ख़ुत्बात
 
151- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जिसमें फ़ित्नों से डराया गया है)


मैं ख़ुदा की हम्द व सना करता हूँ और उसकी मदद चाहता हूँ उन चीज़ों के लिये जो “ायातीन को हंका सकें, भगा सकें और उसके फन्दों और हथकण्डों से महफ़ूज़ रख सकें और मैं उस अम्र की गवाही देता हूं के उसके अलावा कोई ख़ुदा नहीं है और हज़रत मोहम्मद (स0) उसके बन्दे और रसूल, उसके मुन्तख़ब और मुस्तफ़ा हैं उनके फ़ज़्ल का कोई मुक़ाबला नहीं कर सकता है और उनके फ़िक़दान की कोई तलाफ़ी नहीं है। उनकी वजह से तमाम “ाहर ज़लालत की तारीकी, जेहालत के ग़लबे और बदसरषती और बद एख़लाक़ी की षिद्दत के बाद जब लोग हराम को हलाल बनाए हुए थे और साहबाने हिकमत को ज़लील समझ रहे थे, रसूलों से ख़ाली दौर में ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे और कुफ्ऱ की हालत में मर रहे थे, मुनव्वर और रौषन हो गए।


(फ़ित्नों से आगाही)


इसके बाद तुम ऐ गिरोहे अरब उन बलाओं के निषाने पर हो जो क़रीब आ चुकी हैं लेहाज़ा नेमतों की मदहोषियों से बचो और हलाक करने वाले अज़ाब से होषियार रहो। अन्धेरों के धुन्धलकों में क़दम जमाए रहो और फ़ित्नों की कजरवी से होषियार हो जिस वक़्त उनका पोषीदा ख़दषा सामने आ रहा हो और मख़फ़ी अन्देषा ज़ाहिर हो रहा हो और खूंटा मज़बूत हो रहा हो। यह फ़ित्ने इब्तेदा में मख़फ़ी रास्तों से “ाुरू होते हैं और आखि़र में वाज़ेअ मसाएब तक पहुंच जाते हैं। इनका आग़ाज़ बच्चों के आग़ाज़ जैसा होता है लेकिन इनके आसार नक़ष काले हजर जैसे होते है। दुनिया के ज़ालिम बाहमी अहद व पैमान के ज़रिये उनके वारिस बनते हैं। अव्वल आखि़र का क़ाएद होता है और आखि़र अव्वल का मुक़तदी। हक़ीर दुनिया के लिये एक दूसरे से मुक़ाबला करते हैं और बदबूदार मुर्दे पर आपस में जंग करते हैं।


(((-सही बुख़ारी के किताबुलफ़ित्न में इसी सूरते हाल की तरफ़ इषारा किया गया है के जब रसूले अकरम (स0) हौज़े कौसर पर बाज़ असहाब का हष्र देख कर उन्हें हंकाया जा रहा है। फ़रयाद करेंगे के ख़ुदाया मेरे असहाब हैं तो इरषाद होगा के तुम्हें नहीं मालूम के इन्होेंने तुम्हारे बाद क्या-क्या बिदअतें ईजाद की हैं और किस तरह दीने ख़ुदा से मुनहरिफ़ हो गए हैं।
इन्सानी बसीरत का सबसे बड़ा कारनामा यह है के इन्सान फ़ित्ने को पहले मरहले पर पहचान ले और वहीं उसका सदबाब कर दे वरना जब उसका रिवाज हो जाता है तो उसका रोकना नामुमकिन हो जाता है लेकिन मुष्किल यह है के इसका आग़ाज़ इतने मख़फ़ी और हसीन अन्दाज़ से होता है के उसका पहचानना हर एक के बस का काम नहीं है और इस तरह अवामुन्नास अपने मनहूस अक़ायद व नज़रियात या अवातिफ़ व जज़्बात की बिना पर फ़ितनों का षिकार हो जाते हैं और आखि़र में उनकी मुसीबत का इलाज नामुमकिन हो जाता है। ओलमा, आलाम और मुफ़क्केरीने इस्लाम की ज़रूरत इसीलिये होती है के वह फ़ित्नों को आग़ाजकार ही से पहचान सकते हैं और उनका सद्दबाब कर सकते हैं बषर्ते के अवामुन्नास उनके ऊपर एतमाद करें और उनकी बसीरत से फायदा उठाने के लिये तैयार हों।-)))


