतता तो आखि़र क्या बात है के अल्लाह के हक़ में इतना भी नहीं किया जाता जितना बन्दों के लिये किया जाता है क्या तुम्हें कभी इसका अन्देषा हुआ है के कहीं तुम इन उम्मीदों (के दावों ) में झूटे तो नहीं? या यह के तुम महले उम्मीद ही नहीं समझते। यूंही इन्सान अगर उसके बन्दों में से किसी बन्दे से डरता है तो जो ख़ौफ़ की सूरत इसके लिये इख़्तेयार करता है अल्लाह के लिये वैसी सूरत इख़्तेयार नहीं करता, इन्सानों का ख़ौफ़ तो उसने नक़द की सूरत में रखा है और अल्लाह का डर सिर्फ़ टाल मटोल और (ग़लत सलत) वादे यूंही जिसकी नज़रों में दुनिया अज़मत पा लेती है और उसके दिल में इसकी अज़मत व वुसअत बढ़ जाती है तो वह उसे अल्लाह पर तरजीह देता है और उसकी तरफ़ मुड़ता है और उसी का बन्दा होकर रह जाता है। तुम्हारे लिये रसूलल्लाह (स0) का क़ौल व अमल पैरवी के लिये काफ़ी है और उनकी ज़ात दुनिया के ऐब व नुक़्स और उसकी रूसवाइयों और बुराइयों की कसरत दिखाने के लिये रहनुमा है। इसलिये के इस दुनिया के दामनों को उससे समेट लिया गया और दूसरों के लिये उसकी वुसअतें मुहय्या कर दी गईं और इस (ज़ाले दुनिया की छातियों से) आपका दूध छुड़ा दिया गया अगर दूसरा नमूना चाहो तो मूसा कलीमुल्लाह हैं के जिन्होंने अपने अल्लाह से कहा के परवरदिगार! तू जो कुछ भी इस वक़्त थोड़ी बहुत नेमत भेज देेगा मैं उसका मोहताज हूं। ख़ुदा की क़सम उन्होंने सिर्फ़ खाने के लिये रोटी का सवाल किया था, चूंके वह ज़मीन का साग पात खाते थे और लाग़री और (जिस्म पर) गोष्त की कमी की वजह से उनके पेट की नाज़ुक जिल्द से घास पात की सब्ज़ी दिखाई देती थी, अगर चाहो तो तीसरी मिसाल दाऊद (अ0) की सामने रख लो, जो साहबे ज़बूर और अहले जन्नत के क़ारी हैं, वह अपने हाथ से खजूर की पत्तियों की टोकरियां बनाया करते थे और अपने साथियों से फ़रमाते थे के तुममें से कौन है जो इन्हें बेच कर मेरी दस्तगीरी करे (फिर) जो उसकी क़ीमत मिलती उससे जौ की रोटी खा लेते थे, अगर चाहो तो ईसा इब्ने मरयम (अ0) का हाल कहो के जो (सर के नीचे) पत्थर का तकिया रखते थे सख़्त और खुरदुरा लिबास पहनते थे और (खाने) में सालन के बजाय भूक और रात के चिराग़ की जगह चान्द और सर्दियों में साये के बजाये (उनके सर पर) ज़मीन के मषरिक़ व मग़रिब का साएबान होता था और ज़मीन जो घास फूस चैपायों के लिये उगाती थी वह उनके लिये फल फूल की जगह थी न उनकी बीवी थीं जो उन्हें दुनिया (के झंझटों) में मुब्तिला करतीं और न बाल बच्चे थे के उनके लिये फ़िक्र व अन्दोह का सबब बनते और न माल व मताअ था के उनकी तवज्जो को मोड़ता और न कोई तमअ थी के उन्हें रूसवा करती। उनकी सवारी उनके दोनों पांव और ख़ादिम उनके दोनों हाथ थे। तुम अपने पाक व पाकीज़ा नबी (स0) की पैरवी करो चूंके उनकी ज़ात इत्तेबाअ करने वाले के लिये नमूना औश्र सब्र करने वाले के लिये ढारस है। उनकी पैरवी करने वाला और उनके नक़्षे क़दम पर चलने वाला ही अल्लाह को सबसे ज़्यादा महबूब है जिन्होंने दुनिया को (सिर्फ़ ज़रूरत भर) चखा और उसे नज़र भर कर नहीं देखा वह दुनिया में सबसे ज़्यादा षिकम तही में बसर करने वाले और ख़ाली पेट रहने वाले