ख़ुत्बात
 
158- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जिसमें रसूले ख़ुदा की बासत और क़ुरान की फ़ज़ीलत के साथ बनी उमय्या की हुकूमत का ज़िक्र किया गया है)


अल्लाह ने पैग़म्बर को उस वक़्त भेजा जब रसूलों का सिलसिला रूका हुआ था और क़ौमें गहरी नींद में मुब्तिला थीं और दीन की मुस्तहकम रस्सी के बल खुल चुके थे, आपने आकर पहले वालों की तस्दीक़ की और वह नूर पेष किया जिसकी इक़्तेदा की जाए और वह यही क़ुरान है। उसे बुलवाकर देखो और यह ख़ुद नहीं बोलेगा, मैं इसकी तरफ़ से तर्जुमानी करूंगा, याद रखो के इसमें मुस्तक़बिल का इल्म है और माज़ी की दास्तान है। तुम्हारे दर्द की दवा है और तुम्हारे उमूर की तन्ज़ीम का सामान है।
(इसका दूसरा हिस्सा) उस वक़्त कोई “ाहरी या देहाती मकान ऐसा न बचेगा जिसमें ज़ालिम ग़म व अलम को दाखि़ल न कर दें और उसमें सख़्ितयों का गुज़र न हो जाए। उस वक़्त इनके लिये न आसमान में कोई उज़्रख़्वाही करने वाला होगा और न ज़मीन में मददगार, तुमने इस अम्र के लिये नाअहलों का इन्तेख़ाब किया है और उन्हें दूसरे के घाट पर उतार दिया है और अनक़रीब ख़ुदा ज़ालिमों से इन्तेक़ाम लेगा। खाने के बदले में खाने से, पीने के बदले में पीने का यूं के इन्हें खाने के लिये ख़ेज़ाल का खाना और पीने के लिये एलवा का और ज़हर हलाहल का पीना, ख़ौफ़ का अन्दरूनी लिबास और तलवार का बाहर का लिबास होगा, यह ज़ालिम लोगों की सवारियां और गुनाहों के बारे बरादार ऊंट हैं, लेहाज़ा मैं बार-बार क़सम खाकर कहता हूं के बनी उमय्या मेरे बाद इस खि़लाफ़त को इस तरह थूक देंगे, (थूक देना पड़ेगा) जिस तरह बलग़म को थूक दिया जाता है और फिर जब तक “ाब व रोज बाक़ी हैं इसका मज़ा चखना और उससे लज़्ज़त हासिल करना नसीब न होगा।


(((- मालिके कायनात ने इन्सान की फ़ितरत के अन्दर एक सलाहियत रखी है जिसका काम है नेकियों पर सुकून व इत्मीनान का सामान फ़राहम करना और बुराइयों पर तम्बीह व सरज़न्ष करना, अर्फ़ आम में इसे ज़मीर से ताबीर किया जाता है जो उस वक़्त भी बेदार रहता है जब आदमी ग़फ़लत की नींद सो जाता है और उस वक़्त भी मसरूफ़े तम्बीह रहता है जब इन्सान मुकम्मल तौर पर गुनाहों में डूब जाता है। यह सलाहियत अपने मक़ाम पर हर इन्सान में वदीअत की गई है। फ़र्क़ सिर्फ़ यह है के अच्छाई और बुराई का इदराक भी कभी फ़ितरी होता है जैसे एहसान की अच्छाई और ज़ुल्म की बुराई, और कभी इसका ताल्लुक़ समाज, मुआषरा या दीन व मज़हब से होता है। तो जिस चीज़ को मज़हब या समाज अच्छा कह देता है ज़मीर उससे मुतमईन हो जाता है आर जिस चीज़ को बुरा क़रार दे देता है इस पर मज़म्मत करने लगता है और उस मदह या ज़म का ताअल्लुक़ फ़ितरत के एहकाम से नहीं होता है बल्कि समाज या क़ानून के एहकाम से होता है।-)))