ख़ुत्बात
 
150- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जिसमें ज़माने के हवादिस की तरफ़ इषारा किया गया है और गुमराहों के एक गिरोह का तज़किरा किया गया है)


डन लोगों ने गुमराही के रास्तों पर चलने और हिदायत के रास्तों को छोड़ने के लिये दाहिने बायें रास्ते इख़्तेयार कर लिये हैं मगर तुम इस अम्र में जल्दी न करो जो बहरहाल होने वाला है और जिसका इन्तेज़ार किया जा रहा है और उसे दूर न समझो जो कल सामने आने वाला है के कितने ही जल्दी के तलबगार जब मक़सद को पा लेते हैं तो सोचते हैं के काष उसे हासिल न करते, आज का दिन कल के सवेरे से किस क़द्र क़रीब है।
लोगों! यह हर वादे के वुरूद और हर उस चीज़ के ज़हूर की क़ुरबत का वक़्त है जिसे तुम नहीं पहचानते हो लेहाज़ा जो “ाख़्स भी इन हालात तक बाक़ी रह जाए उसका फ़र्ज़ है के रौषन चिराग़ के सहारे क़दम आगे बढ़ाए और स्वालेहीन के नक़्षे क़दम पर चले ताके हर गिरह को खोल सके और हर ग़ुलामी से आज़ादी पैदा कर सके, हर मुज्तमा को बवक़्ते ज़रूरत मुन्तषिर कर सके और हर इन्तेषार को मुज्तमा कर सके और लोगों से यूँ मख़फ़ी रहे के क़या़फ़ाषिनास भी उसके नक़्षे क़दम को ताहद्दे नज़र न पा सकें। उसके बाद एक क़ौम पर इस तरह सैक़ल की जाएगी जिस तरह लोहार तलवार की धार पर सैक़ल करता है। इन लोगों की आंखों को क़ुरआन के ज़रिये रौषन किया जाएगा और उनके कानों में तफ़सीर को मुसलसल पहुंचाया जाएगा और उन्हें सुब्ह व “ााम हुकुमत के जामों से सेराब किया जाएगा।
इन गुमराहों को मोहलत दी गई ताके अपनी रूसवाई को मुकम्मल कर लें और हर तग़य्युर के हक़दार हो जाएं। यहाँ तक के जब ज़माना काफ़ी गुज़र चुका और एक क़ौम फ़ित्नों से मानूस हो चुकी और जंग की तख़हम पाषियों के लिये खड़ी हो गई, तो वह लोग भी सामने आ गए जो अल्लाह पर अपने सब्र का एहसान नहीं जताते और राहे ख़ुदा में जान देने को कोई कारनामा नहीं तसव्वुर करते, यहाँ तक के जब आने वाले हुक्म क़ज़ाने आज़्माइष की मुद्दत को तमाम कर दिया।


(((-अमीरूल (अ0) ने अपने बाद पैदा होने वाले फ़ित्नों की तरफ़ भी इषारा किया है और इस नुक्ते की तरफ़ भी मुतवज्जो किया है के ज़माना बहरहाल हुज्जते ख़ुदा से ख़ाली न रहेगा। और इस अन्धेरे में भी कोई न कोई सिराज मुनीर ज़रूर रहेगा लेहाज़ा तुम्हारा फ़र्ज़ है के इसका सहारा लेकर आगे बढ़ो और बेहतरीन नताएज हासिल कर लो।
इसका बेहतरीन दौर इमाम बाक़र (अ0) और इमाम सादिक़ (अ0) का दौर है जहाँ चार हज़ार असहाबे फ़िक्र व नज़र इमाम (अ0) के मदरसे में हाज़री दे रहे थे और आपके तालीमात से अपने दिल व दिमाग़ को रौषन कर रहे थे। कानों में क़ुरान सामित की आवाज़े थी और निगाहों में क़ुराने नातिक़ का जलवा-)))


तो इन्होंने अपनी बसीरत को अपनी तलवारों पर मुसल्लत कर दिया और अपने नसीहत करने वाले के हुक्म से परवरदिगार की बारगाह में झुक गए। मगर इसके बाद जब परवरदिगार ने पैग़म्बरे अकरम (स0) को अपने पास बुला लिया तो एक क़ौम उलटे पांव पलट गई और उसे मुख़तलिफ़ रास्तों ने तबाह कर दिया। उन्होंने महमिले अक़ायद का सहारा लिया और ग़ैर क़राबतदार से ताल्लुक़ात पैदा किये और इस सबब को नज़रअन्दाज़ कर दिया जिससे मवद्दत का हुक्म दिया गया था। इमारत को जड़ से उखाड़ कर दूसरी जगह पर क़ायम कर दिया जो हर ग़लती का मोअद्दन व मख़ज़न है और हर गुमराही का दरवाज़ा थे, हैरत में सरगर्दां और आले फ़िरऔन की तरह नषे में ग़ाफ़िल थे इनमें कोेई दुनिया की तरफ़ मुकम्मल कट कर आ गया था और कोई दीन से मुस्तक़िल तरीक़े पर अलग हो गया था।