ख़ुत्बात
 
136- आपका इरषादे गिरामी
(बैअत के बारे में)


म्ेरे हाथों पर तुम्हारी बैअत कोई नागहानी हादसा नहीं है और मेरा और तुम्हारा मामला एक जैसा भी नहीं ह। मैं तुम्हें अल्लाह के लिये चाहता हूँ और तुम मुझे अपने फ़ाएदे के लिये चाहते हो।
लेगों! अपनी नफ़्सानी ख़्वाहिषात के मुक़ाबले में मेरी मदद करो, ख़ुदा की क़सम मैं मज़लूम को ज़ालिम से उसका हक़ दिलवाऊगा और ज़ालिम को उसकी नाक में नकेल डाल कर खींचूंगा ताके उसे चष्मए हक़ पर वारिद कर दूँ चाहे वह किसी क़द्र नाराज़ क्यों न हो।


(((- मैदाने जंग में नकबत व रूसवाई के इहतेमाल के साथ किसी मर्द मैदान के भेजने का मषविरा उस नुक्ते की तरफ़ इषारा है के मैदाने जेहाद में सेबाते क़दम तुम्हारी तारीख़ नहीं है और न यह तुम्हारे बस का काम है लेहाज़ा मुनासिब यही है के सिकी तजुर्बेकार “ाख़्स को माहेरीन की एक जमाअत के साथ रवाना कर दो ताके इस्लाम की रूसवाई न हो सके और मज़हब का वक़ार बरक़रार रहे। उसके बाद तुम्हें ‘‘फ़ातहे आज़म’’ का लक़ब तो बहरहाल मिल ही जाएगा के जिसके दौर में इलाक़ा फ़तेह होता है तारीख़ उसी को फ़ातेह का लक़ब देती है और मुजाहेदीन को यकस नज़र अन्दाज़ कर देती है।
यह भी अमीरूल मोमेनीन (अ0) का एक हौसला था के “ादीद इख़्तेलाफ़ात और बेपनाह मसाएब के बावजूद मषविरा से दरीग़ नहीं किया और वही मषविरा दिया जो इस्लाम और मुसलमानों के हक़ में था। इसलिये के आप इस हक़ीक़त से बहरहाल बाख़बर थे के अफ़राद से इख़तेलाफ़ मक़सद और मज़हब की हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी से बेनियाज़ नहीं हो सकता है और इस्लाम के तहफ़्फ़ुज़ की ज़िम्मेदारी हर मुसलमान पर आएद होती है चाहे वह बरसरे इक़्तेदार हो या न हो।)))