ख़ुत्बात
 
156- आपका इरषादे गिरामी
(जिसमें अहले बसरा से खि़ताब करके उन्हें हवादिस से बाख़बर किया गया है)


ऐसे वक़्त में अगर कोई “ाख़्स अपने नफ़्स को सिर्फ़ ख़ुदा तक महदूद रखने की ताक़त रखता है तो उसे ऐसा ही करना चाहिये। फिर अगर तुम मेरी इताअत करोगे तो मैं तुम्हें इन्षाअल्लाह जन्नत के रास्ते पर चलाउंगा चाहे इसमें कितनी ही ज़हमत और तल्ख़ी क्यों न हो।
श्रह गई फ़लां ख़ातून की बात तो उन पर औरतों की जज़्बाती राय का असर हो गया है और इस कीने ने असर कर दिया है जो उनके सीने में लोहार के कढ़ाव की तरह खौल रहा है।


(((-इस लफ़्ज़ से मुरद मुसल्लम तौर पर हज़रत आइषा की ज़ात है लेकिन आपने उन्हें नाम के साथ क़ाबिले ज़िक्र नहीं क़रार दिया है और उनकी दो अज़ीम कमज़ारियों की तरफ़ मुतवज्जो किया है, एक यह है के इनमें आम औरतों की जज़्बाती कमज़ोरी पाई जाती है जो अक्सर एहकामे दीन और मर्ज़ीए परवरदिगार पर ग़ालिब आ जाती है जबके अज़वाजे रसूल (स0) को इस कमज़ोरी से बलन्दतर होना चाहिए, और दूसरी बात यह है के इनके दिल में कीना पाया जाता है के इनके बारे में रसूले अकरम (स0) के वह इरषादात नहीं हैं जो हज़रत अली (अ0) के बारे में हैं और उन्हें क़ुदरत ने क़ाबिले औलाद न बनाकर नस्ले अली (अ0) को नस्ले पैग़म्बर (स0) बना दिया है।-)))


उन्हें अगर मेरे अलावा किसी और के साथ इस बरताव की दावत दी जाती तो कभी न आतीं लेकिन उसके बाद भी मुझे उनकी साबेक़ा हुरमत का ख़याल है। इनका हिसाब बहरहाल परवरदिगार के ज़िम्मे है।
ईमान का रास्ता बिल्कुल वाज़ेअ और इसका चिराग़ मुकम्मल तौर पर नूर अफ़्षाँ है। ईमान ही के ज़रिये नेकियों का रास्ता हासिल किया जाता है और नेकियों ही के ज़रिये से ईमान की पहचान होती है। ईमान से इल्म की दुनिया आबाद होती है और इल्म से मौत का ख़ौफ़ हासिल होता है और मौत ही पर दुनिया का रास्ता है। (ईमान की राह सब राहों से वाज़ेअ और सब चिराग़ों से ज़्यादा नुरानी है ईमान से नेकियों पर इस्तेदलाल किया जाता है और नेकियों से ईमान पर दलील लाई जाती है, ईमान से इल्म की दुनिया आबाद होती है और इल्म की बदौलत मौत से डराया जाता है और दुनिया से आख़ेरत हासिल की जाती है।) और दुनिया ही के ज़रिये आख़ेरत हासिल की जाती है और आखि़रत ही में जन्नत को क़रीब कर दिया जाएगा और जहन्नम को गुमराहों के लिये बिल्कुल नुमायां किया जाएगा। मख़लूक़ात के लिये क़यामत से पहले कोई मन्ज़िल नहीं है। उन्हें इस मैदान में आखि़री मन्ज़िल की तरफ़ बहरहाल दौड़ लगाना है।
(क दूसरा हिस्सा) वह अपनी क़ब्रों से उठ खड़े हुए और अपनी आखि़री मन्ज़िल की तरफ़ चल पड़े। हर घर के अपने अहल होते हैं जो न घर को बदलते हैं और न उससे मुन्तक़िल हो सकते हैं।
यक़ीनन अम्रे बिल मारूफ़ और नहीं अनिल मुन्किर यह दो ख़ुदाई इख़्लाक़ हैं और यह न किसी की मौत को क़रीब बनाते हैं और न किसी की रोज़ी को कम करते हैं। तुम्हारा फ़र्ज़ है के किताबे ख़ुदा से वाबस्ता रहो के वही मज़बूत रसीमाने हिदायत और रौषन नूरे इलाही है। इसी में मनफ़अत बख़्ष षिफ़ा है और इसी में प्यास बुझाने वाली सेराबी है। वही तमस्सुक करने वालों के लिये वसीलए अज़मत किरदार है और वही राबेता रखने वालों के लिये ज़रियए निजात है। उसी में कोई कजी नहीं है जिसे सीधा किया जाए और उसी में इन्हेराफ़ नहीं है जिसे दुरूस्त किया जाए, मुसलसल तकरार उसे पुराना नहीं कर सकती है और बराबर सुनने से उसकी ताज़गी में फ़र्क़ नहीं आता है जो इसके ज़रिये कलाम करेगा वह सच्चा होगा और जो इसके मुताबिक़ अमल करेगा वह सबक़त ले जाएगा।
इस दरम्यान एक “ाख़्स खड़ा हो गया और उसने कहा या अमीरूलमोमेनीन (अ0) ज़रा फ़ित्ना के बारे में बतलाएं? क्या आपने इस सिलसिले में रसूले अकरम (स0) से दरयाफ़्त किया है? फ़रमाया जिस वक़्त आयत “ारीफ़ नाज़िल हुई ‘‘क्या लोगों का ख़याल यह है के उन्हें ईमान के दावा ही पर छोड़ दिया जाएगा और उन्हें फ़ित्नों में मुब्तिला नहीं किया जाएगा’’ तो हमें अन्दाज़ा हो गया के जब तक रसूले अकरम (स0) मौजूद हैं फ़ित्ना का कोई अन्देषा नहीं है लेहाज़ा मैंने अर्ज़ किया के या रसूलल्लाह यह फ़ित्ना क्या है जिसकी परवरदिगार ने आपको इत्तेलाअ दी है? फ़रमाया या अली (अ0)! यह उम्मत मेरे बाद फ़ित्ने में मुब्तिला होगी। मैंने अर्ज़ की क्या आपने ओहद के दिन जब कुछ मुसलमान राहे ख़ुदा में “ाहीद हो गए और मुझे “ाहादत का मौक़ा नसीब नहीं हुआ और मुझे यह सख़्त तकलीफ़ महसूस हुई, तो क्या यह नहीं फ़रमाया था के या अली (अ0)! ब्षारत हो, “ाहादत तुम्हारे पीछे आ रही है? फ़रमाया बेषक! यूं कहो उस वक्त तुम्हारा सब्र कैसा होगा? मैंने अर्ज़ की के या रसूलल्लाह यह तो सब्र का मौक़ा नहीं है बल्कि मसर्रत और “ाुक्र का मौक़ा है।


