ख़ुत्बात
 

155- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जिसमें चिमगादड़ की अजीब व ग़रीब खि़लक़त का ज़िक्र किया गया है)


सरी तारीफ़ उस अल्लाह के लिये है जिसकी मारेफ़त की गहराइयों से औसाफ़ आजिज़ हैं और जिसकी अज़मतों ने अक़्लों को आगे बढ़ने से रोक दिया है तो अब इसकी सल्तनतों की हदों तक पहुंचने का कोई रास्ता नहीं रह गया है।
वह ख़ुदाए बरहक़ व आषकार है, उससे ज़्यादा साबित और वाज़ेअ है जो आंखों के मुषाहिदे में आ जाता है, अक़्लें उसकी हदबन्दी नहीं कर सकती हैं के वह किसी की “ाबीह क़रार दे दिया जाए और ख़यालात उसका अन्दाज़ा नहीं लगा सकते हैं के वह किसी की मिसाल बना दिया जाए। उसने मख़लूक़ात को बग़ैर किसी नमूने और मिसाल के और किसी मुषीर के मष्विरे या मददगार की मदद के बनाया है। उसकी तख़लीक़ उसके अम्र से तकमील हुई है और फिर उसी की इताअत के लिये सर ब सुजूद है और बिला तौक़फ़ उसकी आवाज़ पर लब्बैक कहती है और बग़ैर किसी इख़्तेलाफ़ के सामने सरनिगूं होती है।
उसकी लतीफ़तरीन सनअत और अजीबतरीन खि़लक़त का एक नमूना वह है जो उसने अपनी दक़ीक़तरीन हिकमत से चमगादड़ की तख़लीक़ में पेष किया है के जिसे हर “ौ को वुसअत देने वाली रोषनी सुकेड़ देती है और हर ज़िन्दा को सुकेड़ देने वाली तारीकी वुसअत अता कर देती है। किस तरह उसकी आँखें चकाचैन्द हो जाती है के रौषन आफ़ताब की “ाुआओं से मदद हासिल करके अपने रास्ते तय कर सके और खुली हुई आफ़ताब की रोषनी के ज़रिये अपनी जानी मन्ज़िलों तक पहुंच सके (हालांके वह हर ज़िन्दा “ौ की आंखों पर नक़ाब डालने वाला है और क्यूंके चमकते हुए सूरज में इनकी आंखें चुन्धिया जाती हैं के वह उसकी नूरपाष “ाुआओं से मदद ले कर अपने रास्तों पर आ जा सकें और नूरे आफ़ताब के फैलाव में अपनी जानी पहचानी हुई चीज़ों तक पहुंच सकें)। नूरे आफ़ताब ने अपनी चमक दमक के ज़रिये उसे रौषनी के तबक़ात में आगे बढ़ने से रोक दिया है और रोषनी के उजाले में आने से रोक कर मख़फ़ी मक़ामात पर छिपा दिया है। दिन में इसकी पलकें आंखों पर लटक आती हैं और रात को चिराग़ बनाकर वह तलाषे रिज़्क़ में निकल पड़ती है। इसकी निगाहों को रात की तारीकी नहीं पलटा सकती है और इसको रास्ते में आगे बढ़ने से “ादीद ज़ुलमत भी नहीं रोक सकती है। इसके बाद जब आफ़ताब अपने नक़ाब को उलट देता है और दिन का रौषन चेहरा सामने आ जाता है और आफ़ताब की किरने बिज्जू के सूराख़ तक पहुंच जाती हैं तो इसकी पलकें आंखों पर लटक आती हैं और जो कुछ रात की तारीकियों में हासिल कर लिया है उसी पर गुज़ारा “ाुरू कर देती है। क्या कहना उस माबूद का जिसने इसके लिये रात को दिन और वसीलए मआष बना दिया है और दिन को वज्हे सुकून व क़रार मुक़र्रर कर दिया है और फिर उसके लिये ऐसे गोष्त के पर बना दिये हैं जिसके ज़रिये वक़्ते ज़रूरत परवाज़ भी कर सकती है। गोया के यह कान की लौएं हैं जिनमें न पर हैं और न करयां मगर इसके बावजूद तुम देखोगे के कानों की जगहों के निषानात बिल्कुल वाज़ेअ हैं और इसके ऐसे दो पर बन गए हैं जो न इतने बारीक हैं के फट जाएं और न इतने ग़लीज़ हैं के परवाज़ में ज़हमत हो। इसकी परवाज़ की “ाान यह है के अपने बच्चे को साथ लेकर सीने से लगाकर परवाज़ करती है, जब नीचे उतरती है तो बच्चा साथ होता है और जब ऊपर उड़ती है तो बच्चा हमराह होता है और उस वक़्त तक उससे अलग नहीं होता है जब क उसके आज़ाअ मज़बूत न हो जाएं और उसके पर उसका बोझ उठाने के क़ाबिल न हो जाएं और वह अपने रिज़्क़ के रास्तों और मसलहतों को ख़ुद पहचान न ले। पाक व बेनियाज़ है वह हर “ौ का पैदा करने वाला जिसने किसी ऐसी मिसाल का सहारा नहीं लिया जो किसी दूसरे से हासिल की गई हो।