ख़ुत्बात
 
141- आपका इरषादे गिरामी
(जिसमें ग़ीबत के सुनने से रोका गया है और हक़ व बातिल के फ़र्क़ को वाज़ेअ किया गया है।)


लोगों! जो “ाख़्स भी अपने भाई के दीन की पुख़्तगी और तरीक़ाए कार दुरूस्तगी का इल्म रखता है उसे उसके बारे में दूसरों के अक़वाल पर कान नहीं धरना चाहिये के कभी-कभी इन्सान तीरअन्दाज़ी करता है और इसका तीर ख़ता कर जाता है और बातें बनाता है और बातिल बहरहाल फ़ना हो जाता है और अल्लाह सबका सुनने वाला भी है और गवाह भी है। याद रखो के हक़ व बातिल में सिर्फ़ चार अंगुल का फासला होता है।
लोगों ने अर्ज़ की हुज़ूर इसका क्या मतलब है? तो आपने आँख और कान के दरम्यान चार उंगलियाँ रख कर फ़रमाया बातिल वह है जो सिर्फ़ सुना-सुनाया होता है और हक़ वह है जो अपनी आँख से देखा हुआ होता है।