ख़ुत्बात
 
148-आपका इरषादे गिरामी
(अहले बसरा (तल्हा व ज़ुबैर) के बारे में)


यह दोनों अम्रे खि़लाफ़त के अपनी ही ज़ात के लिये उम्मीदवार हैं और उसे अपनी ही तरफ़ मोड़ना चाहते हैं। इनका अल्लाह के किसी वसीले से राबेता और किसी ज़रिये से ताअल्लुक़ नहीं है। हर एक दूसरे के हक़ में कीना रखता है और अनक़रीब इसका परदा उठ जाएगा। ख़ुदा की क़सम अगर उन्होंने अपने मुद्दआ को हासिल कर लिया तो एक दूसरे की जान लेकर छोड़ेंगे और इसकी ज़िन्दगी का ख़ात्मा कर देंगे। देखो बाग़ी गिरोह उठ खड़ा हुआ है। तो राहे ख़ुदा में काम करने वाले कहाँ चले गए जबके उनके लिये रास्ते मुक़र्रर कर दिये गए हैं और उन्हें इसकी इत्तेलाअ दी जा चुकी है? मैं जानता हूँ के हर गुमराही का एक सबब होता है और हर अहद षिकन एक “ाुबह ढूंढ लेता है लेकिन मैं उस “ाख़्स के मानिन्द नहीं हो सकता हूँ जो मातम की आवाज़ सुनता है। मौत की सनानी कानों तक आती है। लोगों का गिरया देखता है और फिर इबरत हासिल नहीं करता है।