थे। उनके सामने दुनिया की पेषकष की गई तो उन्होंने उसे क़ुबूल करने से इन्कार कर दिया और (जब) जान लिया के अल्लाह ने एक चीज़ को बुरा जाना है तो आप (अ0) ने भी उसे बुरा ही जाना और अल्लाह ने एक चीज़ को हक़ीर समझा है तो आपने भी उसे हक़ीर ही समझा और अल्लाह ने एक चीज़ को पस्त क़रार दिया है तो आप ने भी उसे पस्त ही क़रार दिया। अगर हम में सिर्फ़ यही एक चीज़ हो के हम उस “ौ को चाहने लगें जिसे अल्लाह और रसूल (स0) बुरा समझते हैं तो अल्लाह की नाफ़रमानी और उसके हुक्म से सरताबी के लिये यही बहुत है। रसूलल्लाह (स0) ज़मीन पर बैठकर खाना खाते थे और ग़ुलामों की तरह बैठते थे, अपने हाथ से जूती टांकते थे और अपने हाथों से कपड़ों में पेवन्द लगाते थे और बेपालान के गधे पर सवार होते थे और अपने पीछे किसी को बिठा भी लेते थे, घर के दरवाज़े पर (एक दफ़ा) ऐसा पर्दा पड़ा था जिसमें तसवीरें थें तो आपने अपनी अज़वाज में से एक को मुख़ातब करके फ़रमाया इसे मेरी नज़रों से हटा दो, जब मेरी नज़रें इस पर होती हैं तो मुझे दुनिया और इसकी आराइषें याद आ जाती हैं। आपने दुनिया से दिल हटा लिया था और उसकी याद तक अपने नफ़्स से मिटा डाली थी और यह चाहते थे के उसकी सज धज निगाहों से पोषीदा रहे ताके न उससे उम्दा उम्दा लिबास हासिल करें और न उसे अपनी मन्ज़िल ख़याल करें और न उसमें ज़्यादा क़याम की आस लगाएं। उन्होंने इसका ख़याल नफ़्स से निकाल दिया और दिल से उसे हटा दिया था और निगाहों से उसे ओझल रखा था, यूंही जो “ाख़्स किसी “ौ को बुरा समझता है तो न उसे देखना चाहता है और न उसका ज़िक्र सुनना गवारा करता है। रसूलल्लाह (स0) (के आदात व ख़साएल) में ऐसी चीज़ें हैं के वह तुम्हें दुनियां के उयूब व क़बाएह का पता देंगी जबके आप (स0) इस दुनिया में अपने ख़ास अफ़राद समेत भूके रहा करते थे और बावजूद इन्तेहाई क़र्ब मन्ज़िलत के इसकी आराइषें इनसे दूर रखी गईं। चाहे के देखने वाला अक़्ल की रौषनी में देखे के अल्लाह ने उन्हें दुनिया न देकर उनकी इज़्ज़त बढ़ाई है या अहानत की है अगर कोई यह कहे के अहानत की है तो उसने झूठ कहा है और बहुत बड़ा बोहतान बान्धा और अगर यह कहे के इज़्ज़त बढ़ाई है तो उसे यह जान लेना चाहिये के अल्लाह ने दूसरों की बे इज़्ज़ती ज़ाहिर की जबके उन्हें दुनिया की ज़्यादा से ज़्यादा वुसअत दे दी और उसका रूख़ अपने मुक़र्रबतरीन बन्दे से मोड़ रखा। पैरवी करने वाले को चाहिये के इनकी पैरवी करे और उनके निषाने क़दम पर चले और उन्हीं की मन्ज़िल में आए वरना हलाकत से महफ़ूज़ नहीं रह सकता। क्यूंकि अल्लाह ने इनको (क़ुर्ब) क़यामत की निषानी और जन्नत की ख़ुषख़बरी सुनाने वाला और अज़ाब से डराने वाला क़रार दिया है। दुनिया से आप (स0) भूके निकल खड़े हुए और आखि़रत में सलामतियों के साथ पहुंच गए। आप (स0) ने तामीर के लिये कभी पत्थर पर पत्थर नहीं रखा, यहाँ तक के आखि़रत की राह पर चल दिये और अल्लाह की तरफ़ बुलावा देने वाले की आवाज़ पर लब्बैक कही। यह अल्लाह का हम पर कितना बड़ा एहसान है के उसने हमें एक पेषरौ व पेषवा जैसी नेमत बख़्षी के जिनकी हम पैरवी करते हैं और क़दम ब क़दम चलते हैंं (इन्हीं की पैरवी में) ख़ुदा की क़सम मैंने अपनी इस क़मीज़ में इतने पैवन्द लगाए हैं के मुझे पैवन्द लगाने वाले से “ार्म आने लगी है, मुझसे एक कहने वाले ने कहा के क्या आप इसे उतारेंगे नहीं? तो मैंंने उसे कहा के मेरी (नज़रों से) दूर हो के सुबह के वक़्त ही लोगों को रात के चलने की क़द्र होती है और वह उसकी मदहा करते हैं।


