ख़ुत्बात
 

146-आपका इरषादे गिरामी
(जब अम्र बिन ख़त्ताब ने फ़ारस की जंग में जाने के बारे में मष्विरा तलब किया)


याद रखो के इस्लाम की कामयाबी और नाकामयाबी का दारोमदार क़िल्लत व कसरत पर नहीं है बल्कि यह दीन, दीने ख़ुदा है जिसे उसी ने ग़ालिब बनाया है और यह उसी का लष्कर है जिसे उसी ने तैयार किया है और उसी ने इसकी इमदाद की है यहाँतक के इस मन्ज़िल तक पहुँच गया है और इस क़द्र फैलाव हासिल कर लिया है। हम परवरदिगार की तरफ़ से एक वादा पर हैं और वह अपने वादे को बहरहाल पूरा करने वाला है और अपने लष्कर की बहरहाल मदद करेगा।
मुल्क में निगराँ की मंिन्ज़ल महरों के इज्तेमाअ में धागे की होती है के वही सबको जमा किये रहता है और वह अगर टूट जाए तो सारा सिलसिला बिखर जाता है और फिर कभी भी जमा नहीं हो सकता है। आज अरब अगरचे क़लील हैं लेकिन इस्लाम की बिना पर कसीर हैं और अपने इत्तेहाद व इत्तेफ़ाक़ की बिना पर ग़ालिब आने वाले हैं। लेहाज़ा आप मरकज़ीन में रहें और इस चक्की को उन्हीं के ज़रिये गर्दिष दें और जंग की आग का मुक़ाबला उन्हीं को करने दें आप ज़हमत न करें के अगर आपने इस सरज़मीन को छोड़ दिया तो अरब चारों तरफ़ से टूट पड़ेंगे और सब इसी तरह “ारीके जंग हो जाएंगे के जिन महफ़ूज़ मुक़ामात को आप छोड़कर गए हैं उनका मसला जंग से ज़्यादा अहम हो जाएगा।
इन अजमों ने अगर आपको मैदाने जंग में देख लिया तो कहेंगे के अरबीयत की जान यही है इस जड़ को काट दिया तो हमेषा हमेषा के लिये राहत मिल जाएगी और इस तरह उनके हमले “ादीदतर हो जाएंगे और वह आपमें ज़्यादा ही तमअ करेंगे और यह जो आपने ज़िक्र किया है के लोग मुसलमानों से जंग करने के लिये आ रहे हैं तो यह बात ख़ुदा को आपसे ज़्यादा नागवार है और वह जिस चीज़ को नागवार समझता है उसके बदल देने पर क़ादिर भी है। और यह जो आपने दुष्मन के अदद का ज़िक्र किया है तो याद रखो के हम लोग माज़ी में भी कसरत की बिना पर जंग नहीं करते थे बल्कि परवरदिगार की नुसरत और इआनत की बुनियाद पर जंग करते थे।