ख़ुत्बात
 
133- आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा
(जिसमें अल्लाह की अज़मत और क़ुरआन की जलालत का ज़िक्र है और फिर लोगों को नसीहत भी की गई है)


(परवरदिगार) दुनिया व आख़ेरत दोनों ने अपनी बागडोर उसी के हवाले कर रखी है और ज़मीन व आसमान ने अपनी कुन्जीयात उसी की खि़दमत में पेष कर दी है। उसकी बारगाह में सुबह व “ााम सरसब्ज़ व “ाादाब दरख़्त सजदारेज़ रहते हैं और अपनी लकड़ियों से चमकदार आग निकालते रहते हैं और उसी के हुक्म के मुताबिक़ पके हुए फल पेष करते रहते हैं।


(((- इन्सानी ज़िन्दगी में कामयाबी का राज़ यही एक नुक्ता है के यह दुनिया इन्सान की मन्ज़िल नहीं है बल्कि एक गुज़रगाह है जिससे गुज़रकर एक अज़ीम मन्ज़िल की तरफ़ जाना है और यह मालिक का करम है के उसने यहाँ से सामान फ़राहम करने की इजाज़त दे दी है और यहाँ के सामान को वहाँ के लिये कारआमद बना दिया है। यह और बात है के दोनों जगह का फ़र्क़ यह है के यहाँ के लिये सामान रखा जाता है तो काम आता है और वहाँ के लिये राहे ख़ुदा में दे दिया जाता है तो काम आता है। ग़नी और मालदार दुनिया सजा सकते हैं लेकिन आख़ेरत नहीं बना सकते हैं। वह सिर्फ़ करीम और साहबे ख़ैर अफ़राद के लिये है जिनका “ाआर तक़वा है और जिनका एतमाद वादाए इलाही पर है।-)))


(क़ुराने हकीम) किताबे ख़ुदा निगाह के सामने है वह नातिक़ है जिसकी ज़बान आजिज़ नहीं होती है और वह घर है जिसके अरकान मुनहदिम नहीं होते हैं, यही वह इज़्ज़त है जिसके ऐवान व अन्सार षिकस्त ख़ोरदा नहीं होते हैं।
(रसूले अकरम स0) अल्लाह ने आपको उस वक़्त भेजा जब रसूलों का सिलसिला रूका हुआ था और ज़बानें आपस में टकरा रही थीं। आपके ज़रिये रसूलों के सिलसिले को तमाम किया और वही के सिलसिले को मौक़ूफ़ किया तो आपने भी उससे इन्हेराफ़ करने वालों और उसका हमसर ठहराने वालों से जम कर जेहाद किया।
(दुनिया) यह दुनिया अन्धे की बसारत की आख़री मन्ज़िल है जो उसके मावरा कुछ नहीं देखता है जबके साहेबे बसीरत की निगाह उस पार निकल जाती है और वह जानता है के मन्ज़िल उसके मावदा है। साहबे बसीरत उससे कूच करने वाला है और अन्धा इसकी तरफ़ कूच करने वाला है। बसीर इससे ज़ादे राह फ़राहम करने वाला है और अन्धा इसके लिये ज़ादे राह इकट्ठा करने वाला है।
(मोअज़) याद रखो के दुनिया में जो “ौ भी है उसका मालिक सेर हो जाता है और उकता जाता है अलावा ज़िन्दगी के, के कोई “ाख़्स मौत में राहत नहीं महसूस करता है और यह बात उस हिकमत की तरह है जिसमें मुर्दा दिलों की ज़िन्दगी, अन्धी आंखों की बसारत, बहरे कानों की समाअत और प्यासे की सेराबी का सामान है और इसी में सारी मालदारी है और मुकम्मल सलामती है।
यह किताबे ख़ुदा है जिसमें तुम्हारी बसारत और समाअत का सारा सामान मौजूद है। इसमें एक हिस्सा दूसरे की वज़ाहत करता है और एक दूसरे की गवाही देता है। यह ख़ुदा के बारे में इख़्तेलाफ़ नहीं रखता है और अपने साथी को ख़ुदा से अलग नहीं करता है, मगर तुमने आपस में कीना व हसद पर इत्तेफ़ाक़ कर लिया है और इसी घूरे पर सब्ज़ा उग आया है। उम्मीदों की मोहब्बत में एक-दूसरे से हम-आहंग हो और माल जमा करने में एक-दूसरे के दुष्मन हो, “ौतान ने तुम्हें सरगर्दां कर दिया है और फ़रेब ने तुमको बहका दिया है। अब अल्लाह ही मेरे और तुम्हारे नफ़्सों के मुक़ाबले में एक सहारा है।


(((-अगरचे दुनिया में ज़िन्दा रहने की ख़्वाहिष आम तौर से आख़ेरत के ख़ौफ़ से पैदा होती है के इन्सान अपने आमाल और अन्जाम की तरफ़ से मुतमईन नहीं होता है और इसी लिये मौत के तसव्वुर से लरज़ जाता है लेकिन इसके बावजूद यह ख़्वाहिष ऐब नहीं है बल्कि यही जज़्बा है जो इन्सान को अमल करने पर आमादा करता है और इसी के लिये इन्सान दिन और रात को एक कर देता है। ज़रूरत इस बात की है के इस ख़्वाहिषे हयात को हिकमत के साथ इस्तेमाल करे और उससे वैसा ही काम ले जो हिकमत सही और फ़िक्रे सलीम से लिया जाता है वरना यही ख़्वाहिष वबाले जान भी बन सकती है।-)))