(((-जब इन्सान उन्हीं मख़लूक़ात के इदराक से आजिज़ हों के सामने आ रही हैं जो इदराक व एहसास के हुदूद के अन्दर हैं तो उन मख़लूक़ात के बारे में क्या कहा जा सकता है जो इन्सानी हवास की ज़द से बाहर हैं और जिन तक अक़्ल की रसाई नहीं है और जब मख़लूक़ात की हक़ीक़त तक इन्सानी फ़िक्र की रसाई नहीं है तो ख़ालिक़ की हक़ीक़त का इरफ़ान किस तरह मुमकिन है और इन्सान इसकी हम्द का हक़ किस तरह अदा कर सकता है। इन्सान की निजात व आख़ेरत के दो बुनियादी रूकन हैं एक ख़ौफ़ और एक उम्मीद, इस्लाम ने क़दम-क़दम पर इन्हीं दो चीज़ों की तरफ़ तवज्जो दिलाई है और इन्हें ईमान और अमल का ख़ुलासा क़रार दिया है। सूरा मुबारकए हम्द जिस में सारा क़ुरान सिमटा हुआ है। इसमें भी रहमान व रहीम उम्मीद का इषारा और मालिके यौमिद्दीन ख़ौफ़ का, लेकिन अफ़सोसनाक बात यह है के इन्सान न वाक़ेअन ख़ुदा से उम्मीद रखता है और न उससे ख़ौफ़ज़दा होता है। उम्मीदवार होता तो दुआओं और इबादतों में दिल लगता के इनमें तलब ही तलब पाई जाती है और ख़ौफ़ज़दा होता तो गुनाहों से परहेज़ करता के गुनाह ही इन्सान को अज़ाबे अलीम से दो-चार कर देते हैं।
दुनिया की हर उम्मीद और इसके हर ख़ौफ़ का किरदार से नुमायां हो जाना और आख़ेरत की उम्मीद वहम का वाज़ेअ न होना इस बात की अलामत है के दुनिया इसके किरदार में एक हक़ीक़त है और आख़ेरत सिर्फ़ अलफ़ाज़ का मजमूआ और तलफ़्फ़ुज़ की बाज़ीगरी है और इसके अलावा कुछ नहीं है। वाज़ेअ रहे के पर्दे वाले वाक़ेए का ताल्लुक़ अज़वाज की ज़िन्दगी और उनके घरों से है। इसका अहलेबैत (अ0) के घर से कोई ताल्लुक़ नहीं है जिसे बाज़ रावियों ने अहलेबैत (अ0)की तरफ़ मोड़ दिया है ताके उनकी ज़िन्दगी में भी ऐष व इषरत का इसबात कर सकें। जबके अहलेबैत (अ0) की ज़िन्दगी तारीख़े इस्लाम में मुकम्मल तौर पर आईना है और हर “ाख़्स जानता है के इन हज़रात ने तमामतर इख़्तेयारात के बावजूद अपनी ज़िन्दगी इन्तेहाई सादगी से गुज़ारी है और सारा माले दुनिया राहे ख़ुदा में ख़र्च कर दिया है- पैग़म्बरों की ज़िन्दगी की मिसाल का मतलब यह नहीं है के मुसलमान को आवारावतन और ख़ानाबदोष होना चाहिये और ख़ेमों और छोलदारियों में ज़िन्दगी गुज़ार देना चाहिये, इसका मक़सद सिर्फ़ यह है के मुसलमान को दुनिया की अहमियत व अज़मत का क़ायल नहीं होना चाहिये और उसे सिर्फ़ बतौर ज़रूरत और बक़द्र ज़रूरत इस्तेमाल करना चाहिये वह मुकम्मल तौर से क़ब्ज़े में आ जाए तो इन्सान को बाइज्ज़त नहीं बना सकती है और सौ फ़ीसदी हाथों से निकल जाए तो ज़लील नहीं कर सकती है, इज़्ज़त व ज़िल्लत का मेयार माल व दौलत और जाह व मन्सब नहीं है, इसका मेयार सिर्फ़ इबादते इलाही और इताअते परवरदिगार है जिसके बाद मुल्क दुनिया की कोई हैसियत नहीं रह जाती है।)))