जबके अनक़रीब मुरीद अपने पीर और पीर अपने मुरीद से बराअत करेगा और बुग़्ज़ व अदावत के साथ एक दूसरे से अलग हो जाएंगे और वक़्ते मुलाक़ात एक-दूसरे पर लानत करेंगे, इसके बाद वह वक़्त आएगा जब ज़लज़लए अफ़गन फ़ित्ना सर उठाएगा जो कमर तोड़ होगा और “ादीद तौर पर हमलावर होगा। जिसके नतीजे में बहुत से दिल इस्तेक़ामत के बाद कजी का षिकार हो जाएंगे और बहुत से लोग सलामती के बाद बहक जाएंगे। इसके हुजूम के वक़्त ख़्वाहिषात में टकराव होगा और उसके ज़हूर के हंगाम अफ़्कार मुष्तबा हो जाएंगे। जो उधर सर उठाकर देखेगा उसकी कमर तोड़ देगे और जो उसमें दौड़ धूप करेगा उसे तबाह कर देंगे। लोग यूँ एक-दूसरे को काटने दौड़ेंगे जिस तरह भीड़ के अन्दर गधे। ख़ुदाई रस्सी के बल खुल जाएंगे और हक़ाएक़ के रास्ते मुष्तबा हो जाएंगे। हिकमत का चष्मा ख़ुष्क हो जाएगा और ज़ालिम बोलने लगेंगे। देहातियों को हथोड़ों से कूट दिया जाएगा और अपने सीने से दबाकर कुचल दिया जाएगा। अकेले अकेले अफ़राद उसके ग़ुबार में गुम हो जाएंगे और उसके रास्ते में सवार हलाक हो जाएंगे। यह फ़ित्ने क़ज़ाए इलाही की तल्ख़ी के साथ वारिद होंगे और दूध के बदले ताज़ा ख़ून निकालेंगे। दीन के मिनारे (ओलमा) हलाक हो जाएंगे और यक़ीन की गिरहें टूट जाएंगी, साहेबाने होष उनसे भागने लगेंगे और ख़बीसुन्नफ़्स अफ़राद इसके मदारे इलहाम हो जाएंगे। यह फ़ितने गरजने वाले चमकने वाले और सरापा तैयार होंगे। उनमें रिष्तेदारों से ताल्लुक़ात तोड़ लिये जाएंगे और इस्लाम से जुदाई इख़्तेयार कर ली जाएगी। उससे अलग रहने वाले भी मरीज़ होंगे और कूच कर जाने वाले भी गोया मुक़ीम ही होंगे।
अहले ईमान में बाज़ ऐसे मक़तूल होंगे जिनका ख़ुन बहा तक न लिया जा सकेगा और बाज़ ऐसे ख़ौफ़ज़दा होंगे के पनाह की तलाष में होंगे। उन्हें पुख़्ता क़िस्मों और ईमान की फ़रेबकारियों में मुब्तिला किया जाएगा लेहाज़ा ख़बरदार तुम फ़ित्नों का निषाना और बिदअतों का निषान मत बनना और इसी रास्ते को पकड़े रहना जिस पर ईमानी जमाअत क़ायम है और जिस पर इताअत के अरकान क़ायम किये गये हैं। ख़ुदा की बारगाह में मज़लूम बन कर जाओ, ख़बरदार ज़ालिम बनकर मत जाना। “ौतान के रास्तों और ज़ुल्म के मरकज़ों से महफ़ूज़ रहो और अपने षिकम में लुक़म-ए-हराम को दाखि़ल मत करो के तुम उसकी निगाह के सामने हो जिसने तुम पर मासियत को हराम किया है और तुम्हारे लिये इताअत के रास्तों को आसान कर दिया है।

(((- अमीरूल मोमेनीन (अ0) जिस क़िस्म के फ़ित्नों की तरफ़ इषारा किया है उनका सिलसिला अगरचे आपके बाद से ही “ाुरू हो गया था लेकिन अभी तक मौक़ूफ़ नहीं हुआ और न फ़िलहाल मौक़ूफ़ होने के इमकानात हैं। जिस तरफ़ देखो वही सूरते हाल नज़र आ रही है जिसकी तरफ़ आपने इषारा किया है और उन्हीं मज़ालिम की गरम बाज़ारी है जिनसे आपने होषियार किया है।
ज़्ारूरत है के साहेबाने ईमान हिदायत से फ़ायदा उठाएं, फ़ित्नों से महफ़ूज़ रहें, साहेबाने बसीरत से वाबस्ता रहें और कम से कम इतना ख़याल रखें के ख़ुदा की बारगाह में मज़लूम बन कर हाज़िर होने में कोई ज़िल्लत नहीं है बल्कि उसी में दाएमी इज्ज़त और अबदी “ाराफ़त है। ज़िल्लत ज़ुल्म में होती है मज़लूमियत में नहीं-)))