ख़ुत्बात
 
149- आपका इरषादे गिरामी
(अपनी “ाहादत से क़ब्ल)


लेगों! देखो हर “ाख़्स जिस वक़्त से फ़रार कर रहा है उससे बहरहाल मुलाक़ात करने वाला है और मौत ही हर नफ़्स की आखि़री मन्ज़िल है और उससे भागना ही उसे पा लेना है। ज़माना गुज़र गया जबसे मैं इस राज़ की जुस्तजू में हूँ लेकिन परवरदिगार मौत के इसरार को परदए राज़ ही में रखना चाहता है। यह एक इल्म है जो ख़ज़ानए क़ुदरत में महफ़ूज़ है। अलबत्ता मेरी वसीअत यह है के किसी को अल्लाह का “ारीक न क़रार देना और पैग़म्बरे अकरम (स0) को ज़ाया न कर देना के यही दोनों दीन के सुतून हैं उन्हीं को क़ायम करो और उन्हीं दोनों चिराग़ों को रोषन रखो। इसके बाद अगर तुम मुन्तषिर नहीं होगे तो तुम पर कोई ज़िम्मेदारी नहीं है। हर “ाख़्स अपनी ताक़त भर बोझ का ज़िम्मेदार बनाया गया है और जाहिलों का बोझ हल्का रखा गया है के परवरदिगार रहीम व करीम है और दीन मुस्तहकम है और राहनुमा भी अलीम व दाना है। मैं कल तुम्हारे साथ था और आज तुम्हारे लिये मन्ज़िले इबरत मैं हूँ और कल तुमसे जुदा हो जाऊंगा, अल्लाह तुम्हें और मुझे दोनों को माफ़ कर दे।
देखो! इस मन्ज़िले लग़्िज़ष में अगर साबित रह गए तो क्या कहना। वरना अगर क़दम फिसल गए तो याद रखना के हम भी उन्हीं “ााख़ों की छावें, उन्हीं हवाओं की गुज़रगाह और उन्हीं बादलों के साये में थे लेकिन इन बादलों के टुकड़े फ़िज़ा में मुन्तषिर हो गए और इन हवाओं के निषानात ज़मीन से महो हो गए।


(((- इसमें कोई “ाक नहीं है के मुसलमानों ने खि़लाफ़त का झगड़ा दफ़ने पैग़म्बर (स0) से पहले ही “ाुरू कर दिया था और फिर उसे मुसलसल जारी रखा और मुख़्तलिफ़ अन्दाज़ से जोड़-तोड़ के ज़रिये खि़लाफ़तों का फ़ैसला होता रहा लेकिन किसी दौर में भी खि़लाफ़त के फ़ैसले के लिये तलवार और जंग का सहारा नहीं लिया गया। यह बिदअत सिर्फ़ हज़रत उम्मुलमोमेनीन की ईजाद है के उन्होंने तल्हा व ज़ुबैर की खि़लाफ़त के लिये तलवार का भी सहारा ले लिया और फिर माविया के लिये ज़मीन हमवार कर दी और उसके नतीजे में खि़लाफ़त का फ़ैसला जंग व जेदाल से “ाुरू हो गया और इस राह में बेषुमार जानें ज़ाया होती रहीं।
अफ़सोस के जंगे हमल और सिफ़फ़ीन में तौ “ाुबे की भी कोई गुन्जाइष नहीं थी, हज़रत आइषा, तल्हा, ज़ुबैर, माविया, अम्र व आस कोेई ऐसा नहीं था जो हज़रत अली (अ0) की “ाख़्िसयत और उनके बारे में इरषादाते पैग़म्बर (स0) से बाख़बर न हो। इसके बाद “ाुबह या ख़ताए इज्तेहादी का नाम देकर अवामुन्नास को तो धोका दिया जा सकता है, दावरे महषर को धोका नहीं दिया जा सकता है।-)))


मैं कल तुम्हारे हमसाये में रहा, मेरा बदन एक अरसे तक तुम्हारे दरम्यान रहा और अनक़रीब तुम उसे जसे बिला रूह की “ाक्ल में देखोगे जो हरकत के बाद साकिन हो जाएगा और तकल्लुम के बाद साकित हो जाएगा। अब तो तुम्हें इस ख़ामोषी, इस सुकूत और इस सुकून से नसीहत हासिल करनी चाहिए के यह साहेबाने इबरत के लिये बेहतरीन मुक़र्रर और क़ाबिले समाअत बयानात से ज़्यादा बेहतर नसीहत करने वाले हैं। मेरी तुमसे जुदाई इस “ाख़्स की जुदाई है जो मुलाक़ात के इन्तेज़ार में है। कल तुम मेरे ज़माने को पहचानोगे और तुम पर मेरे इसरार मुन्कषिफ होंगे और तुम मेरी सही मारेफ़त हासिल करोगे जब मेरी जगह ख़ाली हो जाएगी और दूसरे लोग इस मन्ज़िल पर क़ाबिज़ हो जाएंगे।