(((-इन फ़िक़रों को देखने के बाद कोई “ाख़्स ईमान व अमल के राबते को नज़र अन्दाज़ नहीं कर सकता है और न ईमान को अमल से बे नियाज़ बना सकता है। ईमान से लेकर आख़ेरत तक इतना हसीन तसलसुल किसी दूसरे इन्सान के कलाम में नज़र नहीं आ सकता है और यह मौलाए कायनात की एजाज़ेे बयानी का एक बेहतरीन नमूना है।
टम्र बिल मारूफ़ और नहीं अनिल मुन्किर के बारे में पैदा होने वाले “ौतानी वसवसों का जवाब इन कलेमात में मौजूद है और इन दोनों की अज़मत के लिये इतना ही काफ़ी है के न सिर्फ़ इन कामों में मालिक भी बन्दों के साथ “ारीफ़ है बल्के उसने पहले अम्र व नहीं किया है। इसके बाद बन्दों को अम्र व नहीं का हुक्म दिया है।
इस कुल्ले ईमान का किरदार जो ज़िन्दगी को हदफ़ और मक़सद नहीं बल्कि वसीलाए ख़ैरात तसव्वुर करता है और जब यह अन्दाज़ा हो जाता है के ज़िन्दगी की क़ुरबानी ही तमाम ख़ैरात, ज़कात का मक़सद है तो इस क़ुरबानी के नाम पर सजदए “ाुक्र करता है और लफ़्ज़े सब्र व तहम्मूल को बरदाष्त नहीं करता है।-)))


बन्दगाने ख़ुदा! उस दिन से डरो जब आमाल की जांच पड़ताल की जाएगी और ज़लज़लों की बोहतात होगी के बच्चे तक बूढ़े हो जाएंगे। याद रखो ऐ बन्दगाने ख़ुदा! के तुम पर तुम्हारे ही नफ़्स को निगराँ बनाया गया है और तुम्हारे आज़ा व जवारेह तुम्हारे लिये जासूसों का काम कर रहे हैं और कुछ बेहतरीन मुहाफ़िज़ हैं जो तुम्हारे आमाल और तुम्हारी सांसों की हिफ़ाज़त कर रहे हैं। उनसे न किसी तारीक रात की तारीकी छिपा सकती है और न बन्द दरवाज़े उनसे ओझल बना सकते हैं। और कल आने वाला दिन आज से बहुत क़रीब है।
आज का दिन अपना साज़ व सामान लेकर चला जाएगा और कल का दिन उसके पीछे आ रहा है, गोया हर “ाख़्स ज़मीन में अपनी तन्हाई की मन्ज़िल और गढ़े के निषान तक पहुंच चुका है। हाए वह तन्हाई का घर, वहषत की मन्ज़िल और ग़ुरबत का मकान, गोया के आवाज़ तुम तक पहुंच चुकी है और क़यामत तुम्हें अपने घेरे में ले चुकी है और तुम्हें आखि़री फ़ैसले के लिये क़ब्रों से निकाला जा चुका है। जहां तमाम बातिल बातें ख़त्म हो चुकी हैं और तमाम हीले बहाने कमज़ोर पड़ चुके, हक़ाएक़ साबित हो चुके हैं और उमूर पलट कर अपनी मन्ज़िल पर आ गए हैं। लेहाज़ा इबरतों से नसीहत हासिल करो। तग़य्युराते ज़माना से इबरत का सामान फ़राहम करो और फिर डराने वाले की नसीहत से फ़ायदा उठाओ।